किसी महिला को डायन क्यों बनाया जाता है?

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Image caption राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना है कि भारत के पचास से ज्यादा जिलों में डायन प्रथा है

भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग ने डायन प्रथा पर केंद्रीय कानून बनाने का काम शुरू कर दिया है.

डायन प्रथा के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर झारखण्ड जैसे राज्यों ने पहले ही कानून बना लिए हैं. अब छत्तीसगढ़, राजस्थान और हरियाणा भी इसी राह पर हैं.

कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओ का कहना है कि मौजूदा कानून के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है, मगर पुलिस इसमें कोई रूचि नहीं लेती.

डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाएं रह-रहकर सर उठाती रही हैं.

बोली देवी की कहानी

बोली देवी विश्नोई एक औरत हैं, वो इन्सान भी हैं, मगर समाज के एक हिस्से ने भीलवाड़ा की इस महिला को डायन नामजद कर दिया.

इसके साथ ही बोली देवी और उनके परिवार पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा. बोली ने जब आपबीती बयान की तो उनकी आँखे छलछला गईं.

वे कहती हैं, ''मुझे और मेरे परिवार को आठ साल हो गए जब गाँव में जाति के लोगों ने डाकन या डायन करार दिया. तब से जिंदगी नारकीय हो गई है. बाहर आना-जाना बंद है. बड़ी घुटन होती है. यहाँ तक कि मेरी दो पुत्र- वधुओं को भी मेरा साथ देने पर जगह-जगह बेइज्जत किया गया.''

बोली देवी के पति सरकारी कर्मचारी थे, लेकिन दबाव और तनाव में नौकरी को तिलांजलि दे दी. बोली देवी जहाँ भी जाती हैं, लोगों से कभी कातर-कंठ से तो कभी गुस्से में पूछती हैं कि क्या वो उन्हें डाकन नजर आती हैं?

पर जवाब न समाज देता है और न ही सरकार.

'डायन वॉयरस'

विकास अध्ययन संस्थान की प्रो कंचन माथुर कुछ समय पहले गांव-गांव गईं और डायन करार दी गई औरतों से मिलीं.

उन्होंने कोई साठ से ज्यादा ऐसे मामलों का अध्ययन किया और अपनी रिपोर्ट में कहा कि ज्यादातर पीड़ित महिलाएं पिछड़े वर्ग, आदिवासी और दलित समुदाय से हैं.

वे कहती हैं, ''बहुत छोटी-छोटी बात के लिए औरत को जिम्मेदार बताकर डायन करार दे दिया गया. जैसे गाय ने दूध देना बंद कर दिया, कुँए में पानी सूख गया, किसी बच्चे की मौत हो गई तो अन्धविश्वास के चलते औरत को डायन घोषित कर दिया गया.

प्रोफेसर कंचन माथुर कहती हैं कि कई मामलों में सम्पत्ति हड़पने की नीयत से भी महिलाओं को डायन करार दिया गया.

इस अध्ययन में प्रोफेसर माथुर ने बताया कि डायन करार दी गईं औरतों के साथ बहुत ही पाशविक बर्ताव किया गया.

यौन अत्याचार, उनके बाल काट देना, मुंडन कर देना और फिर गांव से बहार निकाल देना भी इसमें शामिल है. इन पीडितों में से कुछ ऐसी भी थीं जिनके पास तन ढँकने के लिए कपड़े तक नहीं छोड़े गए. कुछ के मुंह में मल-मूत्र तक ठूँसा गया.

फिर इन घटनाओं से इन महिलाओं का छोटा-मोटा रोजगार भी छिन गया. कुछ को ताले में बंद रखा जा रहा था तो कुछ को गांव के बाहर रखा जाता था. महिला आयोग की सदस्य निर्मला सावंत प्रभावलकर का कहना है कि सरकार ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है.

डायन प्रथा और कानून

महिला आयोग की सदस्य निर्मला सावंत प्रभावलकर कहती हैं, ''हमें लगता है कि एक केंद्रीय कानून की जरूरत है, ताकि इस कुप्रथा से महिलाओं को निजात मिल सके. कुछ राज्यों में कानून बन गए है तो कुछ में कानून बनाए जा रहे हैं.''

पर क्या कानून बनाने से ये कुप्रथा खत्म हो जाएगी?

दिल्ली की सामाजिक कार्यकर्ता मधु मेहरा कहती हैं, ''ये कानून की कमी का मामला नहीं है. सवाल ये है कि क्या सरकार इस बारे में गंभीर है. क्या भारतीय दंड-विधान में हिंसा रोकने और अत्याचार रोकने के प्रावधान नहीं हैं. अगर हैं तो फिर पुलिस इन मामलों में कार्रवाई क्यों नहीं करती.''

मधु मेहरा कहती हैं कि पुलिस चाहे तो मौजूदा कानून के तहत भी सख्त कार्रवाई कर पीड़ित को इंसाफ दिला सकती है.

त्रेता युग में जब उसे अग्नि-परीक्षा से गुजारा गया तो लगा ये औरत का ऐसा आखिरी इम्तिहान होगा. लेकिन हर दौर और देश में कभी उसे दीवार में चुना गया, कभी सलीब पर लटकाया गया. गोया औरत का कोई देश नहीं होता, उसकी तो देह होती है.

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