पेशे ऐसे भी: रेत पर निशान छोड़ने वाला कलाकार

  • 10 जून 2012

यूँ तो रेत पर निशान छोड़ना मुश्किल काम होता है, पर उड़ीसा के सैंड आर्टिस्ट कलाकार सुदर्शन पटनायक ने रेत की बनी कलाकृतियों के ज़रिए अपनी अलग छाप छोड़ी है.

पर्यावरण और एड्स जैसे सामाजिक मुद्दे हों या सचिन का शतक...इन सबको रेत पर उकेर कर बतौर सैंड आर्टिस्ट उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है. गरीबी से जूझकर बड़े हुए सुदर्शन पटनायक ने 2008 में बर्लिन में विश्व चैंपियनशिप जीती. वे कुछ दिन पहले ही कोपनहेगन सैंड स्कल्पचर चैंपियनशिप जीतकर उड़ीसा लौटे हैं. उन्होंने इस महीने होने वाली सोफिया ओपन सैंड आर्ट चैंपियनशिप के लिए भी चुना गया है.

आपने रेत से बहुत सी सुंदर कलाकृतियाँ बनाई हैं, जिन्होंने देश विदेश में पुरस्कार जीते हैं, आपने कब और कैसे सोचा कि सैंड आर्टिस्ट बनना है.

मेरा घर उड़ीसा में समंदर किनारे था. मुझे बचपन से ही कलाकारी का शौक था लेकिन घर की आर्थिक हालात अच्छी नहीं थी कि ठीक से पढ़ाई लिखाई कर सकूँ या आर्ट कॉलेज में जा सकूँ. मैं बचपन में जिस घर में काम करता था, वहाँ से सुबह तीन बजे उठकर मैं समुद्र किनारे चला जाता था और सुबह होते होते रेत पर मेरी कलाकृति तैयार होती थी. आने जाने वाले काफी उत्सुकता से देखते थे. तभी से ख्याल आया कि इस विधा में और भी कुछ करना है.

काफी संघर्ष करना पड़ा आपको ?

हाँ काफी कष्ट उठाने पड़े. लोगों को पता ही नहीं था कि सैंड आर्ट क्या होती है. जब मैं कलाकृति बनाने की अनुमति माँगता था तो कहा जाता था कि बालू खराब हो जाएगा. मुझे भी तब जानकारी नहीं थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सैंड आर्ट कितनी लोकप्रिय है.

युवकों के लिए बताएँगे कि सैंड आर्ट क्या होती है?

कला की एक विधा है जो बर्फ और रेत पर बनाई जाती है. ये अस्थाई होती है. गीले बालू पर कलाकार कलाकृति बनाता है. इसका तरीका थोड़ा अलग है. बाकी कलाकृतियों नीचे से ऊपर बनती हैं, सैंड आर्ट ऊपर से शुरु होता है. ये बेहद दिलचस्प विधा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसमें बहुत सी प्रतियोगिताएँ होती हैं. विश्व चैंपियनशिप भी होती है. मैं 2008 में वर्ल्ड चैंपियन बना था.

क्या सैंड आर्टिस्ट होते हुए आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकते हैं.

अगर मैं पैसे कमा सकता हूँ तो बाकी लोग क्यों नहीं. मैने तो शून्य से शुरुआत की थी. कई जरिए हैं कमाई के. भारत में बहुत से मेले लगते हैं, प्रदर्शनियाँ लगती हैं जहाँ इस तरह के कलाकारों को बुलाया जाता है और पैसे भी मिलते हैं. कई कॉरपोरेट कंपनियाँ आजकल प्रायोजित भी करती हैं. जैसे मैं नॉलको का ब्रैंड एम्बेस्डर हूँ जो भारत की अग्रणी कंपनी है. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताओं के लिए आपका चयन होता है और आप जीतते हैं तो अच्छी खासी ईनामी राशि मिलती है.

आप काफी अलग-अलग विषयों को रेत पर उकेरते हैं. पर्यावरण बचाने की मुहिम, एड्स कभी सचिन के 100 शतक...विषय कैसे चुनते हैं.

आप किसी भी माध्यम के कलाकार हों अगर कला के ज़रिए कुछ संदेश दे सकें तो इससे अच्छा क्या हो सकता है. मैने भी सोचा कि क्यों न मैं ऐसे विषयों पर रेत से कलाकृतियाँ बनाऊँ जो कुछ संदेश दे सकें. जैसे जब सूनामी आई तो मैने रेत पर आकृति बनाई थी जिस पर मदद का संदेश लिखा था. कुछ विदेशियों ने मुझे बाद में बताया कि उस कृति की तस्वीर अखबार में देखकर उन्होंने आर्थिक मदद की.

वैसे मैं सबसे ज्यादा कलाकृतियाँ जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बनाता हूँ. ये विषय मेरे दिल के करीब है. बाकी दुर्गा पूजा, सचिन तेंदुलकर से लेकर अमिताभ बच्चन पर कुछ न कुछ बनाता रहता हूँ.

सैंड आर्टिस्ट बनने के लिए किस तरह की खूबी, शिक्षा की जरूरत होती है ?

सैंड आर्टिस्ट बनने के लिए ये कतई जरूरी नहीं कि आप बहुत पढ़े लिखे हों या डिग्री हो. कला से जुड़ी कुछ तकनीकी चीज़ों की जानकारी होनी चाहिए. कई स्कूल हैं जो ये सिखाते हैं. बस मन में इच्छा शक्ति होना जरूरी है. दूसरा ये कि कुछ नया करने की चाह होनी चाहिए. ऐसी सोच और नजर होनी चाहिए कि हर कलाकृति में कुछ नयापन और ताजगी हो.

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार