......क्योंकि लड़ना जरूरी है

झरिया
Image caption आंकड़ों के अनुसार झरिया कोलफील्ड के खदानों में अब भी एक अरब 86 करोड़ टन कोयला बचा हुआ है.

चार साल बाद 2016 को झरिया में लगी आग के एक सदी पूरे हो जाएंगे. इन सालों में देश-विदेश से आए हजारों पत्रकार, संस्थाएं और वैज्ञानिक झरिया की आग को देखने और समझने की कोशिश कर चुके हैं.

यहां के हजारों लोग इन्हीं आग की दरी पर बनाई गई झोपड़ी में रहने और जहरीले धुएं में सांस लेने को मजबूर हैं, लेकिन यहां से कहीं और जाने को तैयार नहीं.

झरिया बचाओ कोलफील्ड समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक अग्रवाल के अनुसार, ''कोयला राजधानी होने के बावजूद पूरे धनबाद में एक भी कोयला डिपो नहीं है, फिर भी यहां हर घर में चूल्हा जलता है और इन चूल्हों पर जल रहा कोयला चोरी का होता है.''

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चोरी का यही कोयला आग पर बसी इन बस्तियों में बसे लाखों की आबादी के रोजी-रोटी का साधन है.

विभिन्न आंकड़ों को देखें तो पाएंगे की कोयला कंपनियों के राष्ट्रीयकृत होने तक तीन करोड़ टन कोकिंग कोल जल कर राख हो चुका था जो अब बढ़कर चार करोड़ 50 लाख टन तक पहुंच चुका है. अभी भी इन खदानों में एक अरब 86 करोड़ टन कोयला बचा हुआ है.

और यही कोयला झरिया शहर को उजाड़ने की वजह बन रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार की कोयला कंपनियां चाहती हैं कि इस बची हुई राष्ट्रीय संपदा को जलकर राख होने से पहले निकाल लिया जाए.

लेकिन क्या झरिया के लोग इसके लिए तैयार हैं?

विस्थापन की आड़ में भ्रष्टाचार

Image caption बोकापहाड़ी बस्ती के लोगों ने 43 परिवारों को सर्वे में शामिल नहीं करने का आरोप लगाया है.

बोकापहाड़ी निवासी अब्दुल जब्बार के अनुसार उन्हें शहर के बाहरी हिस्से में बसाए गए बेलगढ़िया कॉलोनी के बजाए भूली के मजदूर कॉलोनी में बसाया जाए जो शहर से नजदीक है और जहां रोजी-रोटी कमाने की बेहतर सुविधा है.

जबकि कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि उनकी बस्ती में किए गए सर्वेक्षण में भी धांधली हुई है, सिर्फ बोकापहाड़ी के 43 परिवारों को इस सर्वे में शामिल नहीं किया गया क्योंकि उनके पास सर्वे करने आए जेआरडीए यानी झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण कर्मचारियों को घूस देने के लिए 10 हजार रुपए नहीं थे.

मोहम्मद लुकमान कहते हैं, ''ना सिर्फ लोगों से फार्म भरवाने, दूसरी कॉलोनी में पहुंचाने और अन्य चीजों के नाम पर पैसा लिया जा रहा है बल्कि पैसे के जोर पर बोकारो, गिरीडीह और रांची के लोगों को इन बस्तियों में रहने वालों के नाम पर क्वार्टर आबंटित किया जा रहा है.''

लेकिन अधिकारियों का आरोप है कि यहां कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने जेआरडीए की ओर से दिए गए फ्लैटों को किराए पर उठा दिया है.

इन सभी आरोपों के बीच झरिया के लोगों की हक में आवाज उठाने वाली गैरसरकारी संस्था झरिया बचाओ कोलफील्ड समिति पूरे मामले में राजनीति करने का आरोप लगाती है.

समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक अग्रवाल कहते हैं,''आग की समस्या ओपन-कास्ट माइनिंग के कारण बढ़ी है, क्योंकि ये अंडरग्राउंड माइनिंग की तरह उर्ध्वाधर ना होकर क्षैतिज है और ज्यादा जगह घेरती है.''

अग्रवाल आगे कहते हैं, ''सालों से लगी आग को न बुझाकर सरकार और बीसीसीएल उसका फायदा ले रही है, ताकि आबादी को यहां से हटाने की भूमिका बनाई जा सके.''

अशोक अग्रवाल ये भी पूछते हैं कि, ''बीसीसीएल के मुताबिक उन्होंने 1997 में 10 जगह लगी आग को बुझाई है तो अब ऐसा क्यों नहीं कर सकते. खासकर तब जब पास ही में बसी टाटा की खदानों में ना तो आग की समस्या है, ना भूधंसान की, ना पुनर्वास की.''

12 हजार करोड़ का पैकेज

मई महीने में धनबाद पहुंचे कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने यहां की पुनर्वास योजना के लिए 12 हजार करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की थी.

अब लोग सवाल करते हैं कि, इस हिसाब से विस्थापित किए जाने वाले एक लाख परिवारों में से प्रत्येक परिवार के हिस्से में 12 लाख रुपए आता है, तो फिर बाकी के पैसे कहां गए और ये कि तब भी यहां से लोग जाने को तैयार क्यों नहीं है.

झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकार के मास्टर प्लान के तहत पुनर्वास की इस योजना को आम नागरिक संदेह की नज़र से देखता है.

धनबाद स्थित इंडियन स्कूल ऑफ माइंस में मैनेजमेंट कंसल्टेंट के तौर कार्यरत प्रमोद पाठक कहते हैं, ''इसमें तीन पक्ष है सरकार, कोयला कंपनी और जनता. इससे पहले भी फ्रांस का पेरिस और भारत के मोहली शहर को पुनर्स्थापित कर बसाया गया है, इसलिए ये नामुमकिन नहीं है.''

Image caption झरिया बचाओ आंदोलन समिति के सदस्यों ने कोयला पर कब्ज़ा जमाने के लिए केंद्र और बीसीसीएल पर सांठगांठ करने का आरोप लगाया है.

प्रमोद पाठक के अनुसार, ''जरूरत सिर्फ इस बात की है कि कोयला कंपनियों को थोड़ा उदार होना होगा ताकि जो लोगों का जो नुकसान हो रहा है, उसके बनिस्पत दिया जाने मुआवजा उससे बड़ा हो.''

अशोक अग्रवाल कहते हैं, ''हम जानते हैं कि हम एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन हम फिर भी ऐसा कर रहे हैं क्योंकि लड़ना जरूरी है.''

वो आगे कहते हैं, ''एक छोटी सी संस्था सरकार से किसी भी हाल में नहीं जीत सकती है, भविष्य में क्या होगा हम उसकी परवाह किए बगैर अंतिम समय तक लड़ेंगे क्योंकि किसी ना किसी को तो गरीब की आवाज बननी ही होगी.''

कवि केदारनाथ अग्रवाल के शब्दों में...

जिंदगी को

वो गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं,

लौह के सोए असुर को असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के

श्रेष्ठम मैं मानता हूं।

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