बीएसएफ ने प्रताड़ना के नए तरीके निकाले हैं: ह्यूमन राइट्स वॉच

  • 13 जून 2012
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Image caption भारत-बांग्ला सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि भारत की सीमा सुरक्षा बल यानि बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर प्रताड़ना के नए तरीके निकाले हैं.

संगठन के अनुसार जनवरी से अब तक बीएसएफ के अत्याचार से कम से कम 18 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 13 बांग्लादेशी हैं और पांच भारतीय हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने ये भी आरोप लगाए हैं कि कोई कड़ी सज़ा न होने की वजह से ही बीएसएफ के जवानों के मन में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का कोई डर नहीं रहता है.

मानवाधिकार संगठन के अनुसार सरकार और बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ़ से बार-बार इस पर लगाम लगाने की बात कहने के बाद भी भारत-बांग्लादेश सीमा पर तैनात बीएसएफ के जवानों के जरिए स्थानीय लोगों पर अत्याचार जारी हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2010 में 'ट्रीगर हैप्पी' नाम से एक रिपोर्ट जारी किया था जिसके अनुसार पिछले दस साल में बीएसएफ ने कम से कम एक हजार नागरिकों की गोलीमार कर हत्या कर दी थी.

'नया तरीका'

उस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद बीएसएफ के जरिए गोलीबारी की घटना में तो कमी आ गई है लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार जवानों ने प्रताड़ना का अब एक नया तरीका ढूंढ लिया है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगूली ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, ''पहले बीएसएफ गोलीबारी करती थी जिसे हम अंधाधुंध और अत्यधिक बल प्रयोग कहते थे लेकिन हम देख रहें हैं कि बीएसएफ अब संदिग्ध लोगों की पिटाई करती है और लोगों के साथ इतनी ज्यादा मार-पीट होती है कि उनकी मौत हो जाती है.''

मीनाक्षी के अनुसार ढाका स्थित गैर-सरकारी संगठन 'अधिकार' ने साल 2012 में बीएसएफ के जरिए अब तक 13 बांग्लादेशी नागरिकों के मारे जाने के सबूत इकट्ठा किए हैं, जबकि कोलकाता स्थित गैर-सरकारी संगठन 'मासूम' ने इसी दौरान पांच भारतीय नागरिकों के मारे जाने का दावा किया है.

ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार मानवाधिकार उल्लंघन करते समय बीएसएफ के जवान के दिलों में कोई डर नहीं होता क्योंकि उनको पता होता है कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी.

मीनाक्षी गांगूली कहती है, ''दिल्ली में गृह मंत्रालय कहता है कि भारत सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में किसी भी तरह नरमी नहीं बर्तेगी लेकिन हम देखते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों या जवानों को कभी सज़ा नहीं मिलती. अगर कोई शिकायत करने जाता है तो पहले तो पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करती, फिर जांच ठीक से नहीं होती और पीड़ित के परिजनों को कभी भी मुआवज़ा नहीं मिलता.''

ह्यूमन राइट्स वॉच की इस ताजा रिपोर्ट पर बीएसएफ मुख्यालय से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है लेकिन दक्षिण बंगाल में तैनात बीएसएफ के आईजी रवि पनोठ ने बीबीसी को बताया कि बीएसएफ पर लगाए गए सारे आरोप बेबुनियाद हैं.

रवि पनोठ का कहना था, ''सीमा पर बसे लोगों के लिए बीएसएफ कई योजनाएं चलाती है, उनसे बीएसएफ का कोई विरोध नहीं है. बीएसएफ केवल गैर-कानूनी काम को रोकने के लिए तैनात है. फिर भी बीएसएफ अपने अधिकारियों और जवानों को मानवाधिकार के बारे में नियमित रूप से जानकारी देती रहती है.''

पनोठ के अनुसार दक्षिण बंगाल सीमा पर जहां से सबसे ज्यादा मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे हैं वहां एक वरिष्ठ अधिकारी को मानवाधिकार पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया है.

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि बीएसएफ को अब और भी अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है क्योंकि अब उन्हें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी तैनात किया जा रहा है.

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