बिजली संकट: उत्तर प्रदेश क्यों है अंधेरे में गुम

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Image caption दिल्ली, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य बिजली की किल्लत से जूझ रहे हैं

उत्तर प्रदेश में पिछले मार्च महीने में विधान सभा चुनाव के बाद से बिजली का संकट गहरा गया है. इस कारण कई जगह प्रदर्शन, तोड़फोड़ और मारपीट की घटनाएं हो रही हैं.

जानकार लोगों का कहना है कि उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन के पास न तो पर्याप्त बिजली बनाने की क्षमता है और न ही इतना पैसा कि वह बाहर से खरीद कर बिजली सप्लाई कर सके. इसलिए जल्दी ही दरें बढाने की तैयारी हो रही है.

उत्तर प्रदेश में बिजली के लगभग सवा करोड़ उपभोक्ता हैं. इन्हें निरंतर बिजली देने के लिए लगभग 25 हजार मेगावाट बिजली चाहिए.

राज्य के सरकारी कारखानों में करीब ढाई हजार मेगावाट बिजली बनती है. प्रदेश के सरकारी कारखानों की बिजली सबसे सस्ती यानि 2.31 रुपये प्रति यूनिट मिलती है.

करीब चार हजार मेगावाट बिजली केन्द्रीय बिजली घरों से मिल जाती है. इसकी दर लगभग ३ तीन रूपये प्रति यूनिट होती है.

इस तरह उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन के पास औसतन आठ हजार मेगावाट बिजली होती है. निजी कारखानों की बिजली अलग अलग समय के अनुसार तीन से सत्रह रुपये प्रति यूनिट खरीदी जाती है.

महंगे दरों पर खरीदी बिजली

उत्तर प्रदेश विद्युत निगम के चेयरमैन अवनीश अवस्थी का कहना है कि इस साल भीषण गरमी से समस्या और गंभीर हो गई है.

वे कहते हैं, “ इस बार सात साल का सबसे ज्यादा गरमी का रिकॉर्ड रहा है और अभी भी मॉनसून स्थाई रूप से नहीं आया है. इस वजह से इसकी गंभीरता बढ़ गई है और इसी कारण से अभी कमी है. इस कमी को हम बिजली खरीद से पूरा कर रहें हैं. लेकिन चूँकि गरमी बहुत अधिक है , कहीं कहीं ब्रेक डाउन हो जाते हैं उस कारण कभी कभी दिक्कत आ जाती है.”

जानकार लोगों का कहना है कि विद्युत निगम ने चुनाव के पहले निजी कंपनियों से मंहगे दाम पर बिजली खरीद कर सप्लाई की. इसलिए उस समय संकट का इतना एहसास नहीं हुआ.

बिजली अभियंता संघ के नेता शैलेन्द्र दुबे पिछले दो दशक में उत्तर प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में बिजली कारखाने न लग पाना राज्य में बिजली संकट का बड़ा कारण मानते हैं.

उनका कहना है, “संकट का सबसे बड़ा कारण यही है कि बढ़ती हुई मांग के अनुरूप राज्य सरकार ने कोई योजना नहीं बनाई और नए बिजली घरों की स्थापना नहीं की गई. नतीजे के रूप में निजी ट्रेडिंग कंपनियों के साथ बहुत मंहगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही है. लगभग साढ़े चार – पांच रूपये की दर पर बिजली खरीदकर उसको ढाई रूपए के रेट पर बेचा जा रहा है.इसके कारण बड़ा घाटा हुआ. आज हालत यह है कि उत्तर प्रदेश में न तो बिजली है और न बिजली खरीदने के लिए पैसा है.”

बिजलीघरों के पास कोयला नहीं

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उत्तर प्रदेश में निजी क्षेत्र में जो दो नए बिजलीघर पिछले साल चालू भी हुए हैं , उनको पर्याप्त कोयला नहीं मिला पा रहा है. इसलिए ये अपनी पूरी क्षमता भर उत्पादन नहीं कर पा रहें हैं.

दरअसल कोयले की कमी नए बिजली घरों की स्थापना में भी एक बड़ी बाधा है.

पिछली दीपावली पर उत्तर प्रदेश विद्युत निगम ने बाजार से बिजली खरीद कर 11640 मेगावाट की रिकार्ड सप्लाई की थी.

लेकिन अधिकारियों का कहना है कि बाजार से मंहगी बिजली खरीद कर सस्ती दर पर सप्लाई करने से घाटा बढ़ता गया.

जानकार लोगों के अनुसार इस समय भी पावर और एनर्जी एक्सचेंज के पास बिजली तो उपलब्ध है. लेकिन ज्यादातर बिजली बोर्ड घाटे में हैं और उनके पास पैसा ही नहीं है कि बाजार से बिजली खरीद कर सप्लाई करें.

बिजली चोरी की समस्या

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उत्तर प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस समय बिजली बोर्ड पर 34000 चौंतीस हजार करोड की देनदारी है. बैंक बिजली बोर्ड को पैसा देने से मना कर रहें हैं तो बिजली उत्पादन कंपनियां भी उधार देने से मना कर रही हैं.

ट्रांसफारमर सप्लाई करने वाली कंपनियों का लगभग छह सौ करोड रूपये बकाया है.

उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन में घाटे का दूसरा सबसे बड़ा कारण बिजली की चोरी है. जितनी बिजली सप्लाई होती है उसका लगभग साठ फीसदी दाम ही वसूल हो पाता है यानी लगभग चालीस फीसदी बिजली का दाम नहीं मिलता.

बिजली की चोरी ज्यादातर बड़े कारखानों और बाजारों में अक्सर विभागीय अधिकारियों की मिली भगत से होती है. कई इलाकों में घरों में भी कटिया डालकर बिजली जलाई जाती है.

जानकार लोगों का कहना है कि अगर बिजली की चोरी रोक ली जाए तो भी बिजली बोर्ड का घाटा काफी कुछ कम हो सकता है.

बिजली अभियंता संघ के नेता शैलेन्द्र दुबे का कहना है कि राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो बिजली चोरी रोकी जा सकती है.

वे कहते हैं, “बिजली चोरी रोकने के लिए सख्ती से अभियान चलाया जाना चाहिए और इसके लिए अधिकारियों को पूरे अधिकार दिए जाने चाहिए.इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप बंद होना चाहिए.”

बढ़ेंगी बिजली की दर

पावर कार्पोरेशन के चेयरमैन अवनीश अवस्थी कहते हैं कि इस समय उत्तर प्रदेश के 168 शहरों में बिजली का ढांचा मजबूत करने और बिल वसूलने का सिस्टम सुधारने का अभियान चलाया जा रहा है.

पावर कार्पोरेशन को इस समय बिजली सप्लाई में प्रति यूनिट लगभग एक रूपये का घाटा होता है. इसलिए कार्पोरेशन की कोशिश है कि जल्दी से जल्दी बिजली की दरें बढ़ा ली जाए.

चेयरमैन अवनीश अवस्थी के मुताबिक, “दीर्घकालीन समाधान के लिए जरुरी है कि जो भी हमारी वितरण कंपनियां हैं उनकी वित्तीय स्थिति में सुधार किया जाये.एक तो जो तीन साल से टैरिफ नहीं बढ़ा था , टैरिफ बढाने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है. अगले महीने तक टैरिफ बढ़ जाएगा, जिससे जो उपभोक्ता भुगतान कर रहें हैं, उनसे हम सही रूप से अपनी वसूली कर सकें.”

भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन

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सन 2000 में जब बिजली बोर्ड का विघटन करके पांच अलग अलग कंपनियां बनाई गयी थीं, उस समय सरकार ने बिजली बोर्ड का सारा घाटा अपने उपर लेकर बैलेंस शीट जीरो कर दिया था.

लेकिन पिछले बारह सालों में विद्युत निगम फिर लगभग चालीस हजार करोड के घाटे में चला गया है.

जानकार लोगों का कहना है कि विद्युत निगम में घाटे की एक बड़ी वजह घोर कुप्रबंध और भ्रष्टाचार भी है.

इसलिए केवल बिजली की दरें बढाने से काम नहीं चलेगा. इसके लिए सरकार को निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय अपने बिजली घर लगाने होंगे और कार्य कुशलता में सुधार लाना होगा.

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