शौक ने बनाया घर को संग्रहालय

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Image caption अज़ीज़ के पास 600 से ज्यादा साज़ हैं

भारत ने संगीत को बहुत ऊंचाई दी है. यहाँ संगीत और उसके वाद्य यंत्रो को महज मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि उसे मंदिर और मठ से होते हुए विज्ञान की प्रयोगशाला तक ले जाया गया.

जयपुर के अब्दुल अजीज को संगीत की तालीम विरासत में मिली है. लेकिन उन्होंने अपना समय वाद्य यंत्रो के संरक्षण और संग्रह को समर्पित कर दिया.

अजीज का घर नायाब वाद्य यंत्रो से पटा पड़ा है.

उनके पास कोई 600 से ज्यादा साज है. इनमें बौद्धकाल से लेकर मुगल और राजपूत राजाओं के समय के साज शामिल है. अजीज खोज-खोज कर वाद्य यंत्रो का संग्रह करते रहते हैं.

जयपुर के रामगढ़ मोड़ में उपेक्षित सा अजीज का घर दुर्लभ वाद्य यंत्रो के संग्रहालय में तब्दील हो गया है. कहीं सितार, सारंगी और तानपुरा है तो कहीं अफगानी रबाब, सरोद के साथ सुस्ता रहे हैं.

अजीज का घर अब इन संगीत उपकरणों का बसेरा है. वो रियासत का दौर था जब अजीज के पुरखे दरबार की दावत पर जयपुर आए और नक्कारखाने में मुलाजिम हो गए. अजीज उस विरासत को अभी भी सहेजे हुए हैं.

हर तरह के साज

अजीज कहते हैं, ''मेरे पास सभी तरह के साज हैं. मुगलकाल और उससे भी पुराने दौर के है. मैं टूटे-फूटे साज भी लाता हूँ और फिर उन्हें वापस ठीक कर लेता हूँ. साज तीन तरह के होते हैं, खाल, गाल और बाल. तार वाले सारे साज बाल में आते है. खाल में वो साज आते है जिनमे रिदम है. गाल में वो वाद्य यंत्र आते हैं जो फूंक से बजते है. इनमें मेरे पास लकड़ी से लेकर लोहा, तांबा और पीतल तक सब तरह के साज हैं.''

अजीज के मुताबिक तार के वाद्य यंत्रों में रबाब, ताशा रबाब, तानसेन रबाब, रूहानी रबाब, सितार , तानपूरा, मयूर सितार जैसे यंत्र है.

अजीज के पास रिदम में पखावज है- एक कपड़े से बना बाया है जो कपड़े से ही बजाया जाता है, कपड़े की ढोलक है.

उनका कहना है कि उन्हें नहीं मालूम कि उनके पास किस-किस तरह के साज है.

वे कहते हैं, ''मेरे पास प्लेट तरंग है, शहनाई में कई तरह के यंत्र है. घुंघरू में करीब सौ तरह की श्रेणियां है. झांझ छोटी से लेकर ढाई किलो तक की है.''

स्नानघर में भी साज

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Image caption इन वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल फिल्मों में भी किया गया है

अजीज कोई धनी व्यक्ति नहीं है. उनके लिए इन वाद्य यंत्रो के लिए मुफीद जगह का इंतजाम सबसे मुश्किल काम है.

वे कहते हैं, ''मेरे घर में हर जगह यंत्र भरे हुए हैं. हम सयुंक्त परिवार से है. मैंने सारे भाइयों की जगह ले ली और उसमे यंत्र भर दिए. यहाँ तक कि स्नानघर में भी वाद्य यंत्रो का डेरा है. हाँ अब परिवार का दबाव है कि इतनी जगह नहीं दी जा सकती.''

ये वो साज है जो कभी महफिलों की रौनक बने, राजसी महलों में दिल बहलाव किया, किसी नृत्यांगना के कदमों की थिरकन का साथ दिया, मंदिर और खानकाहों में इबादत का हिस्सा बने.

इनमे रणसिंघा जैसे साज भी हैं, जो सैनिक छावनियों से चल कर जंगे मैदान तक आए और योद्धाओं में अपनी संगीतक ध्वनि से शौर्य का भाव भरा.

अब अरसा हुआ, जब इन वाद्य यंत्रो को किसी फनकार के साथ संगत का मौका मिला. अब्दुल अजीज जब हमारे साथ इन यंत्रो के बीच से दर गुजर हुए तो लगा संगीत के ये साज खुद को अभिव्यक्त करने को तड़प रहे हैं.

फिल्मों में उपयोग

अजीज ने उनमें से कुछ पर संगीत की धुनें भी निकाली. इनमे एक जलगान था. वे बताते है कि ये एक ऐसा यंत्र है जिसे कांसी की थाली में पानी भर कर मिट्टी के उपकरण से इसे बजाया जाता है.

इन वाद्य यंत्रो ने हिंदी फिल्मों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है.

समय-समय पर फिल्म निर्माता इन यंत्रो को फिल्मी दृश्यों में दिखाते रहे हैं. जयपुर में त्रिमूर्ति संस्थान के संतोष शर्मा को संगीत का अच्छा ज्ञान है. वे अजीज वाद्य यंत्र संग्रह की परियोजना से जुड़े हैं.

वे कहते कि भारत में किसी एक व्यक्ति के पास वाद्य यंत्रो का इतना अच्छा और विविधता भरा संग्रह नहीं है.

संतोष शर्मा कहते हैं, ''नौशाद साहिब ऐसे यंत्रो को पसंद करते थे. जैसे रबाब है अफगानी और रूहानी, जैसे बट्टा वीणा है जो बट्टे से बजाई जाती थी. अब वो काम में नहीं ली जाती है. मयूर सितार है जो कहते है शाहजहाँ के दौर में था. ये सब यहाँ मौजूद हैं.''

संगीत के विद्यार्थी संतोष इतिहास में झांक कर देखते है और बताते है, ''इनमें कपड़े से बने साज भी हैं. जैसे तबला है. एक समय था जब ब्राह्मण तबला तो बजाते थे मगर चमड़े के हाथ नहीं लगते थे. सो कपड़े से तबला बनाया जाता था. उसकी ध्वनि भी ऐसी ही होती थी, फिर मुगल काल आया तो फिर चमड़े का इस्तेमाल होने लगा. इसमें यहाँ चार बौद्धकालीन साज भी हैं.''

अजीज के घर वाद्य यंत्र ऐसे ही रखे है गोया भारतीय रेल के तीसरे दर्जे के डिब्बे में ठसाठस मुसफिर भरे हो. जिसे जहाँ जगह मिली, वही केंद्रित हो गया.

दुर्लभ दो तारा, जमगान, दुक्कड, दिलरुबा, विचित्र वीणा और सारंगी जैसे साज यूँ संग-संग खड़े बैठे थे. गोया समय के साथ नियति में आए फेर को स्वीकार कर लिया हो.

शाही दरबार, नाच गाने, रौशनी से सराबोर मंच और अब बंद कमरों की दुनिया. साज तो फनकार की सांस, खुली हवा और थाप के तलबगार है. अजीज में संगीत की साधना तो बहुत है, मगर साधन नहीं है.

वे कहते है अब इलेक्ट्रोनिक साज और आ गए हैं. इससे भी इन पारंपरिक यंत्रो की बेकद्री हो रही है.

ये वाद्य यंत्र हर मांगलिक उत्सव में इंसान के साथ रहे है तो गमे जिंदगी के संगीत में भी कभी इंसान को तनहा नहीं छोड़ा. इन वाद्य यंत्रो को इंसान से बिछोह का दर्द है. मगर क्या इंसान को भी उतना ही दर्द है.

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