भोपाल गैस त्रासदी ने ओलंपिक को जहरीला किया

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Image caption लंदन ओलंपिक में डाउ केमिकल के प्रायोजक बनने पर भारत में विरोध हो रहा है

भोपाल में सुबह-सुबह अभ्यास के लिए हॉकी टीम मैदान में पहुंच जाती है. हरी घास पर खिलाड़ियों की कदमों की आवाज़ और शोर सन्नाटे को चीर देता है.

बीते सालों में भोपाल शहर ने राष्ट्रीय स्तर के कई हॉकी खिलाड़ी दिए है.

इस टीम के बड़े सितारों में से एक कोच खुर्शीद अली भी हैं. उन्होंने भारतीय हॉकी टीम के लिए वर्ष 1980 में खेला भी था और ओलंपिक के लिए उनका चुनाव भी हो गया था.

लेकिन जहां नई भारतीय टीम लंदन ओलंपिक के लिए तैयारी कर रही है वहीं ओलंपिक के डॉउ केमिकल के प्रायोजक बनने पर वे चाहते है कि खिलाड़ी इन खेलों को बॉयकॉट करें.

दिसंबर वर्ष 1984 में यूनियन कार्बाइड कारखाने से निकली ज़हरीले गैस के रिसाव की चपेट में अली खुर्शीद भी आ गए थे.

खुर्शीद अली उस हादसे के बाद से कभी भी अच्छी हॉकी नहीं खेल पाए हैं.

अमरीकी कंपनी डाउ केमिकल के यूनियन कार्बाइड को खरीदने को खरीदने के बाद से ही उस पर मुआवज़ा देने के लिए लगातार दबाव पड़ता रहा है. वहीं कंपनी कहती रही है कि कानूनी तौर पर उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती.

भोपाल में दिसंबर 2 तारीख को कारखाने से टनों की मात्रा में निकली जहरीली गैस ने हज़ारों की जान ले ली थी.

सपना टूटा

हादसे वाले उस पल को याद करते हुए वे कहते है, '' जब कमरे में घुटन होने लगी थी तो मैं घबराहट में घर से बाहर निकल आया और देखा हज़ारों की संख्या में लोग अपने घरों से बाहर आ गए थे.''

जब उस रात लोगों को ये पता नहीं चल पा रहा था कि वे कहां भागे तो वे उस जहरीले गैस के गुबार में की तरफ ही भागते चले गए.

माना जाता है कि इस हादसे के पहले चौबीस घंटों में तीन हज़ार लोगों की मौत हो गई थी और कई हजार जहरीली गैस के रिसाव से होने वाले प्रभाव के कारण मारे गए थे.

इस हादसे ने इसे दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी बना दिया था.

लाखों लोग इस हादसे के कारण अपंग हो गए और खुर्शीद के लिए उनका ओलंपिक खेलने का सपना भी इसी हादसे के बाद खत्म हो गया.

वे कहते हैं, '' मेरी सेहत और सहनशक्ति भी पहली सी नहीं रही. मैं अच्छी हॉकी नहीं खेल पाया. मेरी क्षमता और फिटनेस भी घट गई.''

भारत ओलंपिक से दूर रहे ऐसी संभावना नहीं है वो भी जब ओलंपिक के लिए खिलाड़ी अंतिम तैयारियों में लगे हुए हैं.वहीं भोपाल में खिलाड़ी खुर्शीद के बॉयकॉट के विचार से सहमत नहीं हैं.

विरासत

लेकिन इससे पता चलता है कि भोपाल त्रासदी के अवशेष की विरासत कितनी ज़हरीली है और जिसका गुबार लंदन तक फैल गया है.

इस हादसे के 30 साल बाद भी वो संयंत्र अपनी जगह पर खड़ा है जिसमें अभी भी जहरीले रसायन मौजूद हैं.

वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि इसमें से अभी कुछ रसायनों का रिसाव भूमि और भूजल में जाकर मिल रहा है जिससे स्वास्थ्य संबंधी दिक्कते आ रही हैं.

हालांकि इसके एवज में 470 करोड़ डॉलर का मुआवज़ो पीड़ितों को दे चुकी है लेकिन पीड़ितों का कहना है कि ये नाकाफी है.

जिन परिवारों ने इस हादसे में अपने परिवारवालों को खो दिया उन्हें 2000 डॉलर और घायल हुए लोगों को 800 डॉलर मुआवज़े के तौर पर दिए गए थे.

लेकिन संयंत्र के कचरे को हटाने के लिए कौन खर्चा देगा इसे लेकर कोई सहमति नहीं हुई है.

कई लोगों का आरोप है कि भारत की सरकार इस हादसे के बाद उपजी स्थिति से निपट नहीं पाई और उसका रवैया यूनियन कार्बाइड के प्रति नर्म रहा क्योंकि उसे ये डर था कि उसके सख्त कदम से अन्य विदेशी निवेशक यहां निवेश नहीं करेंगे.

इस संयंत्र के बगल में बनी झुग्गी झोपड़ियों में बहुत कम बदलाव आया है जहां जहरीली गैसी के कारण हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी.

हर्बो बाई हादसे के समय से ही उसी दो कमरों मकान में रह रही है.

दाह संस्कार

हर्बो बाई ने अपनी बेटी को इस हादसे में खो दिया और उनके पति हमेशा के लिए अपंग हो गए थे. अब उन्हें कैंसर है.

वे कहती है कि मुआवज़े का पैसा तो दवा में ही खत्म हो चुका है और वो काम नहीं कर सकती हैं क्योंकि उन्हें अपने पति का ख्याल रखना होता है.

हर्बो देवी कहती हैं ,''अगर उनके पति की आज मौत हो जाती है तो उनके पास दाह-संस्कार के लिए भी पैसे नहीं हैं.''

वो कहती हैं कि उनकी ज़िंदगी कुत्ते-बिल्लियों से भी बदतर है.

डाउ केमिकल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि वो पूरा मुआवजा दे चुका है और कचरे का साफ सफाई करने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है

उसका कहना है कि वर्ष 1989 में ही इस हादसे को लेकर भारतीय सुप्रीम कोर्ट में समझौता हो गया है.

लेकिन अब डाउ केमिकल्स के लंदन ओलंपिक्स का प्रायोजक बनने से कंपनी विरोध प्रर्दशनों का निशाना बन रही है.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लंदन ओलंपिक समिति को डाउ को हटाना चाहिए, नहीं तो भारत को इन खेलों का बहिष्कार करना चाहिए.

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