नरेंद्र मोदी ने चल दी है चाल

  • 13 जून 2012
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Image caption नरेंद्र मोदी भारत का नेतृत्व करने वाले प्रमुख दावेदार बन चुके हैं

बहुत लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते. मगर राजनीतिक टीकाकार समर हलरनकर का कहना है कि शायद ऐसा हो सकता है.

  • हम किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे अधिक मुसलमानों को हज के लिए मक्का भेजते हैं
  • हमारे यहाँ सरकारी नौकरियों में 9% मुसलमान है जो जनसंख्या में उनके अनुपात के बराबर है. इसकी तुलना में पश्चिम बंगाल में, जहाँ मुस्लिम आबादी 25 प्रतिशत है, मगर सरकारी नौकरियों में केवल 3.2% मुसलमान हैं
  • सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले ज़िले में 40% व्यवसायी मुसलमान हैं, वे वहाँ नई कारों का एक चौथाई और मकानों-प्रॉपर्टी का एक तिहाई हिस्सा खरीदते हैं
  • मेरे प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए चलाए जा रहे जनकल्याण कार्यक्रम 30 मुस्लिम समुदायों तक पहुँचते हैं. केंद्र ने हमें 15-सूत्री राष्ट्रीय अल्पसंख्यक कार्यक्रम के लिए “अच्छी” रेटिंग दी है, दूसरे 18 राज्यों से अलग जिनकी रेटिंग “खराब” है, जिनमें अधिकतर कांग्रेस शासित राज्य हैं

दो सप्ताह पहले, मुसलमानों की बेहतरी से जुड़े ये दावे एक ऐसे व्यक्ति ने किए जिसके नाम पर शायद लोगों को आश्चर्य होता – 62 वर्षीय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी.

शहरी हिन्दू मध्यम वर्ग के चहेते नरेंद्र मोदी उस विषय पर कम ही बात करने की जरूरत महसूस करते हैं जिसे वो “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” कहा करते हैं.

मुख्य उम्मीदवार

फिर भी, हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की अल्पसंख्यक शाखा के समक्ष मोदी का ये भाषण, मुस्लिमों को आकर्षित करने का उनका पहला व्यवस्थित प्रयास था.

इससे दिसंबर में होनेवाले विधानसभा चुनाव और 2014 में होनेवाले आम चुनाव का एक आभास मिलता है.

विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें नरेंद्र मोदी के लिए लगातार चौथी बार जीतकर सामने आना जरूरी है.

ये होता है, तो फिर मोदी के लिए उनके असल लक्ष्य का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा – 7 रेसकोर्स रोड, भारत के प्रधानमंत्री का निवास और कार्यालय.

मेरे जैसे लोगों के क्षोभ के बावजूद – जो कि उदार और सेकुलर हैं (या “सिकुलर”, जैसा कि हमें इंटरनेट पर कोसनेवाले हिंदू पुकारते हैं) – नरेंद्र मोदी भारत का नेतृत्व करनेवाले एक अग्रिम पंक्ति के दावेदार बन गए हैं, जो एक तरफ अपनी शंकालु पार्टी में विश्वास जीत रहे हैं और दूसरी ओर अपने प्रतिद्वंद्वियों और प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे रहनेवाले उस नेता को पछाड़ रहे हैं जिनका नाम है – राहुल गांधी.

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Image caption नरेंद्र मोदी का दावा है कि गुजरात में मुसलमानों की स्थिति अच्छी हो रही है

बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नक़वी, गुजरात हज कमिटी के अध्यक्ष सूफ़ी सैयद महबूब अली और अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी तथा वक्फ़ बोर्ड के चेयरमैन अली सैयद के साथ गए नरेंद्र मोदी को पता था कि मुस्लिम वोट जुटाने के लिए उनका ये शांत अभियान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि सार्वजनिक रूप से उनकी दावेदारी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन मिलना, जो कि पिछले सप्ताह हुआ.

मोदी ने अपना अभियान सही मौके पर शुरू किया है. भारत के आर्थिक विकास की गाड़ी ढुलमुल कर रही है, प्रधानमंत्री का अपनी पार्टी पर नाम मात्र का नियंत्रण है और एक ऐसे देश में जहाँ अक्सर चीज़ें जुगाड़ से चला करती हैं, उसके लिए भी एक दृष्टि चाहिए और पक्के इरादे वाला नेता.

इस दृष्टि से, 2010 के दशक के लिए मोदी भारत के लिए वैसे ही नेता दिखते हैं, जैसा कि 1970 के दशक में इंदिरा गांधी थीं.

इंदिरा गांधी ने अभियान चलाया था गरीबी हटाने का और उनकी इस दृष्टि की झलक मिली “20-सूत्री कार्यक्रम“ की योजना और “ग़रीबी हटाओ“ के नारे में.

नरेंद्र मोदी का – पंचामृत – महत्वाकांक्षी, अधीर और उभरते भारत के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना कि इंदिरा गांधी के वादे तब ग़रीब, धैर्यवान और पिछड़ते भारत के लिए प्रासंगिक थे.

मोदी की तरह, वे मज़बूत और कड़क नेता थीं, ऐसे गुण जिन्हें आज का आधुनिक भारत देखना चाहता है.

असाधारण ऊर्जा

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Image caption गुजरात भारत का एक सबसे अधिक विकास करनेवाला राज्य है

सड़कों और घरों में, अखबारों और टीवी पर, इस बात को नज़रअंदाज़ करना असंभव है कि भारत अभी कानून का राज, स्पष्ट उद्देश्य और ऐसे नेताओं को देखना चाहता है जो नेतृत्व कर सकें.

ऐसी अनिश्चय की घड़ी में, मोदी विशेष बन जाते हैं, और इस बात को उनकी अपनी पार्टी ने, जो कभी उनकी महत्वाकांक्षा और तानाशाही संकेतों को संदेह की नज़र से देखती थी, भी स्वीकार कर लिया है.

मैं जब पिछले साल गुजरात गया, तो मैंने वहाँ नौकरशाहों में एक असाधारण किस्म की ऊर्जा देखी जो मोदी ने उन्हें अपने मंत्रियों के नियंत्रण से मुक्त करके भरी है.

मोदी के काम के तरीके का एक इशारा उनकी अपनी वेबसाइट पर लगे बेंजामिन डिज़राइली के के एक कथन से समझा जा सकता है – सफलता का रहस्य उद्देश्य की सततता में है.

ऐसे में जबकि लोगों के लिए अक्सर अपने मंत्रियों तक पहुँचना मुश्किल हो, नरेंद्र मोदी अपने मध्यवर्ग मतदाताओं के लिए काफी निकट हैं और उनकी तरह के संस्कृति से मेल भी खाते हैं.

उनकी वेबसाइट पर आप उन्हें लिख सकते हैं, उनसे मिलने का समय माँग सकते हैं और उन्हें किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित कर सकते हैं.

वहाँ से उनके वॉलपेपर भी डाउनलोड किए जा सकते हैं, जैसे कि उनके आदर्श स्वामी विवेकानंद का वॉलपेपर जिसपर लिखा है – समय आ गया है, उठो, जागो और आगे बढ़ो, तब तक कि लक्ष्य हासिल ना हो जाए.

साथ ही वहाँ स्क्रीनसेवर हैं, जिसपर कभी कठोर मोदी दिखते हैं, कभी खुश मोदी, कभी विजयी मोदी, कभी कंप्यूटर चलाते मोदी, कभी पगड़ी बाँधे, कभी सूट पहने मोदी.

फिर वहाँ रिंगटोन मिलते हैं जिनमें – जय-जय गर्वी गुजरात का रिंगटोन भी है - गुजरात का गीत जिसे ग्रैमी अवार्ड विजेता ए आर रहमान ने तैयार किया है.

मगर इनमें से किसी का भी मतलब ये नहीं है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन जाएँगे.

लेकिन उनके अधिकतर प्रशंसक चाहे जितना भी चाहते हों कि वे जीतें, भारत के अधिकतर हिस्सों के लिए नरेंद्र मोदी अभी भी अपरिचित हैं, और उनकी कठोर, अकेले चलने की नीति, गठबंधन के दौर में नहीं चलती.

यदि वो बीजेपी के भीतर भरोसा हासिल भी कर लें, तो भी, उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर अपने दूसरे सहयोगियों का भरोसा हासिल करना होगा, जिनमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार इस बारे में बिल्कुल चुप्पी साधे हुए हैं.

मतभेद

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Image caption बिहार के मुख्यमंत्री की राय नरेंद्र मोदी की दावेदारी के लिए बहुत मायने रखती है पर वो मौन हैं

बिहार भारत का सबसे तेज़ गति से आर्थिक विकास कर रहा राज्य है, नीतिश कुमार, मनमोहन सिंह या नरेंद्र मोदी की तरह व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्टाचार से अछूते नेता हैं, और वे लोगों को बाँटनेवाले नेता नहीं, जैसा कि मोदी अभी तक हैं.

मैं मोदी और बीजेपी के लिए उसी कारण से कभी वोट नहीं दूँगा जिस कारण से मैं कभी गांधियों या कांग्रेस को वोट नहीं दूँगा.

ये वो लोग हैं जिन्होंने आजाद भारत में दो बड़े नस्ली दंगों को लेकर आँखें मूँदें रखीं, बीजेपी ने मुस्लिमों के बारे में, कांग्रेस ने सिखों के बारे में.

दोनों पार्टियों को पता है कि अल्पसंख्यकों के संहार से चुनावी सफलता में शायद ही कोई व्यवधान पड़ता है. दोनों की दलील है कि 1984 की दिल्ली और 2002 का गुजरात आगे बढ़ चुके हैं.

मगर आगे बढ़ने का ये गुण आप पूर्वी दिल्ली की त्रिलोकपुरी की विधवाओं में नहीं देखेंगे जिनके पतियों को जिन्दा जलाया गया, छुरों से मारा गया और जो देखती हैं कि 28 साल बाद भी उनके हत्यारे आराम से घूम रहे हैं.

आगे बढ़ने का ये गुण आप गुजरात के उन घरों में भी नहीं देखेंगे जिनके परिवारों को 10 साल पहले मार डाला गया और जिन्होंने देखा कि कैसे हत्यारों को सजा दिलवाने में सरकार हिचक रही है.

कई भारतीय, जैसे कि मैं, कभी भी मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे. मगर हो सकता है कि समय आ गया हो जब हमें ये स्वीकार करना पड़ेगा कि ऐसा हो सकता है.

समर हलरनकर बंगलौर स्थित टीकाकार और लेखक हैं.

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