'कम विकलांग' होने पर छात्र को आईआईटी में दाखिला नहीं

अमित कुमार
Image caption अमित के मुताबिक उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट जाने का फैसला किया है

बिहार के दरभंगा के रहने वाले अमित कुमार ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि आईआईटी-जेईई की परीक्षा अच्छी रैंक से पास करने के बाद भी उन्हें दाखिले से मना कर दिया जाएगा.

रिपोर्टों के मुताबिक, आईआईटी दिल्ली ने अमित कुमार को ये कहकर दाखिला देने से मना कर दिया कि वे केवल 23 प्रतिशत विकलांग हैं. जबकि दरभंगा मेडिकल कॉलेज के मेडिकल बोर्ड ने अमित को जो प्रमाणपत्र जारी किया था, उसमें उन्हें 40 प्रतिशत विकलांग बताया गया है.

दरभंगा मेडिकल कॉलेज के प्रमाणपत्र के मुताबिक अमित के घुटने और पुट्ठे की हड्डियाँ बेहद सख्त हैं. इस कारण वो कोई भी काम बैठकर नहीं कर सकते हैं. उन्हें ये समस्या जन्म से ही है.

नियमों के मुताबिक, विकलांगता कोटे के अंतर्गत दाखिले के लिए 40 प्रतिशत या उससे ज्यादा विकलांगता जरूरी है, लेकिन एम्स के मेडिकल बोर्ड ने अमित को 23 प्रतिशत विकलांग पाया.

रिपोर्टों के मुताबिक, आईआईटी-जेईई के अध्यक्ष डॉक्टर जी बी रेड्डी ने आईआईटी के फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि आईआईटी जब परीक्षा के लिए विज्ञापन देता है तो इस बात का जिक्र किया जाता है कि विकलांग छात्रों की विकलांगता की जाँच उनका अपना बोर्ड ही करेगा. इस बोर्ड में एम्स के डॉक्टर होते हैं.

'एम्स से शिकायत'

उधर अमित इस फैसले से बेहद नाराज हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, ''आईआईटी में चयन होने पर मेडिकल जांच के लिए मुझे दिल्ली बुलाया गया. लेकिन एम्स के डॉक्टरों ने कहा कि मैं उतना विकलांग नहीं हूं जितना दरभंगा मेडिकल कॉलेज के प्रमाण पत्र में बताया गया है.''

वो कहते हैं, ''दरभंगा मेडिकल कॉलेज के प्रमाणपत्र को सिविल सर्जन ने भी प्रमाणित किया है. लेकिन दिल्ली में एम्स के डॉक्टरों ने मेरी हड्डियों की जांच की और उसके आधार पर मेरी विकलांगता का प्रतिशत तय कर दिया.''

अमित कुमार ने बताया, ''मैं बैठ नहीं पाता हूं. मैं वो कोई भी काम नहीं कर पाता हूं जो बैठकर होता है. मैंने एम्स के डॉक्टरों से अपनी दिक्कतें बताईं लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी. बाद में मुझे बताया गया कि मैं मेडिकल टेस्ट में फेल हो गया हूं.''

न्याय की गुहार

अमित के मुताबिक उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट जाने का फैसला किया है. उन्होंने अपने वकील अशोक अग्रवाल के माध्यम से फिलहाल आईआईटी दिल्ली को नोटिस भिजवाया है.

अशोक अग्रवाल ने बीबीसी को बताया, ''अमित का विकलांगता प्रमाणपत्र फर्जी नहीं है. सरकारी अस्पताल के बोर्ड ने जांच के बाद इसे जारी किया. जांच में पाया गया कि अमित के पैरों की हड्डियों में 40 प्रतिशत विकलांगता है. डिसएबिलिटी एक्ट के हिसाब से अमित विकलांग कोटे में दाखिला पाने के हकदार हैं.''

अशोक अग्रवाल का ये भी कहना है कि विकलांगता प्रमाणपत्र यदि मान्यता प्राप्त चिकित्सा बोर्ड से जारी किया गया है तो किसी विकलांग की विकलांगता की दोबारा जांच नहीं की जा सकती.

वो कहते हैं कि इस तरह तो एक बोर्ड के बाद दूसरा और तीसरा बोर्ड भी जांच करेगा और हर बोर्ड अलग-अलग राय देगा जिसका कोई अंत ही नहीं है.

लेकिन आईआईटी-जेईई अध्यक्ष डॉक्टर जी बी रेड्डी ने इंडियन एक्सप्रेस अखबार से कहा, "हमारी नीति बहुत साफ है और आईआईटी की स्थापना से ही यही नीति चल रही है. हम अपने विज्ञापन में ही कह देते हैं कि हमारा अपना मेडिकल बोर्ड होगा जिसमें एम्स के डॉक्टर होंगे और उनकी बात अंतिम रूप से मानी जाएगी."

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