पॉलिसी पैरालिसिस: कुछ अहम सवाल

  • 1 जून 2012
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Image caption एक जून को भारत में 750 लाख टन अन्न का भंडार हो जाएगा, लेकिन गोदाम नहीं हैं

भारत की त्रासदी है कि जब भी आम जनता को लाभ देने की बात होती है तो तरह-तरह के सवाल उठने लगते हैं और कहा जाता है कि सरकार नीति निर्धारण ही नहीं कर पा रही है.

लेकिन जब अमीरों को लाभ पहुंचाने की बात होती है तो नए तरह के शब्द गढ़ लिए जाते हैं. मैं एक-दो उदाहरण देकर कुछ बातें बताना चाहता हूं.

किसान अगर बैंक से लोन लेकर वापस नहीं करता है तो उसे जेल में डाल दिया जाता है. लेकिन अगर अमीर आदमी किसी बैंक से कर्ज लेकर वापस नहीं करता तो उसे ‘नॉन पर्फार्मिंग एसेट्स’ कहा जाता है.

दोहरी नीतियां

इस तरह, एक काम के लिए गरीब किसानों को जहाँ जेल जाना पड़ता है, वहीं बड़े उद्योगपतियों को एक नई श्रेणी में शामिल करके अपना काम जारी रखने के लिए छोड़ दिया जाता है.

अब मैं दूसरा उदाहरण देता हूं. जब गरीबों को सरकार की तरफ से कुछ छूट दी जाती है तो उसे ‘सब्सिडी’ कहा जाता है, जबकि अमीरों को विभिन्न प्रकार की दी गई छूट ‘एफिशिएंसी इंवेस्टमेंट’ की श्रेणी में आती है.

हमारे यहां विभिन्न महकमों में यह बात उठने लगी है कि मनरेगा, खाद्य पदार्थ और खाद पर सब्सिडी मिलाकर देश में गरीबों और किसानों को बहुत छूट दी जा रही है.

अगर किसान के खाद, खाद्य पदार्थ और मनरेगा में मिले सभी पैसे को मिला दिया जाए तो कुल मिलाकर ये दो लाख पच्चीस हजार करोड़ के करीब होता है.

‘रेवेन्यू फॉरगॉन’

जबकि हर साल ‘रेवेन्यू फॉरगॉन’ के नाम पर अमीरों को पांच लाख 29 हजार करोड़ रुपए की छूट दी जाती है. लेकिन क्या किसी ने यह सवाल किया है कि अमीरों को यह छूट क्यों दी जा रही है?

भारत में गरीबों को कुछ भी दिए जाने को सीधे तौर पर सब्सिडी कहा जाता है जबकि अमीरों को मिलने वाली छूट का नाम बदल दिया जाता है.

प्रश्न उठता है कि क्या सरकार यह फैसला अकेले लेती है या फिर इसमें दूसरे लोग या संस्थाएं भी शामिल होती हैं?

सरकार के इस फैसले में दुनिया भर के सभी नीति निर्धारक तत्व शामिल होते हैं जिसमें डब्लूटीओ और तमाम तरह की बहुराष्ट्रीय संस्थाएं शामिल हैं.

Image caption किसानों को मिलने वाली छूट को सब्सिडी कहा जाता है

यही सब मिलकर ग्लोबल सिस्टम बनाते हैं और नीति निर्धारित करते हैं.

अमरीकी अर्थव्यवस्था

हमारे सामने ‘फिस्कल डिफिसिट’ की बात होती है जबकि अमरीका की पूरी अर्थव्यवस्था ही घाटे में है, जिसे ‘डिफिसिट इकॉनोमी’ कहा जाता है.

लेकिन अमरीका ने नोट छापना शुरू किया और इसे एक बेहतरीन शब्द ‘क्वांटेटिव इजिंग’ का नाम दे दिया.

लेकिन समस्या यह है कि अगर सरकार से गरीबों को कुछ मिल जाए तो इसे ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ का नाम दिया जाता है.

फिर प्रश्न उठता है कि ये बातें मीडिया में क्यों नहीं आती हैं? मीडिया में वही बातें आती हैं जो मोंटेक सिंह अहलूवालिया या कौशिक बसु या फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बोलते हैं.

ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे लोगों के कहने पर ही ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ जैसे शब्द गढ़े गए हैं.

वायदे से कम दिया

आखिर क्या कारण है कि ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ जैसे शब्द गढ़ लिए गए हैं. इसका कारण यह है कि मनमोहन सिंह सरकार पिछले साल भर में बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए उतना कुछ नहीं कर पाई है, जितना शायद उसका करने की मंशा थी.

जब डेविड कैमरन भारत आए थे उसी समय खुदरा क्षेत्र में एफडीए के लिए देश को तैयार हो जाना चाहिए था. लेकिन लाख चाहने के बाद भी राजनीतिक मजबूरियों के चलते यहां खुदरा क्षेत्र में पूरी तरह एफडीआई नहीं लागू हो पाई.

इसी तरह बीमा नीति लागू नहीं हो पाई. ये बिना वजह नहीं है कि जब बड़े फैसले लागू नहीं किए जा सके तो हंगामा मचना शुरु हो गया कि सरकार कोई फैसला ही नहीं ले पाती है.

बाहर निकालने की योजना

जबकि इसी देश में ढाई लाख किसानों की आत्महत्या हुई, 32 करोड़ से अधिक लोग भूखे पेट जिंदगी बसर कर रहे हैं. लेकिन इस पर क्यों नहीं कहा जा रहा कि सरकार फैसला नहीं ले पा रही है?

अगर भारत में वालमार्ट या टेस्को के आने से हमारे देश की अर्थव्यवस्था बेहतर हो सकती है तो इंग्लैंड या यूरोप की अर्थव्यवस्था क्यों मजबूत नहीं हो रही है, वहां तो वालमार्ट भी है और टेस्को भी है.

हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमें अपने देश में 70 प्रतिशत किसानों को खेती में लगाकर नहीं रखना है. सरकार की नीति है कि किसानों को गांव से हटाकर बाजार में बैठा दें.

अमरीका में किसान लगभग खत्म हो गए हैं. वहां खेती करने वाले लोग एक प्रतिशत से भी कम रह गए हैं.

अगर सरकार की नीति को देखें तो पता चल जाएगा कि यह नीति विश्व बैंक की बनाई हुई है. विश्व बैंक ने 1999 में डेवेलपमेंट रिपोर्ट के नाम से इसे जारी किया था.

कॉरपोरेट कंट्रोल पॉलिसी

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Image caption किसानों को खासी निराशा हाथ लगी है

बारहवीं योजना के दस्तावेज को अगर देखें तो पता चल जाएगा कि हमारी सरकार भी ‘कॉरपॉरेट कंट्रोल पॉलिसी’ को लागू करने पर आमादा है.

इसमें भी कहा गया है कि देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए खेती पर से लोगों का बोझ कम करना पड़ेगा.

हमारी त्रासदी यह है कि हम देश में अन्न रखने के लिए गोदाम तक नहीं बना पाए हैं. एक जून को भारत के पास 750 लाख टन अन्न का भंडार हो जाएगा.

अगर इसे दूसरे शब्दों में कहें तो कहा जा सकता है कि अगर अनाज की बोरियों को एक के उपर एक खड़ा कर दिया जाए तो हम चांद पर उस बोरियों के सहारे ही पहुंच सकते हैं. फिर भी डेढ़ लाख टन अनाज बचा रह जाएगा.

हमारे देश में अभी भी 32 करोड़ लोग हर दिन भूखे सोते हैं और सरकार के पास अनाज रखने के लिए जगह नहीं है, जबकि अनाज सड़ रहा है.

मेरे हिसाब से यह है ‘पॉलिसी पैरालिसिस’. एफडीआई को भारत आने की मंजूरी न देना ‘पॉलिसी पैरालाइसिस’ नहीं है

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