प्रणब मुखर्जी: राष्ट्रपति पद तक का सफर

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Image caption इससे पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी कई मंत्रालयों का कार्यभार संभाल चुके हैं.

भारत के 13वें राष्ट्रपति का कार्यभार संभालने जा रहे प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस पार्टी का संकटमोचक माना जाता रहा है.

कई मंत्रालयों का कार्यभार संभाल चुके 76 वर्षीय प्रणब मुखर्जी राजनीति में चार दशक से अधिक समय बिता चुके हैं.

वे जुलाई 1969 में पहली बार राज्य सभा में चुनकर आए. तबसे वे कई बार राज्य सभा के लिए चुने गए हैं.

फरवरी 1973 में पहली बार केंद्रीय मंत्री बनने के बाद मुखर्जी ने पिछले चालीस साल में कांग्रेस की या उसके नेतृत्व वाली सभी सरकारों में मंत्री पद संभाला है.

वर्ष 1996 से लेकर 2004 तक केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार रही लेकिन 2004 में यूपीए के सत्ता में आने के बाद से ही प्रणब मुखर्जी केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी के संकटमोचक के तौर पर काम करते रहे हैं.

वो सरकार की कई समितियों की अध्यक्षता करने के अलावा कांग्रेस पार्टी में भी एक अहम भूमिका निभाते हैं.

कांग्रेस से अलग

लेकिन इस कांग्रेसी दिग्गज ने 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद पार्टी को छोड़ भी दिया था.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी की सरकार में प्रणब मुखर्जी को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था.

इससे नाराज प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस नाम के अपने दल का गठन किया था.

लेकिन पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेसी मुख्यधारा में शामिल कर लिया था.

पारिवारिक पृष्ठभूमि

प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में हुआ था. उन्होंने इतिहास और राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की है.

उनके पिता, कामदा किंकर मुखर्जी, एक स्वतंत्रता सेनानी थे और वो 10 वर्ष से भी अधिक जेल में रहे. उन्होंने 1920 से लेकर सभी कांग्रेसी आंदोलनों में हिस्सा लिया.

वो अखिल भारतीय कांग्रेस समिति और पश्चिम बंगाल विधान परिषद (1952- 64) के सदस्य‍ व जिला कांग्रेस समिति, वीरभूम (पश्चिम बंगाल) के अध्यक्ष रहे.

प्रणब मुखर्जी के पुत्र अभीजित मुखर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में विधायक हैं.

संसद में

प्रणब मुखर्जी को पहली बार जुलाई 1969 में राज्य सभा के लिए चुना गया था.

उसके बाद वे 1975, 1981, 1993 और 1999 में राज्य सभा के लिए चुने गए.

वे 1980 से 1985 तक राज्य में सदन के नेता भी रहे.

मुखर्जी ने मई 2004 में लोक सभा का चुनाव जीता और तब से उस सदन के नेता थे.

माना जाता है कि यूपीए सरकार में प्रणब मुखर्जी के पास सबसे ज़्यादा जिम्मेदारियाँ थीं और वे वित्तमंत्रालय संभालने के अलावा बहुत से मंत्रिमंडलीय समूह का नेतृत्व कर रहे थे.

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