आंध्र जैसा ज़ोर का झटका बिहार में नहीं

  • 11 जुलाई 2012

जब कोई रजिस्टर्ड वित्तीय संस्था किसी ज़रूरतमंद को रोज़ी-रोटी की खातिर छोटा-मोटा काम- धंधा चलाने के लिए बहुत मामूली रक़म की ऋण-सहायता देती है, तो उसे 'माइक्रो फाइनेंस ' या ' माइक्रो क्रेडिट ' कहा जाता है.

बिहार में भी ऐसी कई संस्थाएं पिछले कुछ वर्षों में खुलीं, लेकिन इनमें से अधिकांश ने अपनी लुटिया डूबने जैसी स्थिति होते देख अपना कारोबार समेटना शुरू कर दिया है.

माइक्रो फाइनेंस इंस्टिट्यूट ( एमएफआइ) हलके में इस संकट को अब ' एपी क्राइसिस ' या ' आन्ध्र प्रदेश क्राइसिस ' के नाम से जाना जाता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि एमएफआइ के ज़रिए बतौर क़र्ज़ बांटी गई रक़म डूबने के सबसे अधिक मामले आंध्र प्रदेश में सामने आये.

गड़बड़ियों की कमी नही

' एसकेएस ' नाम की संस्था को सबसे ज़्यादा नुकसान इसलिए उठाना पड़ा, क्योंकि ऋण आवंटन से लेकर ऋण वसूली तक कई तरह की गड़बडियों और ज़्यादतियों के सबसे अधिक आरोप इसी संस्था पर लगे.

मसलन पात्रता ठीक से जांचे-परखे बग़ैर ज़्यादा-से-ज़्यादा क़र्ज़ बांटने की होड़ में फंसना और फिर मंदी की मार से आशंकित माहौल में बैंक और कर्जदार, दोनों की बेरुख़ी झेलना, संकट का बड़ा कारण बना.

इस पर रही-सही कसर जबरन वसूली के दबाव ने पूरी कर दी. फिर वही हुआ, ज़ोर का झटका लग गया. और ये झटका आंध्र प्रदेश तक ही सीमित नहीं रहा, उन तमाम राज्यों तक पहुँच गया, जहाँ ऐसी चोट खाई हुई माइक्रो क्रेडिट संस्थाओं की शाखाएं खुली थीं.

बिहार भी इसमें शामिल है. यहाँ एसकेएस के अलावा बेसिक्स, शेयर, अस्मिता, जीवन, आरोहन, कैस्पर और बंधन नाम की माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं का कारोबार है.

Image caption माइक्रो क्रेडिट की बुरी हालत वाली मौजूदा तस्वीर का एक दूसरा चमकदार पहलू बिहार में दिखा है

लेकिन यहाँ स्पष्ट करना होगा कि लुटिया डूबने जैसी नौबत ख़ासकर उन संस्थाओं में आई, जिनके मुख्य कारोबार आन्ध्र प्रदेश से जुड़े हुए थे. एसकेएस और बेसिक्स ने बिहार में वसूली पर ज़ोर देकर ऋण बांटना लगभग बंद कर दिया.

इस कारण यहाँ क़र्ज़ लेने वालों ने समझा कि ये संस्थाएं बिहार से अपना धंधा समेट कर भाग रही हैं. यहाँ बेसिक्स के मैनेजर रह चुके एक व्यक्ति ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, ''जब एसकेएस के बारह सौ करोड़ रूपए और बेसिक्स के छह सौ करोड़ रूपए आंध्र प्रदेश में डूब रहे हों या डूब चुके हों तो इस ख़बर के बाद बाक़ी राज्यों में इनके क़र्ज़ वसूली अभियान की मुश्किलें समझी जा सकती हैं. ''

बिहार में बेसिक्स के राज्य प्रमुख मनीष कुमार ने बताया '' वर्ष 2011 के अप्रैल से लेकर अक्टूबर महीने तक इस राज्य के 18 ज़िलों में हमने कुल 56 करोड़ रूपए के ऋण बांटे थे, इनमें से दस करोड़ रूपए अभी यहाँ फंसे हुए हैं. अब चूँकि बैंकों से एमएफआइ को फंड मिलने का फ्लो बहुत कम हो गया है, इसलिए ऋण बांटने में और ऋण चुकाने में - दोनों स्तरों पर कोताही से संकट और बढा है. ''

उधर एसकेएस के किसी अधिकारी ने अपनी संस्था से सम्बंधित कोई जानकारी नहीं दी. वहाँ जिनसे भी संपर्क किया गया, सब ने टालमटोल का रवैया क़ायम रखा.

बैंकों से फण्ड उधार लेकर ही एमएफआइ के संचालक बाज़ार में ज़रूरतमंद लोगों को बैंक से ऊंची दर पर क़र्ज़ देते हैं. सूद की ये दर 26 प्रतिशत तक होती है.

ग़रीब लोगों को आर्थिक तौर पर आत्म निर्भर बनाना और उन्हें ' सूदखोर महाजनों ' के शोषण से बचाना ये अपना मक्सद बताते हैं. जबकि इनके काम में पारदर्शिता नहीं होने के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि बिहार में एक संस्था ऐसी भी हैं, जिसका यहाँ अन्य के मुक़ाबले तेजी से विकास हुआ.

तस्वीर का दूसरा पहलू

माइक्रो क्रेडिट की बुरी हालत वाली मौजूदा तस्वीर का एक दूसरा चमकदार पहलू बिहार में दिखा है. उसका संबंध मूलतः पश्चिम बंगाल से है और संस्था का नाम है ' बंधन '.

पूर्वी भारत के कई राज्यों में लम्बे समय से 'लघु ऋण सहायता' के काम में जुटे बंधन फिनांशियल सर्विसेज लिमिटेड का प्रवेश बिहार में वर्ष 2008 में हुआ.

इस संस्था के बिहार सर्किल मैनेजर कल्याण दास कहते हैं - ''राज्य के कुल 38 में से 32 ज़िलों में बंधन की 231 ब्रांच हैं, जिनके ज़रिए चार लाख लोगों को अपना धंधा चलाने के लिए लोन दिया गया है. लगभग 360 करोड़ रूपए हमने इस राज्य में ऋण के रूप में बांटे हैं और सिर्फ 4400 ऐसे कर्जदार हैं, जो समय पर ऋण की किस्तें नहीं चुका पा रहे हैं. आंध्रा क्राइसिस का असर हमारे ऊपर बहुत ही कम इसलिए पड़ा, क्योंकि जैसे -तैसे ग्राहक -कोटा- टार्गेट पूरा करके सूद की लूट मचाने और फिर ऋण लेने वालों से ख़राब व्यवहार करने से हम बचते हैं.''

वैसे, तटस्थ विश्लेषक मानते हैं कि चूँकि बंधन का कारोबार आंध्र प्रदेश में नहीं था, इसलिए उसकी साख बच गई और उसने बिहार में लोगों का भरोसा जीतकर ' नम्बर वन ' जैसी स्थिति हासिल कर ली.

इसी बात का मौक़ा मुआइना करने जब मैं कुछ गांवों में पहुंचा तो बंधन से जुड़े लाभार्थी महिला समूहों में ऋण लेकर रोज़ी-रोटी लायक काम-धंधा चलाने का ख़ासा उत्साह नज़र आया.

पटना ज़िले के संपतचक गाँव में बंधन ग्रुप की सदस्य लालती, मंजू, प्रमिला, गुडिया, रेणु और सुषमा समेत 29 महिलाओं की उस समय गोष्ठी चल रही थी.

उनसे से एक ने कहा, "मैंने पंद्रह हज़ार रूपए कर्ज लेकर अपने पति की बंद हो चुकी बर्तन-दुकान को ज़िंदा किया, अब उसकी आमदनी से साप्ताहिक किस्त आराम से चुका रही हूँ."

इसी समूह में मौजूद एक अन्य महिला ने कहा, "प्याज की खेती के लिए दस हज़ार रूपए लोन मिला तो इस बार ठीक से खाद-पानी देकर पहले से ज़्यादा प्याज हमने उपजाया. मेरी कबाड़ी की दुकान है और दस हज़ार के कर्जे से उसे मैंने बढाया है.''

बगल के बैरिया गांव की कुछ औरतों ने खेती के लिए कर्ज लिए थे, लेकिन उपज कम होने के बावजूद लोग की किस्ते चुकाने में कंजूसी नहीं बरती और कहा, "फसल खराब हुई तो क्या? शरीर भी तो एक पूंजी है. उसी के बूते मेहनत-मजदूरी करके लोन की किस्त चुका देगें ताकि कर्ज का बोझ न बढ़े."

Image caption निर्धन समाज कभी डिफॉलटर यानी किस्त चुकाने में विफल नहीं होता.

एक ख़ास बात ये है कि बंधन ने सिर्फ निर्धन समाज की महिलाओं को ही ऋण-सहायता लेने वाले ग्रुप में शामिल किया है. और ऐसा भी नहीं है कि उनमें से कोई कभी डिफॉलटर यानी किस्त चुकाने में विफल नहीं होती.

कुम्हरार गाँव की चन्द्रावती ने जिस ऑटोरिक्शा की ख़रीद में मदद के लिए पंद्रह हज़ार रूपए बतौर क़र्ज़ लिए, उस टेम्पू में बड़ी ख़राबी आ जाने और पति के बीमार हो जाने से वह डिफॉलटर हो गई.

गनीमत है कि बंधन की ओर से क़र्ज़ वसूली का डंडा उस पर नहीं चला है. लेकिन हाँ, बंधन के प्रतिनिधि उसके यहाँ हर हफ़्ते जाते ज़रूर हैं और चाय पीकर लौट आते हैं, ताकि क़र्ज़ लेनदेन की डोर झट से ना टूटे.

सूदखोरी का खुला खेल

बिहार के गांवों या कस्बों में सूदखोरों का जाल- सा बिछा है. किसी विपदा या फ़ौरी ज़रुरत में फंसे अभावग्रस्त लोगों को मनमर्ज़ी सूद पर क़र्ज़ देकर लूटने वाले हर जगह मौजूद हैं.

ऐसे में जब तक सरकारी या सरकार द्वारा अधिकृत ऋण-व्यवस्था में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार का खुला खेल होता रहेगा, तबतक ये सूदखोर फलते-फूलते रहेंगे.

दूसरी तरफ़ बिहार में बैंकों की तरफ़ से ये ताज़ा शिकायतें प्रचारित हो रही हैं कि क़र्ज़ के रूप में दिये गये उनके लगभग 3500 करोड़ रूपए इस राज्य में लोगों के पास फंसे हुए हैं.

इस रक़म को बैंकों ने ' एनपीए ' यानी नॉन परफोर्मिंग एसेट घोषित कर दिया है. ज़ाहिर है कि बिहार से भरपूर डिपोजिट( जमा) लेकर क्रेडिट (ऋण) देने में कोताही बरतने का ये पुराना बहाना है.

इस माहौल में माइक्रो फाइनेंस की बढ़ती ज़रूरतों पर ' आंध्र संकट ' का अँधेरा छा जाना अशुभ संकेत माना जा रहा है. इसे दूर करने की एक सम्भावना संसद में पेश उस ' माइक्रो फाइनेंस बिल ' में देखी जा रही है, जिसके पारित होने से एमएफआइ की स्थिति और विश्वसनीयता बैंकों की मदद से मज़बूत हो सकती है.

लेकिन समस्या है कि पहले खुद केन्द्र सरकार की स्थिति और विश्वसनीयता तो मजबूत हो !!

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