क्यों है पिंकी या रूमी के मसले में इतना रस

  • 7 जुलाई 2012
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Image caption पिंकी प्रामाणिक ने दोहा एशियाई खेलों में देश के लिए स्वर्ण पदक जीता था

पिंकी प्रामाणिक के मामले में अगर आप सार्वजनिक रूप से लोगों से चर्चा करने निकलें तो आम लोगों की यही राय सुनने को मिलती है कि उसके साथ सही नहीं हो रहा है.

मगर निजी चर्चाओं में एक बड़ा तबका ऐसा है जो इस पूरे मामले को काफ़ी रस लेकर पढ़ रहा है और इसमें रुचि ले रहा है. उनके लिए ये एक मज़ाक का विषय है, दिल्लगी की प्रस्तावना है.

समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं कि भारत में लोगों की सोच लोकतांत्रिक नहीं होने का ये नतीजा है, “हमारे लोकतंत्र में लोगों को एक सम्मान आसानी से नहीं मिलता. आम राय में लोकतंत्र की वो भावना शामिल करना प्रशासन की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है.”

दीपांकर के अनुसार जब तक प्रशासन मज़बूत तरीक़े से लागू न करे आम लोगों में दूसरों को सम्मान देने की भावना आती ही नहीं है.

उनके मुताबिक़, “हमारे यहाँ कोई लंगड़ा है तो उसे लंगड़े, अंधा हो तो उसे ओ अंधे या कोई सुन ना पाए तो उसे ओए बहरे कहना आम है. हमारा जो लोकप्रिय रवैया है वो लोकतांत्रिक नहीं है.”

रूमी नाथ

शादीशुदा होते हुए भी बांग्लादेश के युवक से शादी करने वाली असम की कांग्रेस विधायक <span > रूमी नाथ और उनके दूसरे पति भीड़ को भीड़ ने पिछले दिनों घेरकर पीटा.

राष्ट्रीय टेलीविजन चैनलों पर उसके दृश्य दिल दहला देने वाले थे. समाज वैज्ञानिकों का मानना है कि जब तक प्रशासन इस बारे में सख़्त नहीं होगा और समाज में लोगों के अंदर इन मसलों पर एक संवेदनशीलता नहीं आएगी तब तक लोगों की दबी हुई इच्छाएँ समय-समय पर भीड़ के रूप में सामने निकलती रहेंगी.

दीपांकर गुप्ता इस बारे में कहते हैं, “भागलपुर में कुछ अपराधियों को पकड़कर पुलिस वालों ने उन्हें अंधा कर दिया था. उस समय भी एक लोकप्रिय राय बन गई थी कि हाँ ये अपराधी हैं और उनके साथ ऐसा ही होना चाहिए.”

दीपांकर का मानना है कि आम तौर पर लोकप्रिय राय लोकतांत्रिक नहीं होती वो रूढ़िवादी होती है और इसलिए लोकतांत्रिक समाज में उसे लागू करने के लिए प्रशासन को ज़्यादा से ज़्यादा मेहनत करनी होती है.

महिला

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Image caption रूमी नाथ और उनके दूसरे पति की भीड़ ने काफ़ी पिटाई की

रूमी नाथ ने कहा कि महिला होने के नाते उन्हें इस तरह से निशाना बनाया गया और कुछ हद तक वो बात सही भी लगती है.

सोचकर देखिए कि अगर रूमी नाथ की जगह किसी पुरुष नेता ने ही ऐसा किया होता तो भी क्या भीड़ इतनी आसानी से उनके साथ ऐसा बर्ताव कर सकती थी, शायद नहीं.

दरअसल भीड़ में लोग मान लेते हैं कि अब उन्हें न्याय करना होगा और समाज शास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं कि जहाँ प्रशासन कमज़ोर होता है वहाँ ऐसी घटनाएँ ज़्यादा होती हैं, “कानून अपने हाथ में लेकर लोगों को ठीक करने की भावना लोगों में आ जाती है क्योंकि प्रशासन में उनका भरोसा ही नहीं रह जाता.”

दीपांकर के अनुसार लोग ये मान लेते हैं कि ये सभी उसी भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा हैं और अब उन्हें ही कुछ करना होगा.

प्रशासन की सोच में बदलाव की ज़रूरत पर तो बल दिया जाता है मगर पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने जब एक लापता लड़की के पिता से ये कहा कि अगर मेरी बेटी या बहन ने ऐसा किया होता तो मैं या तो ख़ुद को गोली मार लेता या उसे मार देता, तो ऐसे बयान संकेत देते हैं कि इस दिशा में अभी सफ़र बहुत लंबा है.

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