कलाम की गुजरात यात्रा से असहज थे वाजपेयी

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Image caption पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने लिखा है कि वाजपेयी ने उनसे गुजरात यात्रा पर सवाल पूछे थे

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी आने वाली किताब टर्निंग प्वाइंट्स में कई मुद्दों पर लिखा है, इनमें वर्ष 2002 में गुजरात दंगों के बाद वहाँ की यात्रा का भी जिक्र है.

अंग्रेजी दैनिक हिंदू में छपे इस किताब के अंश के मुताबिक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कलाम की प्रस्तावित गुजरात यात्रा से सहज नहीं थे.

उन्होंने उस समय राष्ट्रपति कलाम से पूछा था- क्या आप इस समय गुजरात जाना जरूरी समझते हैं.

इस पर कलाम ने अटल बिहारी वाजपेयी से कहा था- मैं इसे एक महत्वपूर्ण कार्य समझता हूँ ताकि मैं लोगों की पीड़ा कम करने के लिए कुछ काम आ सकूँ. साथ ही राहत कार्यों में भी तेजी ला सकूँ.

सवाल

अपनी किताब में इसका जिक्र करते हुए कलाम ने लिखा है कि उन्हें अपनी प्रस्तावित गुजरात यात्रा पर कई सवालों का सामना करना पड़ा. उन्होंने ये भी लिखा है कि मंत्रालय और नौकरशाही के स्तर पर उन्हें सलाह दी गई थी कि इस मौके पर उन्हें गुजरात की यात्रा नहीं करनी चाहिए.

लेकिन इन सबके बावजूद कलाम ने अगस्त 2002 में गुजरात की यात्रा की. कलाम ने अपनी यात्रा के दौरान 12 जगहों की यात्रा की, जिनमें से तीन राहत शिविर और नौ दंगे से प्रभावित इलाके थे.

अपनी गुजरात यात्रा के बारे में पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने आगे लिखा है- कुछ महीनों पहले राज्य में दंगे हुए थे. इन दंगों के कारण हज़ारों लोगों की जिंदगियाँ अस्त-व्यस्त थी. ये बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील काम था, क्योंकि ये अजीब परिस्थितियों और राजनीतिक रूप से सक्रिय माहौल में हुआ था. मैंने फैसला किया कि मेरा मिशन ये जानना नहीं है कि क्या हुआ और क्या हो रहा है, बल्कि क्या होना चाहिए.

कलाम ने लिखा है कि पहले किसी भी राष्ट्रपति ने इन परिस्थितियों में ऐसे इलाके का दौरा नहीं किया था, इसलिए मेरी यात्रा की जरूरत पर भी कई सवाल पूछे गए.

एक राहत शिविर की अपनी यात्रा के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए कलाम ने लिखा है- जब मैंने एक राहत शिविर का दौरा किया, तो एक छह साल का बच्चा मेरे पास आया और हाथ जोड़कर कहा- राष्ट्रपति जी, मुझे मेरे माता और पिता चाहिए. मैं निशब्द हो गया. मैं तुरंत वहाँ के जिलाधिकारी से बैठक की और मुख्यमंत्री ने भी मुझसे वादा किया कि बच्चे की शिक्षा और बाकी खर्च सरकार उठाएगी.

किताब में अपनी गुजरात यात्रा के हिस्से का अंत कलाम ये लिखकर करते हैं- दूसरे लोगों के विचारों को लेकर बढ़ती असहनशीलता और दूसरे धर्मों के लोगों के जीने के तरीके को लेकर बढ़ता अपमान और इन मतभेदों को लोगों के खिलाफ हिंसा के माध्यम से प्रकट करना किसी भी परिस्थिति में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता.

सोनिया गांधी

अपनी किताब के अन्य हिस्सों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने इस राजनीतिक मिथक को तो़ड़ दिया है कि वे सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने के ख़िलाफ़ थे.

उन्होंने कहा है, "यदि सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री बनने का दावा पेश किया होता तो मेरे पास उन्हें नियुक्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था."

कलाम ने माना है कि उनके पास व्यक्तियों, संस्थाओं और राजनीतिक दलों की ओर से कई ईमेल आए और चिट्ठियाँ आईं थीं जिसमें सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री का पद दिए जाने का विरोध किया गया था. लेकिन वे कहते हैं कि ये मांगें 'संवैधानिक रुप से स्वीकार किए जाने योग्य नहीं थीं'

पूर्व राष्ट्रपति का कहना है कि इन ईमेल और चिट्ठियों को उन्होंने बिना किसी टिप्पणी के सरकारी एजेंसियों के पास भिजवा दिया था.

उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि जब मई, 2004 में हुए चुनाव के नतीजों के बाद जब सोनिया गांधी उनसे मिलने आईं तो राष्ट्रपति भवन की ओर से उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने को लेकर चिट्ठी तैयार कर रखी थी.

लेकिन उनका कहना है कि 18, मई, 2004 को जब सोनिया गांधी अपने साथ मनमोहन सिंह को लेकर पहुँचीं तो उन्हें आश्चर्य हुआ.

वे लिखते हैं, "उन्होंने (सोनिया गांधी ने) मुझे कई दलों के समर्थन के पत्र दिखाए. इस पर मैंने कहा कि ये स्वागत योग्य है और राष्ट्रपति उनकी सुविधा के समय पर शपथ ग्रहण करवाने के लिए तैयार है."

आगे उन्होंने लिखा है, "इसके बाद उन्होंने बताया कि वे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद पर मनोनीत करना चाहेंगीं. ये मेरे लिए आश्चर्य का विषय था और राष्ट्रपति भवन के सचिवालय को चिट्ठियाँ फिर से तैयार करनी पड़ीं."

ये घटनाक्रम उस समय का है जब नवगठित गठबंधन यूपीए का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के संसदीय दल ने सोनिया गांधी को सर्वसम्मति से अपना नेता चुन लिया था. यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे वाममोर्चे ने भी कह दिया था कि उन्हें सोनिया गांधी के नाम पर आपत्ति नहीं है.

इन विवरणों से पहले अक्सर ये चर्चा होती रही है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री तो बनना चाहतीं थीं लेकिन राष्ट्रपति कलाम ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर या बोफ़ोर्स कांड में गांधी परिवार का नाम होने का हवाला देकर कह दिया था कि उन्हें संवैधानिक मशविरा करना होगा, इसके बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह का नाम सुझाया था.

दक्षिणपंथी पार्टियाँ इस बात का ख़ूब प्रचार करती रही हैं और इसकी वजह से यह एक राजनीतिक मिथक भी बन गया था.

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