लड़के गाँव में और लड़कियाँ शिविरों में हैं: शरणार्थी

  • 30 जुलाई 2012
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Image caption असम में बोडो जनजाति और गैर बोडो प्रवासियों के बीच हिंसा में कई गांव जला दिए गए हैं.

असम में बोडो आदिवासियों और गैर बोडो प्रवासियों के बीच हुई हिंसा में अब तक पचास से ज्यादा लोग मारे गए हैं. राज्य के कोकराझाड़, चिरांग, बकसा, धुबरी और बोंगाइगांव हिंसा से प्रभावित हैं. सबसे ज्यादा हिंसा कोकराझार जिले में हुई है वैसे अब वहां हालात तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में हैं. हिंसा प्रभावित जिलों से पलायन कर क़रीब तीन लाख लोगों ने राहत शिविरों में शरण ले रखी है.

बीबीसी बांग्ला सेवा के संवाददाता शुवोजीत बागची कोकराझाड़ जिले के ऐसे ही एक राहत शिविर में पहुंचे जो शोतोकेंद्राविल में है. वहां उन्होंने अपना गांव छोड़कर राहत शिविर में दिन गुजार रहे दो लोगों- तकदीर बासुमतारी और इलोरा से बात की.

आपको क्या लगता है तनाव और बढ़ेगा या घटेगा, क्या होगा या फिर से हिंसा होगी, क्या लगता है?

तकदीर- हमारे बोडो समुदाय के बहुत से लोगों ने अपना गांव छोड़ दिया है. ऐसे लोग ढुबरी में भी रहते हैं जहां ज्यादातर मुसलमान रहते हैं. जब इन लोगों को सरकार वापस उनके गांवों में भेजेगी तो हिंसा भड़क सकती है. एक भी व्यक्ति के ऊपर अगर हमला होता है तो माहौल फिर से बिगड़ सकता है.

चाहे वो बोडो हो या मुसलमान ?

तकदीर- हां. कोई भी व्यक्ति चाहे वो बोडो हो या मुसलमान. एक जगह में किसी को भी अगर मारा जाता है तो माहौल बिगड़ सकता है. इसीलिए मैं चाहता हूँ कि दोनों समुदायों के लोग शांति से रहें.

यानि अब हिंसा को उकसाना बहुत आसान हो गया है. कोई छोटा सा हादसा हो जाए तो भी हिंसा भड़क सकती है.

हालात इतने खराब हो गए हैं कि मुसलमानों को अगर कोई गैर बोडो व्यक्ति भी मारता है तो यही समझा जाएगा कि बोडो लोगों ने ही ये हत्या की है. किसी ने भी अगर मुसलमान लोगों का घर जला दिया तो वो यही समझेंगे कि ये बोडो लोगों की हरकत है. मुसलमान बहुल आबादी वाले गांवों में अब बोडो लोगों के घर बचे ही नहीं होंगे क्योंकि वो सब जला दिए गए होंगे. सारी संपत्ति लूट ली गई होगी. वहां पर कुछ भी बचा नहीं होगा. वहां सिर्फ ज़मीन होगी, जमीन के अलावा कुछ भी नहीं बचा होगा. इसलिए वहां पर जाकर बसने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है. और अब तो गांव तक जाना भी मुश्किल है. किसी एक ने भी हमला किया तो सब मारे जाएंगे.

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Image caption लोगों ने अपना घरबार छोड़कर राहत शिविरों में शरण ले रखी है.

आप लोग कैंप में कब आए?

इलोरा- शनिवार, 21 जुलाई को.

ये सब आस-पास के गांव के ही लोग हैं?

इलोरा- हां. इनमें हमारे गांव के लोग हैं और दूर गांव के लोग भी हैं जिनका घर-बार जल गया है. हमारा तो कुछ नहीं हुआ लेकिन हमला होने के बाद हम लोग यहां चले आए हैं.

तो क्या हमला करने वाले ज्यादातर लोग बंगाली मुसलमान थे या कौन थे?

इलोरा- बंगाली तो नहीं थे लेकिन मुसलमान थे.

तो क्या सारे लोग मुसलमान हैं?

इलोरा- ये हमारे गांव के लोग नहीं हैं. गांव के लोग तो बाहर चले गए हैं और बाहर के लोग गांव में आ गए और हम पर हमला कर दिया. हमारे लड़के तो कहते हैं कि इन लोगों को वो पहचानते ही नहीं हैं.

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Image caption असम के हिंसा प्रभावित जिलों में सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं.

आपका घर भी जला है?

इलोरा- नहीं हमारा घर तो नहीं जला लेकिन दुकान को थोड़ा नुकसान हुआ है.

यहां पर ज्यादातर मैं देख रहा हूं कि महिलाएं हैं तो पुरुष कहां हैं?

इलोरा- लड़के लोग गांव में हैं और लड़कियों को उन्होंने यहां भेज दिया है. वो लोग रात में ड्यूटी करते हैं और दिन में एक साथ मिलकर खाना बनाते हैं खाते हैं.

यहां पर जो मैं खाना देख रहा हूं चावल वगैरह ये कहां से आ रहा है.

इलोरा- ये तो सरकार ने दिया है.

क्या-क्या दिया है सरकार ने.

इलोरा- पहले जब शनिवार को हम यहां आए थे तो दाल और आलू, सोयाबीन वगैरह था लेकिन अभी तो सब काफी कम हो गया है. हमारी पार्टी ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन हमें खाना दे रही है.

अभी हालात क्या है?

इलोरा- बता रहे हैं कि हालात अच्छे हो गए हैं. लेकिन शिविर से घर जाने के लिए हमें अभी तक नहीं कहा गया है.

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