यूपी: माइक्रो फाईनेंस पनपा नहीं, सूदखोरों की चांदी

सरकार ने कानून बनाकर सूदखोरी पर रोक लगा रखी है. उल्लंघन पर सजा का भी प्रावधान है. लेकिन पर्याप्त बैंकिंग सुविधाओं के अभाव में बहुत से लोग साहूकारों के चंगुल में फंस कर कर्ज के भंवर जाल में फंस जाते हैं.

उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में पुलिस ने सूदखोरी के खिलाफ अभियान चलाकर कई सूदखोरों को जेल भेजा है. पुलिस ने जिन लोगों का राहत दिलाई है उनमे से एक हैं दीपक शर्मा.

दीपक शर्मा का टी कार्नर विधानसभा सचिवालय से एक फर्लांग की दूरी पर लाल बाग में है. दीपक सुबह छह बजे से रात आठ बजे तक सैकड़ों लोगों को चाय पिलाते हैं.

दीपक ने चार साल पहले आलमबाग के एक साहूकार परिवार से पौने दो लाख रुपए का कर्ज लिया था.

हर दिन वसूली

साहूकार के लोग हर रोज शाम को दीपक से कर्ज की किस्त वसूल कर ले जाते थे. इस तरह दीपक ने चार साल में करीब आठ लाख रुपए अदा कर दिए.

फिर भी, साहूकार का कहना था कि उसने तो केवल रोजाना का ब्याज दिया है. मूलधन तो अभी बाकी है.

साहूकार ने दीपक शर्मा और उसके परिवार को इतना प्रताड़ित किया कि मानसिक तनाव में उसके पिता की मौत हो गई. दीपक स्वयं भी गंभीर रूप से बीमार रहने लगा. मगर फिर भी साहूकार को उसके ऊपर दया नहीं आई.

दीपक का कहना है कि उत्पीडन से उसके दिमाग की एक नस ने काम करना बंद कर दिया था.

दीपक ने बताया “अगर किसी दिन दूकान बंद होने के कारण मैं उनको पैसा नहीं दे पाता था तो मुझे आकर प्रताड़ित करते थे, जैसे कि मेरी शर्ट पकड़कर खींचना. वो मुझे मेरी दूकान के अंदर ले जाकर रिवाल्वर दिखाकर धमकाते थे कि गोली मार दूंगा. मै जब उन्हें कहता था कि इसकी जानकारी पुलिस को दूंगा तो वो कहते थे कि बुला लो पुलिस को, पुलिस कुछ नही कर पाएगी.”

लेकिन साहूकारों के दुर्भाग्य से इसी बीच लखनऊ में नए पुलिस उप-महानिरीक्षक आशुतोष पांडे आ गए जिन्होंने बनारस में सूदखोरी के खिलाफ अभियान चलाया था और उन्हें इस धंधे की गहरी जानकारी थी.

पुलिस अफसर आशुतोष पांडे ने टेम्पू और दूसरी सवारी गाड़ियों में स्टिकर लगवाकर अपना मोबाइल दे रखा है कि कोई सूदखोरी से परेशान हो तो सीधे उन्हें फोन करें.

सूदखोर जेल में

Image caption लखनऊ में पुलिस उप महानिरीक्षक आशुतोष पांडे ने सख्त कदम उठाए हैं

दीपक शर्मा ने अपने उत्पीडन कीं कहानी डीआईजी आशुतोष पांडे को बताई तो उन्होंने साहूकारी अधिनियम के तहत मुकदमा कायम कर साहूकार को जेल भिजवा दिया.

इस कानून में व्यवस्था है कि कर्ज देने वाले साहूकार को अपना पंजीकरण कराना होगा और निर्धारित दर से अधिक ब्याज नहीं वसूलना चाहिए. कोई कर्ज न अदा करे तो उसकी वसूली भी प्रशासन की सहायता के बगैर नहीं होनी चाहिए.

पुलिस डीआईजी आशुतोष पांडे का कहना है कि जो लोग इस तरह सूदखोरी का शिकार होते हैं, वे गरीब और कमजोर तबकों के होते हैं और कई बार उनके परिवार को भी नहीं पता होता कि इतने ऊँचे ब्याज पर कर्ज लिया है.

पांडे का कहना है कि अभी समाज में इस बात की जागरूकता नहीं है कि यह भी एक अपराध है. उन्होंने कहा, “लेने वालों को पता नहीं रहता कि यह भी एक अपराध है. मीडिया को नहीं पता रहता कि यह भी एक अपराध है. हमारी पुलिस को भी नहीं पता था कि यह भी एक अपराध है. यह अपराध है यह किसी को पता नहीं था. इस चीज को उजागर करना, लोगों को इस मामले संवेदनशील बनाता है.”

सभी हैं शिकार

पांडे का कहना है कि उन्होंने लखनऊ में एक दर्जन से ज्यादा सूदखोरों को जेल भेजा है और कर्जदारों को राहत दिलाई है.

जो लोग सूदखोरों के शिकार हुए उनमें सचिवालय के अधिकारी भी शामिल हैं. सूदखोरों ने कई सरकारी दफ्तरों में भी अपना जाल फैला रखा है और वेतन मिलते ही वे वसूली करके ले जाते हैं.

पांडे का सुझाव है कि हर जिले के पुलिस अफसर को अपना फोन नंबर प्रचारित कर सूदखोरी के खिलाफ अभियान चलाना चाहिए.

लेकिन पुलिस और जेल भेजना ही इस समस्या का समाधान नही है. असली समस्या यह है कि चाय वाले, सब्जी वाले, फल वाले, पान वाले, रिक्शा वाले, दर्जी, मोची, छोटे दुकानदार, किसान और मजदूर को बैंकों से कर्ज मिलने में बहुत कठिनाई होती है.

उत्तर प्रदेश में माइक्रो फाइनेंस का आंदोलन कभी पनप ही नहीं पाया और न ही यहाँ उनको सहायता करने की कोई रणनीति थी. इसके कारण लोकल बेस बन नहीं पाया. हार कर कंपनियां वापस चली गयी. इसलिए माइक्रो फाइनेंस के सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश अछूता रहा गया.”

भारत सरकार ने सिडबी अथवा लघु उद्योग विकास बैंक के माध्यम से इस तरह के छोटे कर्ज देने के लिए माइक्रो फाइनेंस कंपनियां खड़ी करने की योजना बनाई थी. इसी योजना के तहत आंध्र प्रदेश की कुछ कंपनियां यहाँ भी आईं. लेकिन आंध्र प्रदेश में समस्या खड़ी होने के बाद वे यहाँ से वापस चली गईं.

ट्रस्ट माइक्रोफिन नेटवर्क के मैनेजिंग ट्रस्टी विनोद जैन कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में माइक्रो फानेंस का आंदोलन कभी पनप ही नहीं पाया और न ही यहाँ उनकी सहायता की कोई रणनीति थी. उसके कारण लोकल बेस बन नहीं पाया. हार कर कंपनियां वापस चली गईं. इसलिए माइक्रो फाइनेंस के सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश अछूता रहा गया.”

जाहिर है कि लोगों को अपना कारोबार चलाने या घरेलू जरूरतों के लिए उधार की पूंजी चाहिए और अगर बैंक या दूसरी वित्तीय संस्थाएं लोगों को आसानी से कर्ज उपलब्ध नहीं कराएंगी तो फिर साहूकार लोगों की मजबूरी का फायदा उठाएंगे ही.

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