'मैं मल में पड़ी रही कोई नहीं आया'

 अदृश्य भारत
Image caption सरोज की कहानी भाषा सिंह की लिखी गई एक किताब " अदृश्य भारत" का हिस्सा है

अंबाला की रहने वाली सरोज रोज़ लोगों के घरों से उनका मलमूत्र सर पर ढोती रहीं लेकिन जब वो उसी मैले में गिर पडीं तो किसी ने उन्हें हाथ नहीं लगाया.

सरोज की उम्र अब 50 के पास पहुँच रही है लेकिन आज भी उस क्षण को याद करते हुए रो पड़ती हैं.

सरोज बताती हैं कि 13 साल की उम्र से वो मैला ढ़ोने का काम करती आई हैं.

वो सालों तक यह काम करती रहीं क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई और काम नहीं था. वो याद करती हैं कि किस तरह अपनी गर्भावस्था के दौरान एक दिन वो एक लकड़ी की सीढ़ी से सिर पर लोगों का मलमूत्र साफ़ कर नीचे उतर रहीं थीं कि वो सीढ़ी टूट गई.

सारा मैला सरोज के सिर पर गिर पड़ा और वो खुद ऊँचाई से ज़मीन पर आन पडीं. वो मदद के लिए गुहार लगाती रहीं लेकिन बदले में उन्हें मिली सर्फ गलियां.

सरोज कहतीं हैं, "जब उन्होंने देखा कि मैं वाकई दर्द से बिलख रही हूँ और उठा नहीं जा रहा, तो भी किसी ने मुझे उठाया नहीं, बल्कि एक बांस नीचे लगा कर मुझे बिठा दिया. मुझे धमकाया और पुलिस की धमकी दी और कहा कि बिना साफ़ करे वहां से हिल नहीं सकती."

डरी हुई सरोज ने बिलखते हुए वो जगह साफ़ की और किसी तरह घर पहुँचीं.

'अदृश्य भारत'

सरोज की कहानी भाषा सिंह की लिखी गई एक किताब " अदृश्य भारत" का हिस्सा है. इस किताब में इस तरह की कई और सफाई मज़दूरों की संघर्ष गाथाएं मौजूद हैं. यह किताब पेन्गुइन ने छापी है.

भारत में सफाई मज़दूरों की व्यथा और इस मैले पेशे से बाहर आने की उनकी लड़ाई को भाषा सिंह ने पास से देखा है और कई किस्से लिपिबद्ध किए हैं.

सरोज की तरह की मंदसौर की लीला बाई ने जब मैला ढ़ोने से मना किया तो पूरे गावं ने उनकी एक स्वर से निंदा की और उन्हें गावं से बाहर निकल जाने को कहा.

डरे हुए उनके पति और पीढ़ीयों से इसी काम में लगे उनके ससुराल वालों ने उन्हें बहुत प्रताड़ित किया लेकिन वो टस से मस ना हुईं.

आज लीला बाई मेहनत मज़दूरी कर के खाती हैं और अपने जैसे अन्य लोगों को इस पेशे से बाहर निकालने के लिए काम कर रहीं हैं.

लीला बाई कहती हैं "सरकारी योजनाएँ केवल दिल्ली में ही सुनाई देतीं हैं गावों बस्तियों में दिखाई नहीं देतीं. "

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इस पुस्तक के विमोचन के अवसर पर कहा " हम लोग सब गुस्से में हैं, दर्द में हैं कि 2011 की जनगणना के बाद साढ़े सात लाख लोग भारत में मैला ढ़ोने का काम करते हैं."

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से राज्य सभा सांसद डी राजा ने इस मौके पर बोलते हुए कहा कि केंद्रीय योजना आयोग अपने शौचालय को ठीक करने के लिए लिए 35 लाख ख़र्च कर सकता है लेकिन मैला ढ़ोने की अमानवीय परंपरा पर कोई कारगर योजना नहीं बना सकता.

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