हथियारों में कमी, सेना की जरूरतें पूरी न हुईं: पूर्व सेनाध्यक्ष

  • 26 जुलाई 2012
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Image caption करगिल युद्ध में भारत के 527 जवान नियंत्रण रेखा के पास कारगिल में मारे गए थे

करगिल युद्ध के 13 साल बाद भी भारत सरकार ने इस युद्ध से कोई सबक नहीं सीखा है. सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि सुरक्षा को लेकर भारतीय नेताओं में गंभीरता की कमी है.

बीबीसी से फोन पर बातचीत में भारतीय सेना के तत्कालीन सेनाध्यक्ष वीपी मलिक ने कहा, ''यूं तो करगिल के क्षेत्र में काफी बदलाव और सुधार ले लाए हैं, संचार में सुधार हुआ है. सेना की उपस्थिति भी अधिक है. लेकिन कुल मिलाकर हमारी सीमाओं पर जो खतरा है, हमारे हथियारों में कमियां हैं, जो फौज को जरूरते हैं वो पूरी नहीं हो पा रही हैं.''

उन्होंने कहा कि पूर्व सेना अध्यक्ष वीके सिंह ने इस बारे में प्रधानमंत्री को चिट्ठी भी लिखी थी.

साल 1999 के करगिल युद्ध में भारत के 527 जवान भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा के पास करगिल में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ते हुए मारे गए थे.

संकट के समय

जनरल मलिक ने भारतीय सेना की जरूरतों के बारे में नौकरशाहों को भी जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, ''संकट के समय में तो हम हथियारों और फौज की बाकी जरूरतों के बारे में बात करते हैं लेकिन संकट बीत जाने के बाद हम उसे भूल जाते हैं. हमारी प्रक्रिया ही कुछ ऐसी है.''

रक्षा विशेषज्ञ कोमोडोर उदय भास्कर ने भी कुछ ऐसी ही राय जताई.

उन्होंने कहा, ''भारत में सुरक्षा व्यवस्था में जिन बदलावों की बहुत जरूरत है उस पर न तो सही बहस हुई है, न ही इस पर निर्णय के लिए लोग तैयार हैं.''

कोमोडोर उदय भास्कर ने कहा, ''शायद हमारे देश के राजनीतिक ढांचे में राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में लोग उतनी गंभीरता से नहीं लेते हैं.''

'केवल बहस होती है'

उन्होंने कहा कि करगिल या मुंबई होता है तो एक दिन के लिए संसद में बहस होती है इससे ज्यादा कुछ नहीं.

उनके मुताबिक युद्ध में सामने आई खामियों और गलतियों को दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाने के लिए बनाई गई करगिल रिव्यू कमिटी की कोई सिफारिश नहीं लागू की गई है.

उदय भास्कर ने कहा कि इस बात पर काफी जोर दिया गया था कि भारत की सभी गुप्तचर एजेंसियां अलग अलग तरीके से काम करती हैं और उन्हें सुयुक्त रूप से काम करने की जरूरत है.

उन्होंने कहा, ''आज भी ऐसा ही है चाहे आप गु्प्त जानकारी इकट्ठा करने की बात करें या फिर उसकी सही तरीके से आंकने की. भारत की जो आंतरिक सुरक्षा है और बाहर की चुनौतियां हैं और उनके संदर्भ में विभिन्न एजेंसियों के बीच समनवय की जरूरत है.''

उन्होंने कहा कि नरेश चंद्रा कमेटी ने एक और मुद्दा उठाया था और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के चीफ या अध्यक्ष लगाने की बात की है जो बहुत अहम है. उन्होंने कहा, ''कमेटी ने इसका जिक्र किया है कि अगर यह नहीं हो सकता तो कम से कम एक स्थाई चेयरमैन होना चाहिए ताकि रक्षा प्रबंधन के सर्वोच्च स्तर पर एक निरंतरता रहे.''

जनरल मलिक ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि इन सबके बावजूद हमारे फौजी पूरी ताकत से हर हमले का जवाब देंगे.

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