बस तीन दिन पहले तक दोस्त थे सब...

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Image caption असम में बोडो और अल्पसंख्यक प्रवासियों के बीच हिंसा पिछले कई दिनों से जारी है

असम के चिराग जिले में माजराबाद गांव में ज्यादातर मुसलमान रहते हैं. लेकिन अब शायद यह कहना होगा कि यह लोग रहते थे. क्योंकि यहां 60 से 70 प्रतिशत घर जला दिए गए हैं.

ऐसी ही कहानी है असम के चार जिलों के कई गांवों में लोग सुना रहे हैं. असम में बोडो और अल्पसंख्यक प्रवासियों के बीच हिंसा पिछले कई दिनों की हिंसा में 40 से अधिक लोग मारे गए हैं.

माजराबाद के गांववासी बताते हैं कि सोमवार कुछ हथियारबंद लोग आए और पेट्रोल और मिट्टी के तेल से सब जलाकर चले गए. वे कहते हैं कि यह काम बोडो लोगों का था.

लकड़ी और सूखी घास से बने घरों के नाम पर बस अब जले हुए खंडहर रह गए हैं. गांव के अंदर कोई सुरक्षा नहीं है.

कुछ ही दूरी पर एलबी स्कूल में लगभग 2000 लोगों का शिविर है. जिसमें 600-700 छोटे बच्चे हैं. लोगों की हालत खराब है. कोई सरकारी राहत अभी तक यहां नहीं पहुंची है.

यहां लोग सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे. लोगों में डर साफ झलकता है.

यहां पर एक महिला फिरोजा बहुत रो रही थी. उसने बताया कि कैसे कुछ लोग आए और उसके घर वालों को पीटने लगे. वे कहती हैं, ''कुछ भी नहीं रह गया है सब कुछ खो गया है. पता नहीं कैसे जिएंगे यहां पर.''

'डर फैला है'

गांव के रहने वाले अबदुल हमीद ने बताया कि इसी गांव से सटा है बोडो समुदाय के लोगों का गांव नोआपारा.

हमीद ने कहा, ''सोमवार तक ये बोडो हमारे दोस्तों की तरह थे. इस हादसे के बाद से अब एक दूसरे से बहुत डरे हुए हैं. एक घिनौनी राजनीति खेली गई है.''

इस इलाके में यह अकेला गांव ऐसा नहीं है जहां हमले हुए है. कुछ लोगों ने बताया कि पास के बोडो के गांव में भी ऐसा हमला हुआ है.

असम के चार जिलों में बोडो और अल्पसंख्यक प्रवासियों के बीच हिंसा पिछले कई दिनों से जारी है जिसमें अब तक 40 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है.

शुक्रवार को मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा कि उन्हें केंद्र से इस घटना से पहले कोई गुप्त सूचना नहीं दी गई थी. पत्रकारों के बातचीत में उन्होंने कहा, ''अगर केंद्र को इसके बारे में पता था तो सेना को पहले क्यों नहीं भेजा गया.''

उन्होंने माना कि दोनो समुदायों में काफी डर फैला है और सरकार का पहला काम होगा कि लोगों में विश्वास लौटाया जाए.

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