मनमोहन सिंह को फिसड्डी बताया टाइम ने

 रविवार, 8 जुलाई, 2012 को 14:14 IST तक के समाचार

मनमोहन सिंह ने 90 के दशक में अर्थव्यवस्था को उदार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी

अमरीकी पत्रिका टाइम ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने ताज़ा अंक के कवर पृष्ठ पर स्थान देते हुए उन्हें एक कमज़ोर नेता बताया है.

टाइम ने अपने एशिया संस्करण के मुखपृष्ठ पर मनमोहन सिंह की तस्वीर प्रकाशित की है जिसपर लिखा है – द अंडरअचीवर – यानी ऐसा नेता जो उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा.

पत्रिका ने साथ ही मुखपृष्ठ पर उनके नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए लिखा है – "भारत को एक नई शुरूआत की ज़रूरत है. क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसके लिए योग्य हैं?"

समाचार एजेंसी पीटीआई ने भारतीय बाज़ार में आए टाइम के इस अंक के बारे में लिखा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाने के लिए प्रधानमंत्री सिंह की सराहना की जाती रही है.

लेकिन टाइम ने उन्हें एक ऐसा कमज़ोर नेता भी बताया है जो उन सुधारों को जारी रखने के लिए इच्छुक नहीं है जिनसे कि देश को दोबारा प्रगति के पथ पर लौटाया जा सकेगा.

"भारत को एक नई शुरूआत की ज़रूरत है. क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसके योग्य हैं?"

टाइम, अमरीकी पत्रिका

टाइम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक विकास में आई गिरावट की चुनौती, भारी वित्तीय घाटे और रूपए की गिरती कीमत के अतिरिक्त कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए गठबंधन लगातार भ्रष्टाचार के विवादों में घिरा है और उसपर आर्थिक दिशा तय नहीं करने के आरोप लग रहे हैं.

टाइम ने लिखा है, "घरेलू और विदेशी निवेशक घबरा रहे हैं. मतदाताओं का विश्वास भी, महँगाई बढ़ने से और सरकार की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाने वाले विवादों से, कमज़ोर पड़ रहा है."

मनमोहन सिंह के पतन का उल्लेख करते हुए टाइम ने लिखा, "पिछले तीन वर्षों में, वो शांत आत्मविश्वास जो कभी उनके चेहरे पर चमकता था, वो लुप्त हो गया है. लगता है वो अपने मंत्रियों को नियंत्रित नहीं कर पा रहे और उनका नया मंत्रालय, वित्त मंत्रालय का अस्थायी कार्यभार, सुधारों को लेकर इच्छुक नहीं है जिससे कि उस उदारीकरण को जारी रखा जा सकेगा जिसकी शुरूआत में उन्होंने भूमिका निभाई थी."

टाइम ने लिखा है कि ऐसे समय जबकि भारत आर्थिक विकास में धीमेपन को सहन नहीं कर सकता, विकास और नौकरियों को बढ़ाने में सहायक विधेयक संसद में अटके पड़े हैं, जिससे ये चिंता पैदा होती है कि राजनेताओं ने वोट की खातिर उठाए गए अल्पावधि वाले और लोकप्रियता वाले उपायों के चक्कर में असल लक्ष्य को भुला दिया है.

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