ब्राजील की झुग्गियों में हुए भारत के दर्शन

  • 15 जुलाई 2012
Image caption सुकेतु मेहता मानते हैं कि मुंबई और रियो दे जनेरो के झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में कई समानताएं हैं

भारत और ब्राजील दोनो विकासशील देश हैं और कई मामलों में दोनो देशों में कई समानताएँ हैं.

ब्राज़ील के रियो दी जनेरो शहर में कोपाकबाना और इपानेमा इलाकों के बीच में स्थित है कांटागालो हिल इलाका जहां तक पहुंचने के लिए लिफ्ट है. इस झुग्गी-झोपड़ी इलाके तक पहुंचने का ये नया साधन है.

यहाँ भारतीय लेखक सुकेतु मेहता भी पहुँचे.

लिफ़्ट से इस इलाके का जायज़ा कर रहे मेहता कहते हैं, "अगले पांच-दस वर्षों में इस इलाके के कई निवासी यहां का किराया नहीं दे पाएंगे."

सुकेतू मेहता ने मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों का भी यही हाल होते देखा है. किशोरावस्था तक मुंबई में रहने वाले सुकेतू बाद में अमरीका चले गए. जब 20 साल बाद वे वापिस मुंबई लौटे तो उन्हें इन झुग्गी-झोपड़ियों की जगह एक "शहर" मिला जो उनके उपन्यास 'मैक्सिमम सिटी: मुंबई' का आधार बना.

सुकेतू मानते हैं कि अब जबकि कांटागालो पहुंचना पहले से आसान हो गया है और यहां की सुरक्षा भी पहले से बेहतर है, यहां पर रियल एस्टेट के दाम तेज़ी से बढ़ेंगे.

वे कहते हैं, "यहां के निवासियों को नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार करने वालों से ज़्यादा ख़तरा रियल एस्टेट मार्किट से होगा."

कई भारतीय बड़े और छोटे शहरों औऱ गाँवों में लोगों की यही शिकायत है.

हालांकि सुकेतू मेहता कांटागालो में पहली बार बुधवार को पहुंचे, लेकिन उन्होंने पिछले वर्ष दिसंबर रियो के अन्य झुग्गी-झोपड़ी इलाकों का दौरा किया था. ये दौरा सुकेतू ने बड़े शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों पर फोटोग्राफर रॉबर्ट पोलिडोरी की किताब की प्रस्तावना लिखने के लिए किया था.

इस बार सुकेतू मेहता ब्राज़ील एक अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक समारोह में भाग लेने आए थे. इस दौरान वे बीबीसी की ब्राज़ील सेवा के साथ कांटागालो भी गए और वहां की और अपने देश भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के बीच समानता का ज़िक्र किया.

वही गलियां, वही महक

उन्हें कांटागालो में भी मुंबई के झुग्गी-झोपड़ी इलाकों जैसे ही खुली नालियां, कूड़े के ढेर, तंग गलियां, खाना पकने की महक और ऊंची आवाज़ में चल रहे टीवी दिखे. साथ ही उन्हें दिखे छतों पर पतंग उड़ाते बच्चे.

लेकिन सुकेतू को दोंनो शहरों में कुछ फ़र्क भी नज़र आए जिनमें से मुख्य फ़र्क रियो की झुग्गी-झोपड़ियों में पुलिस की मौजूदगी थी.

Image caption रियो द जनेरो शहर औऱ मुंबई में कई समस्याएँ एक जैसी हैं

पुलिस की मौजूदगी की वजह इन इलाकों से हो रहे नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार है और अब पुलिस की कोशिश है इस काम से जुड़े लोगों को सुधारने की.

सुकेतू मेहता को वहां के निवासियों ने बताया कि अब भी कांटागालो में नशीले पदार्थों के कुछ तस्कर हैं और इनसे निपटने में पुलिस को निवासियों के विरोध का सामना करना पड़ता है क्योंकि कई लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर इस व्यापार से जुड़े हैं.

सतही कदम

नदी के तट पर 600 से ज़्यादा झुग्गी-झोपड़ी इलाके हैं और सुकेतू मेहता कहते हैं कि रियो की झुग्गी-झोपड़ियों में सुधार कार्यक्रम पूरी तरह लागू नहीं हुआ है.

उनके मुताबिक भले ही मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों में ग़रीबी ज़्यादा हो लेकिन रियो की झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में हिंसा कहीं अधिक है.

लेकिन रियो के जिन समुदायों में सुधार कार्यक्रमों का असर पड़ रहा है वहां के निवासी अब चैन की सांस लेना सीख रहे हैं.

लेकिन सुकेतू कहते हैं, "हम एक निरंकुशता को दूसरी तरह की निरंकुशता की जगह नहीं लेने दे सकते. पुलिस को इस बात का ध्यान रखना होगा."

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