बलात्कार संबंधी 'सुधार,' मर्दों के लिए खतरा?

  • 20 जुलाई 2012
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Image caption बलात्कार के अधिकांशतर मामले पुलिस में दर्ज ही नहीं होते हैं.

भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'बलात्कार' के स्थान पर 'यौन उत्पीड़न' शब्द लगाकर इसे लिंग के भेद के आधार से मुक्त 'अपराध' घोषित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है. साथ ही एसिड एटैक के मामलों में सजा बढ़ाने के लिए आपराधिक दंड कानून को संशोधित करने के प्रस्ताव पर भी मुहर लगाई है.

भारतीय दंड संहिता संशोधन विधेयक 2012 के भीतर प्रस्तावित इन कानूनी सुधारों में यौन हिंसा के इरादे से किसी का पीछा करने, किसी पर तेजाब फेंकने या फिर हिरासत में बलात्कार के मामले में अधिक कड़ी सजा का प्रावधान है ताकि कोई बलात्कार पीड़ित के किरदार पर उंगली उठाकर सजा से न बच पाए.

भारतीय क्राइम रिकार्डस ब्यूरो के मुताबिक, देश में पिछले साल 24,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज किए गए लेकिन उनमें से महज 26 प्रतिशत मामलों में ही दोषियों को सजा हो पाई.

महिला संगठन और समाजशास्त्री बार-बार कहते रहे हैं कि समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों के चलते बलात्कार के ज्यादातर मामले दर्ज हो ही नहीं पाते हैं.

विरोध

संशोधन में चर्चा किए जाने वाले विषयों में एक ये भी है कि अब 'बलात्कार' की परिभाषा को व्यापक बनाया जाएगा और पहले के उलट पुरूष भी बलात्कार की शिकायत दर्ज कर पाएंगे. साथ ही बलात्कार की जगह 'यौन हिंसा' शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा.

लेकिन महिलाओं और बच्चों के साथ काम करनेवाले स्वंयसेवक, संगठन और कानून के जानकार नए संशोधनों पर सवाल उठा रहे हैं. उनका मानना है कि प्रस्तावित संशोधन मामले को और उलझा देंगे.

वकील वृंदा ग्रोवर का कहना है कि लिंग-भेद की समाप्ति का ख्याल ही बड़ा आश्चर्यजनक है क्योंकि अभी तक कोई मामला सामने नहीं आया है जिसमें किस मर्द या मर्दों ने बलात्कार पीड़ित होने की शिकायत की हो.

उनके मुताबिक जब गुवाहाटी जैसा यौन हिंसा का मामला अभी लोगों के दिमाग में बिल्कुल ताजा है, जिसमें एक युवती पर लगभग बीस लोगों ने हर तरफ से हमला किया, सरकार का ये कदम 'नकारात्मक' है.

वृंदा ग्रोवर का कहना है कि अगर लिंग-भेद समाप्ति का मामला बाल यौन शोषण को खत्म करने के नाम पर लाया जा रहा है तो उसके लिए अलग से कानून तैयार हो चुका है.

विपरीत लिंग कामी

लेखक और पत्रकार पिंकी विरानी का तो कहना है कि पूरा प्रावधान 'हेटरोसेक्शूयल' पुरूषों यानि वो मर्द जो विपरीत लिंग से यौन संबंध बनाते हैं, के लिए खतरे की घंटी है.

वो सवाल करती हैं कि ऐसी स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 जो गुदा-मैथुन से संबंधित है, उसका क्या होगा, क्या वो खत्म कर दिया जाएगा?

वो कहती हैं कि अगर किसी 'हेटरोसेक्शूयल' पुरूष के साथ यौन हिंसा का मामला पुलिस में दर्ज होता है तो ये कैसे तय होगा कि उक्त कृत्य स्वेच्छा से हुआ या जोर-जबरदस्ती? क्योंकि किसी पुरूष के साथ स्वेच्छा या अनिच्छा किसी भी तरह से 'पेनिट्रेशन' यानी गुदा मैथुन होने से शरीर को चोट पहुंचना स्वाभाविक है.

उनका मानना है कि समलैंगिक यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से हटाने या न हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मौजूद है और पहले इस बात का इंतजार करना जरूरी है कि अदालत इस मामले में क्या फैसला लेती है.

'पश्चिमी देशों में लिंग भेद खत्म'

वृंदा ग्रोवर ये मानती हैं कि कई पश्चिमी देशों में बलात्कार के मामले में लिंग भेद को समाप्त कर दिया गया है लेकिन उनके मुताबिक ऐसा उन मुल्कों में है जहां समलैंगिक रिश्तों को कानूनी मान्यता प्राप्त है यानी दो समलैंगिक लोग शादी कर सकते हैं, बच्चे को गोद ले सकते हैं.

वो कहती है कि उन देशों में स्त्री और पुरूष का वो भेदभाव नहीं है जो हमारे समाज में व्याप्त है जहां पंचायत ये फैसला करती है कि वो मोबाइल रख सकती हैं या नहीं या उन्हें कैसे कपड़े पहनने हैं.

महिलाओं के साथ काम करने वाले संगठनों का कहना है कि अभी जरूरत इस बात की है कि महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा की परिभाषा को व्यापक किया जाए.

सत्तर संगठनों और देश के जाने माने 100 व्यक्तियों ने कांग्रेस प्रमुख और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक चिट्ठी भेजकर मांग की है कि किसी को निर्वस्त्र किए जाने जैसे कृत्य को भी यौन हिंसा के दायरे में लाया जाना चाहिए.

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