साइकिल वाली ब्रांच मैनेजर

सुनंदा दास
Image caption सुनंदा दास कहती हैं कि साइकिल की मदद से वह अपनी सदस्यों के पास जल्दी पहुँच जाती हैं

बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक स्तम्भ 'पेशे ऐसे भी' के तहत इस बार मिलते हैं माइक्रो फाइनेंस कंपनी में ब्रांच मैनजेर पद पर काम कर रही एक ऐसी कर्मठ युवती से, जो अपने ग्रामीण कार्यक्षेत्र के गाँव-गाँव में साइकिल से घूमती है. उसका मानना है कि पेशा जो भी हो, उसमें पद या कुर्सी से ज़्यादा काम की गरिमा और उसके प्रति निष्ठा झलकनी चाहिए.

पश्चिम बंगाल के कोलकाता की रहने वाली और 'बंधन' माइक्रो फाइनेंस सर्विसेज के लिए बिहार के पटना ज़िले में कंकडबाग ब्रांच की मैनजर के रूप में काम कर रही सुनंदा दास से खास बातचीत

इस जॉब में आपके आने की कोई ख़ास वजह थी या सिर्फ एक नौकरी हासिल करना आप का मकसद था ?

मैं इसी तरह का जॉब चाहती थी. इसके बारे में सबसे पहले मैंने अपनी फूफी ( रिश्तेदार) से ये सुना कि दूर-दराज के इलाक़ों में घूमने और ज़रूरतमंद लोगों से मिलकर उन्हें स्व-रोज़गार में मदद पहुँचाने का मौक़ा मिलता है. ये काम मुझे पसंद आया, इसलिए इतनी दूर यानी कोलकाता से बिहार चली आई. साढ़े चार साल से इस पेशे में हूँ.

माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं में मैनजर या उससे नीचे के पदों पर नियुक्ति के लिए किस तरह की योग्यता या पढ़ाई-लिखाई संबंधी डिग्री-डिप्लोमा ज़रूरी है?

कोई विशेष डिग्री नहीं, लेकिन कम-से कम इंटर पास तो होना ही चाहिए. उससे ऊपर बीए हो तो और अच्छा. लेकिन सबसे दिलचस्प बात ये है कि यहाँ मैनजर से नीचे सभी पदों पर काम करने वालों को 'साइकिल चलाना' ज़रूर आना चाहिए. मैं तो ब्रांच मैनजर बन जाने के बाद भी साइकिल से ही अपने क्षेत्र का मुआयना करने जाती हूँ.

ये बताइए कि इसका सेलेक्शन प्रोसेस यानी नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है?

प्रोसेस थोड़ा अलग है. अप्लाई करने वालों को इंटरव्यू के लिए जब बुलाया जाता है, तो सबसे पहले उन्हें सुना दिया जाता है कि कंपनी का दरअसल क्या-क्या काम है. किस तरह के कर्मचारी की ज़रुरत है. ये सुनकर जो ख़ुद को योग्य नहीं समझते, वो इंटरव्यू से पहले ही अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेते हैं. फिर जो इंटरव्यू में सेलेक्ट होते हैं, उन्हें तीन दिनों की ट्रेनिंग दी जाती है. इस ट्रेनिंग के बाद कुछ ऐसे लोग छंट जाते हैं, जो इस जॉब के काबिल साबित नहीं हो पाते.

मतलब रोज़ी रोटी के लिए छोटा-मोटा काम-धंधा चाह रहे लोगों को छोटे क़र्ज़ (माइक्रो क्रेडिट) का लाभ समझा सकने और क़र्ज़ वसूली में कुशल साबित होने वालों की नियुक्ति हो ही जाती है.

आप ठीक समझे. और ये भी जान लीजिये कि इस पेशे में सिर्फ ऋण बांटने और सूद समेत रक़म वसूलने से काम नहीं चलता, गरीब लोगों को रोज़गार का रास्ता बताना, उन्हें बोल-व्यवहार से सहारा देना और ज़रुरत पड़े तो पहले मुफ़्त में मदद करके आगे ऋण चुकाने लायक बनाना इस पेशे में सफल होने की निशानी है.

ऐसा और क्या ख़ास आकर्षण है इस जॉब में कि इसकी तरफ़ बेरोज़गार युवाओं का रुझान हो और एक अच्छे करियर के रूप में इसे चुना जाए?

देखिए, इसमें प्रमोशन का बहुत स्कोप है. मेहनत और लगन से काम करने वाले हर साल टेस्ट में पास करके प्रमोशन और अन्य सुविधाएँ हासिल कर लेते हैं. ख़ासकर इस पेशे में महिला कर्मचारियों या अधिकारियों को आगे बढ़ने का बहुत मौक़ा मिलता है.

आप अभी जिस पद पर हैं, वहाँ से आगे किस पद तक जा सकती हैं?

डीजीएम तक जा सकती हूँ. मैंने यहाँ महिलाओं को और भी ऊंचे पदों तक पहुँचते हुए देखा-सुना है. और हमारी ये कंपनी तो महिलाओं के ग्रुप को ही ज़्यादा ऋण-सहायता देती है, इसलिए ऐसी माइक्रो क्रेडिट संस्थाओं को इंटर तक पढ़ी-लिखी युवा महिलाओं की ज़्यादा ज़रुरत है. काम के हिसाब से तनख़्वाह भी ठीक-ठाक मिल जाती है.

ग्रामीण या कस्बाई इलाक़ों में घूम-घूम कर काम करने वाला ये जॉब, क्या अविवाहित लड़कियों या युवा महिलाओं के लिए मुश्किल नहीं माना जाता?

मेरी समझ में कोई मुश्किल तब तक पेश नहीं आती, जब तक ख़ुद की सोच और मनोबल पर भरोसा हो. ऐसे में दोस्त या साथी से भी बल मिलता है. मैं अकेली दूर-दूर तक साइकिल चलाती हुई गाँव-गाँव में घूम आती हूँ. अपना व्यवहार ठीक है तो सब ठीक है.

लेकिन एक बात बताइए कि साइकिल से काम पर जाना क्या आप की मजबूरी है? ब्रांच मैनजर पद पर होते हुए भी आप के पास कोई गाड़ी या दफ़्तर में बड़ा-सा चेंबर नहीं होना क्या आप को अखरता नहीं?

सच पूछिए तो बिलकुल नहीं अखरता. बल्कि मुझे अच्छा लगता है. किसी ट्रैफिक जाम में फंसे बिना जब मैं गाँव या शहर की तंग गलियों से गुज़रते हुए अपने ग्रुप की सदस्य महिलाओं के घर पहुँच जाती हूँ तो उनसे लगाव या अपनापन और बढ़ जाता हैं. ग़रीब परिवारों के बीच मेरी पैठ किसी पद या गाड़ी के बूते नहीं हुई. इसी साइकिल वाली सामान्य-सी पहचान लेकर मैं उनकी हमदर्द बन पाई हूँ.

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