चुनावों पर अनिर्णय की स्थिति में कश्मीरी अलगाववादी

Image caption कश्मीर के अलगाववादी नेता

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में वैसे तो विधानसभा चुनाव डेढ़ साल दूर हैं लेकिन वहाँ 87 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव को लेकर अलगाववादी गुटों की राजनीति अनिर्णय की स्थिति में है.

चुनाव में हिस्सा लिया जाए या उससे दूरी रखी जाए इसे लेकर अलगाववादी गुट हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस के उदारवादी धड़े में ताजा विवाद पैदा हो गया है.

मीरवायज उमर फारुक, प्रोफेसर अब्दुल गनी भट और बिलाल लोन जैसे नेताओं को भारत समर्थक नेताओं के प्रति नरम रवैया रखने के लिए अपने ही सहकर्मियों के प्रश्नों का सामना करना पड़ रहा है.

असल में 1993 में हुर्रियत कांफ्रेंस के गठन के बाद से ही ये अहम प्रश्न कश्मीरी अलगाववादियों के बीच विवाद का विषय रहा है जो कि बाद में उदारवादी और कट्टरपंथी दो धड़ों में विभाजित हो गया.

हुर्रियत के उदारवादी धड़े का नेतृत्व मीरवायज उमर फारुक के हाथ में है तो कट्टरपंथी धड़े की कमान सैय्यद अली शाह गिलानी संभालते हैं.

मोहम्मद यासीन मलिक ने दोनों ही धड़ों से समान दूरी बना रखी है.

हुर्रियत के दोनों धड़ों में मतभेद की शुरुआत 2002 के विधानसभा चुनाव से पहले हुई. इस चुनाव में कश्मीर की अवाम ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.

हुर्रियत में मतभेद

वर्तमान में मीरवायज उमर फारुक के नेतृत्व वाले हुर्रियत के उदारवादी धड़े को संगठन के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर अब्दुल गनी भट के उस प्रस्ताव से उपजे विवाद का सामना करना पड़ रहा है जिसमें कहा गया है कि हुर्रियत को भारत समर्थक दलों के साथ हाथ मिला लेना चाहिए.

छह मई को उत्तरी कश्मीर के अपने गांव में एक रैली को संबोधित करते हुए फारसी बोलने वाले अलगाववादी नेता ने कहा, ''संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर विवाद संबंधी प्रस्ताव अब अप्रासंगिक हो गए हैं. अब हमें परिवर्तन को स्वीकार कर भविष्य की योजना बनानी चाहिए.''

शब्बीर शाह और आज़म इन्कलाबी जैसे नेताओं ने प्रोफेसर भट के खिलाफ दर्जनों अलगाववादी समूहों का समर्थन जुटाया ताकि उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा सके, लेकिन मीर वायज उमर फारुक इस मुद्दे को टालते रहे.

इसका नतीजा ये हुआ कि आजम इन्कलाबी ने खुद को गुट से अलग कर लिया.

चुनाव में भागीदारी

इस बीच एक निर्दलीय विधायक अब्दुल राशिद शेख एक वीडियो फुटेज के जरिए ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का मीरवायज के नेतृत्व वाला उदारवादी धड़ा चुनाव की तैयारियां कर रहा है.

उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा,''हमें मालूम है कि वो परोक्ष तौर पर अपने उम्मीदवार चुनाव में उतारते हैं और अपने अलगाववादी चेहरे को भी बरकरार रखते हैं. लोग उनकी गतिविधियों को देख रहे हैं कि वो मुख्यधारा के कार्यकर्ताओं के साथ मंच साझा कर रहे हैं.''

Image caption भारत प्रशासित कश्मीर में हुए चुनावों पर खासा विवाद रहा है

मीरवायज ये स्वीकार करते हैं कि उनके धड़े ने सरकार को लोक महत्व के मुद्दों पर घेरने का फैसला किया है. लेकिन उन्होंने ये भी साफ कर दिया है कि हुर्रियत आगामी चुनाव को लेकर क्या सोचता है.

''हमारा पक्ष साफ है. चुनाव कोई समाधान नहीं हैं. हम चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव लागू हों. अगर उन्हें लागू करने में समस्या है तो भारत, पाकिस्तान और कश्मीरी नेतृत्व के बीच संवाद होना चाहिए.''

वर्ष 1989 में शुरु हुए सशस्त्र विद्रोह को 1996 में नियंत्रत कर लिया गया और चरमपंथियों को आत्मसमर्पण के बाद भारतीय सुरक्षा बलों के सहयोगियों के तौर पर सक्रिय करने की की नीति अपनाई गई ताकि चरमपंथ का मुकाबला किया जा सके.

अलगाववादियों की ताकत

चरमपंथ को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर जो अभियान चलाए गए उनका त्रासदीपूर्ण नतीजा विधवाओं, आत्मसमर्पण करने वाले चरमपंथियों और मारे गए लोगों के परिजनों के रूप में सामने आया.

समाजशात्री जावेद नकीब कहते हैं कि,''यही लोग अलगाववादियों की प्रमुख ताकत हैं. ऐसे लोग चारों तरफ फैले हैं. अगर उदारवादी चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो ये लोग उन्हें वोट दे सकते हैं लेकिन हुर्रियत चुनाव प्रक्रिया के इतनी खिलाफ रही है कि उसके लिए अपनी नीतियों को पलटना बहुत मुश्किल होगा.''

कुछ पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी दलों पर भी आरोप लगते हैं कि 2002 के चुनाव में उन्होंने भारत समर्थक दलों का समर्थन किया था.

आजाद कश्मीर की मांग करनेवाले सबसे बड़े धड़े के नेता यासीन मलिक ने एक बार जमाते इस्लामी को 'आरएसएस' और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को भारत समर्थक गुट जमात की 'बीजेपी' करार दिया था.

कश्मीर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय कानून पढ़ानेवाले प्रोफेसर शेख शौकत कहते हैं कि अगर हुर्रियत चुनाव लड़ने का फैसला करती है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.

वो कहते हैं, “सैय्यद अली शाह गिलानी जैसे हुर्रियत के बड़े नेता पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं. यहां तक कि कश्मीरी जेहाद परिषद के प्रमुख सैय्यद सलाहुद्दीप भी चुनाव लड़ चुके हैं. लेकिन हकीकत ये है कि भारतीय शासन के अंतर्गत चुनाव को संदेह की नजरों से देखा जाता है और इसी वजह से अलगाववादी चुनाव से दूरी बनाए रखते हैं.”

यासीन मलिक

अलग कश्मीर आंदोलन के पुरोधा रहे यासीन मलिक अलगाववादियों के दल मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के प्रमुख कैंपेनर थे जिसे तब के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला का बैलेट के जरिए विरोध करना था.

वो कहते हैं, "अधिकारियों ने बेशर्मी से 1987 के चुनावों में धांधली की थी. मुझे बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था. यही वजह थी कि हमें बंदूक उठाने को मजबूर होना पड़ा. उसके बाद 1994 में भी हमने शांति स्थापित करने की कोशिश की. मैंने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की लेकिन मेरे 600 सहयोगियों को भारतीय सेना ने मार डाला. इससे हिंसा अनिवार्य विकल्प हो गई."

उन्होंने निराशा जताते हुए कहा, "लेकिन हाल के प्रदर्शनों में लोगों ने एक बार फिर हिंसा का रास्ता छोड़कर अहिंसा का रास्ता अपनाया और देखिए किस तरह 120 बच्चों को जान गंवानी पड़ी. क्या नई दिल्ली ने कभी भी हमारे शांति प्रयासों का सम्मान किया है, लोकतंत्र का रास्ता अख्तियार करने की हमारी इच्छा का मान रखा है? हम कैसे चुनाव लड़ सकते हैं जबकि भारत सरकार ने ही पूरी प्रक्रिया का अपमान किया है?”

यासीन मलिक इस परेशान करने वाले सवाल को दरकिनार करते हुए अलगाववादियों द्वारा संयुक्त रणनीति बनाए जाने की बात करते हैं.

“हमें खुल कर लड़ने की बजाए एकजुट होकर संयुक्त रणनीति बनानी चाहिए ताकि ये तय हो सके कि हमें चुनाव की घोषणा होने पर हमें क्या करना है. भारत के अपने हित हैं और पाकिस्तान की अपनी समस्याएं. ऐसे में हमें स्वतंत्र फैसले लेने की जरूरत है जो हमारी अवाम के हित में हो."

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