वाजपेयी और फ़र्नांडीस को नहीं बुलाएगी जेपीसी

  • 15 जुलाई 2012
अटल बिहारी वाजपेयी इमेज कॉपीरइट AP
Image caption जेपीसी ने कहा है कि वाजपेयी और फ़र्नांडीस को बुलाने की जरूरत नहीं होगी

2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति या जेपीसी ने कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडीस को समिति के सामने गवाही देने के लिए नहीं बुलाया जाएगा.

समिति को दिसंबर 2012 तक अपनी रिपोर्ट तैयार करनी है.

जेपीसी के अध्यक्ष पीसी चाको गवाहों की सूची तैयार करने के लिए समिति के सदस्यों से मुलाक़ात कर रहे हैं.

इसी सिलसिले में अध्यक्ष चाको ने कहा कि ख़राब स्वास्थ के कारण अटल बिहारी वाजपेयी और जॉर्ज फ़र्नांडीस को गवाह के रूप में समिति के सामने पेश होने के लिए नहीं कहा जाएगा.

उन्होंने कहा कि जेपीसी कार्यालय ने गवाहों की जो सूची तैयार की थी उनमें उन दोनों के नाम भी शामिल थे जिसे जानकर उन्हें काफ़ी दुख हुआ.

चाको का कहना था, ''ऐसे सुझाव थे. मुझे अफ़सोस है कि उनके नाम थे. लेकिन उनको बुलाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता.''

अटल बिहारी वाजेपयी का नाम इसलिए आया था क्योंकि एनडीए के शासन काल में कुछ समय के लिए दूरसंचार मंत्रालय का कार्यभार उनके पास था जबकि जॉर्ज फ़र्नांडीस का नाम इसलिए आया था क्योंकि फर्नांडीस एनडीए कार्यकाल में दूरसंचार पर गठित मंत्रियों के समूह के अध्यक्ष थे.

गवाहों की सूची में वाजेपयी का नाम शामिल किए जाने पर जेपीसी की एक बैठक के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिंहा ने कड़ी आपत्ति जताई थी.

काम में प्रगति

ख़बरों के मुताबिक़ जेपीसी में एक आम धारणा थी कि मौजूदा या पूर्व मंत्रियों को समिति के सामने गवाह के रूप में बुलाने की कोई ज़रूरत नही हैं क्योंकि रिपोर्ट बनाने के लिए समिति के पास पर्याप्त सामग्री है.

जेपीसी के काम में प्रगति के बारे में चाको का कहना था, ''समिति का मानना है कि इसके कार्यकाल में अब और बढ़ोत्तरी नहीं होनी चाहिए. गवाहों की सूची तैयार करने के लिए मैं सभी 30 सदस्यों से एक-एक करके मिल रहा हूं. जो नाम ज़रूरी नहीं हैं उन्हें हटा दिया जाना चाहिए. सदस्यों ने पहले कुछ नाम सुझाए थे जो अब प्रासंगिक नहीं है.''

चाको ने कहा कि अगले सप्ताह सीबीडीटी के अधिकारी, उसके बाद सीबीआई के अधिकारी और फिर उसके बाद दूरसंचार तथा वित्त मंत्रालय के अधिकारी समिति के सामने पेश होंगे.

लेकिन ये पूछे जाने पर कि वे कब तक रिपोर्ट लिखना शुरू कर देंगे, चाको का कहना था, ''हमें मसौदे को अंतिम रूप देने और संसद के शीतकालीन सत्र में रिपोर्ट पेश करने से पहले उन पर विचार विमर्श करने के लिए दो महीने चाहिए.''

पिछले साल यानी कि 2011 में गठित संयुक्त संसदीय समिति की मुख्य ज़िम्मेदारी 1998 से लेकर 2009 तक अपनाई गई दूरसंचार नीति की जांच करना और ये देखना था कि कहीं उनमें कोई गड़बड़ी तो नहीं हुई है.

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