रणवीर सेना और खूनी जातीय संघर्ष

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Image caption बिहार में रणवीर सेना के संस्थापक माने जाने वाले ब्रहमेश्वर सिंह उर्फ बरमेसर मुखिया की अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी है. (फाइल फोटो)

बिहार में जिस जमाने में सेनाएं बन रही थीं, उस समय सरकार का दखल कमजोर पड़ गया था. कई जातीय सेनाएं बनीं, उस कड़ी में अंतिम सेना रणवीर सेना थी.

आम धारणा है कि ब्रहमेश्वर सिंह ने रणवीर सेना बनाने की प्रेरणा दी थी. ये धारणा सच भी लगती है.

एक वर्ग, एक जाति उन्हें रणवीर सेना का जनक मानती है. जाहिर सी बात है कि जब एक समूह के लिए वे प्रतीक के तौर पर उभर रहे थे तो दूसरे समूह के लिए दुश्मन की तरह हो गए थे.

रणवीर सेना ने एक जमाने में कई हत्याएं की, कई नरसंहार किये. लक्ष्मणपुर बाथे उनमें से एक है जिसमें लोगों को अंधाधुंध तरीके से मारा गया था.

लेकिन बाद में रणवीर सेना के जवाब में भी लोग खड़े हो गए थे.

भूमि पर आधारित समाज

बिहार में जो जाति-व्यवस्था है, जो समाज व्यवस्था है, उसका आधार भूमि है. भूमिहार जैसी ऊंची जातियों के पास ज्यादा जमीन होती थी. जमींदारों में भी उसका वर्चस्व ज्यादा था.

दूसरे सिरे पर भूमिहीन थे जिनमें दलितों की संख्या ज्यादा थी. इनके बीच संघर्ष होता है.

इसकी अभिव्यक्ति राजनीति और जातीय सेना के तौर पर भी हुई. इसलिए इसका सीधा रिश्ता ब्रहमेश्वर सिंह से जोड़ा जाता है.

रणवीर सेना को इस हिंसा से कुछ भी हासिल नहीं हुआ. ये जो कुछ हुआ, वो दरअसल इतिहास-विरोधी था.

इतिहास इसका समर्थन नहीं करता कि सामंती वर्ग हमेशा रहेगा. संविधान भी इसका समर्थन नहीं करता है तो कभी न कभी उन्हें अपना वर्चस्व खोना ही था. कभी न कभी तो उन्हें हारना ही था.

'आइडियोलॉजिकल फोर्स'

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Image caption शुक्रवार सुबह ब्रहमेश्वर सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई.

बिहार में जब तक शोषण जिंदा रहेगा, एक खास तरह का 'आइडियोलॉजिकल फोर्स' बना रहेगा.

जिस समय रणवीर सेना और दूसरी जातिगत सेनाएं उभर रही थीं, उस समय सरकारें निष्क्रिय थीं. सरकार अमुमन ऊपरी वर्ग का साथ देती है. लेकिन उस जमाने में सरकार ऊपरी वर्ग का भी साथ देने की स्थिति में नहीं थी, इसलिए थोड़ी निष्क्रिय जैसी थी.

उस समय पुलिस की भूमिका भी निष्क्रिय थी. इसलिए दोनों के बीच सीधा टकराव हुआ. नब्बे के दशक में प्रशासन लगभग पंगु था.

इस हत्या के बाद बिहार में फिर से जातीय हिंसा हो सकती है, ऐसा मुझे नहीं लगता है. जातीय सेनाओं को पहले भी निराशा ही हाथ लगी है.

मुझे नहीं लगता कि फिर से जातीय सेनाएं बनेंगी. सरकारें अब पहले से ज्यादा सक्रिय हैं. आगे किसी जातीय संघर्ष की गुंजाइश मुझे समझ नहीं आती है.

(पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विनय कंठ से बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा की बातचीत पर आधारित)

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