सेना का विरोध और मौत से सामना

  • 11 जून 2012
ज़लील अंद्राबी
Image caption मानवाधिकार मामलों के वकील रहे ज़लील अंद्राबी को साल 1996 में मार दिया गया था.

अमरीका में शनिवार को खुदकुशी कर चुके अवतार सिंह को वर्ष 1996 में श्रीनगर में एक मेजर के तौर पर राष्ट्रीय राइफल की 35वीं इकाई में तैनात किया गया था.

श्रीनगर और उसके आस-पास के इलाकों में घुसपैठ विरोधी अभियानों का नेतृत्व करते-करते उनका नाम ‘बुलबुल’ रख दिया गया.

उस समय के पत्रकार मेजर अवतार सिंह को एक तानाशाह और ताकत के नशे में चूर अधिकारी के तौर पर देखते थे.

1990 के दशक में भारत प्रशासित कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन का दौर था.

जलील अंद्राबी पेशे से एक वकील थे और उस वक्त कश्मीर जूरिस्ट ग्रुप नाम की एक संस्था भी चलाते थे, अंद्राबी संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद के भी संपर्क में थे और जल्दी ही एक बार फिर मिलने जाने वाले थे.

लेकिन उसी वर्ष मार्च महीने में उन्हें कुछ लोग उठाकर ले गए. बाद में सिर्फ उनकी लाश मिली. अंद्राबी के सर पर गोली मारी गई थी और उनकी आंखे बाहर निकल गई थी.

मेजर अवतार सिंह पर अंद्राबी ही नहीं, चार अन्य लोगों की हत्या और तीन को अगुवा करने के आरोप भी लगे.

सेना पर आरोप

साल 1996 में मार्च की एक रात को 42 वर्षीय अंद्राबी और उनकी पत्नी रिफत अपनी गाड़ी से घर लौट रहे तभी कुछ सेना के जवान और सेना समर्थक चरमपंथियों ने उनकी गाड़ी का पीछा किया.

उसी साल फरवरी में अंद्राबी ने अपनी जान को खतरा बताया था. उन्होंने अपने घर के बाहर सादी वर्दी में खड़े कुछ हथियारबंद लोगों की तस्वीरें भी खिंची थी.

आठ मार्च की शाम अंद्राबी को गाड़ी से घसीट कर बाहर निकाला गया और उनकी पत्नी को वहीं छोड़ दिया गया. रिफत ने एक ऑटो रिक्शा लेकर उन लोगों का पीछा करने की भी कोशिश की लेकिन वो तेज रफ्तार से आगे निकल गए.

रिफत और अंद्राबी के भाई अरशीद ने पुलिस से मदद मांगी तो उन्होंने पहले तो मामला दर्ज करने से ही इनकार कर दिया. लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के बाद 14 मार्च को गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया गया.

हाई कोर्ट के निर्देश के बाद 18 मार्च को इस मामले की जांच के लिए श्रीनगर के तत्कालीन पुलिस प्रमुख आईके मिश्रा की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल बनाई गई.

उसी महीने की 27 तारीख को ज़लील अंद्राबी का शव राजबाग के पास झेलम नदी से बरामद किया गया. उनके हाथ पीछे बंधे हुए थे और शरीर से पत्थर बांधा गया था.

उनके शरीर पर भी चोट के निशान थे और उनकी मौत कम से कम एक हफ्ते पहले हो गई थी. अंद्राबी का शव मिलने के बाद कश्मीर घाटी में बड़े स्तर पर प्रदर्शन किए गए. एसआईटी ने भी अपने काम की गति बढ़ा दी.

'बख्शा नहीं जाएगा'

शुरुआती जांच के बाद एसआईटी को मामले में एक ‘ईख़वानी’ मोहम्मद अशरफ खान की भूमिका संदिग्ध लगी. कई प्रयासों के बाद खान को गिरफ्तार कर लिया गया.

ईख़वान उन चरमपंथियों को कहते हैं जो पाला बदल कर भारत के पक्ष में आकर सेना की मदद करते है.

विशेष जांच दल को खान ने बताया कि अंद्राबी की गुमशुदगी से पहले उन्होंने एक सैन्य अड्डे पर उस कमरे से चीख पुकार की आवाज़ें सुनी जहां अंद्राबी को रखा गया था. इसके बाद ही उन्होंने सेना के जवानों को ट्रक पर एक बोरे को लादकर ले जाते देखा.

एसआईटी रिपोर्ट के अनुसार खान ने पूछताछ में कहा, “मेजर अवतार सिंह और उनके सहयोगी कोट-पैंट पहने एक व्यक्ति को सेना के कैंप में लेकर आए. थोड़ी ही देर में अवतार सिंह और बंधक के बीच बहस शुरू हो गई जिससे मेजर और दूसरे लोग चिढ़ रहे थे. बंधक की पिटाई की गई और उसे एक कमरे में डाल दिया गया.”

खान के अनुसार मेजर अवतार सिंह ने उनसे पूछा था कि वो बंधक बनाए गए व्यक्ति को जानते है या नहीं, जिसपर उन्होंने ‘ना’ में जवाब दिया था.

खान के मुताबिक अंद्राबी का परिचय मेजर ने बतौर एक चरमपंथी समर्थक और सेना के खिलाफ बोलने वाले व्यक्ति देते हुए कहा था, “सेना के छवि खराब करने और चरमपंथियों की मदद करने वाले को बख्शा नहीं जाएगा. हम उसे मार देंगे.”

मेजर से पूछताछ

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Image caption पूर्व भारतीय मेजर अवतार सिंह अमरीका के एक घर में हाल ही में परिवार समेत मृत पाए गए.

इस मामले पर जब तत्कालीन मेजर अवतार सिंह से पूछताछ की गई तो उन्होंने कहा कि इस मामले में उनका कोई हाथ नहीं है और पुलिस पर ठीक से जांच नहीं करने का आरोप लगाया.

इसके बाद के कुछ वर्षों में अवतार सिंह पहले कश्मीर छोड़कर पंजाब गए और फिर साल 2005 में भारत छोड़कर कनाडा चले गए.

बाद में वो अमरीका के कैलिफॉर्निया चले गए जहां उन्होंने ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय शुरू किया.

साल 2006 में भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर सरकार ने अवतार सिंह के प्रत्यर्पण की मांग की थी, लेकिन उसकी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई.

अंद्राबी की बेवा और भाई पिछले 15 वर्षों से न्याय मिलने का इंतज़ार कर रहे है.

गवाह गायब

चार अन्य हथियारबंद लोग जिनकी तस्वीरें अंद्राबी ने अपने घर के बाहर ली थी, वो भी लापता हो चुके है.

इस मामले में जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों का मानना है कि अवतार सिंह ने उन सभी लोगों को मार दिया या गायब कर दिया जो अंद्राबी की मौत का उनसे संबंध साबित कर सकें.

अंद्राबी की हत्या से जुड़े लोगों में से सिर्फ खान ही जिंदा बचे है और वो भी कई वर्षों से छुपते फिर रहे है.

अंद्राबी के परिवारवालों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारतीय सेना और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भारत छोड़ने में अवतार सिंह की मदद की और उनके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को भी जानबूझकर आगे नहीं बढ़ाया.

अब जब पूर्व मेजर अवतार सिंह की मौत हो चुकी है, कई मामलों में संदिग्ध भूमिका रखने वाले सिंह को कानून के दायरे में लाए जाने की उम्मीद भी खत्म हो गई है.

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