मायावती की मूर्ति पर मारामारी

  • 27 जुलाई 2012

अखिलेश यादव को मायावती का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने अपनी प्रतिमाएं बनवाकर स्टाक में रख छोडी थीं और मूर्ति तोड़ने की खबर आने के बाद भी अपने समर्थकों को संयम रखने की सलाह दी वर्ना आज उत्तर प्रदेश में सामाजिक अशांति का माहौल होता और उसको काबू करना पुलिस प्रशासन के लिए आसान नही होता.

समीक्षक भले ही कहें कि मुख्यमंत्री अखिलेश समय से और परिपक्व निर्णय नही लेते, लेकिन मायावती कि प्रतिमा के तोड़े जाने की खबर मिलते ही जिस तरह से उन्होंने प्रशासन को शरारती तत्वों के खिलाफ कार्यवाही और प्रतिमा को उसी रूप में वापस बहाल करने के निर्देश दिए, उससे अधिकारियों और समाजवादी पार्टी के समर्थकों में साफ सन्देश चला गया कि मायावती की मूर्तियों के मामले में टकराव का पुराना रवैया छोड़ दिया गया है.

अब समाजवादी पार्टी के समर्थक दबी जुबान से इस “विडंबना” को बर्दाश्त करने की बात कर रहे हैं कि सत्ता में आने से पहले मूर्तियों को बुलडोजर से तोड़ने की बात कहने वाले स्वयं मायावती की मूर्ति लगा रहें हैं और उनकी रखवाली भी कर रहे हैं.

बताया जाता है कि समाजवादी पार्टी और सरकार में कई लोग इस राय के थे कि नई मूर्ति लगवाने के बजाय तोडी गयी मूर्ति की ही मरम्मत करवा दी जाए. लेकिन मुख्यमंत्री ने उनकी नहीं सुनी और प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए कि नई मूर्ति लगवाई जाए.

कोई मूर्तिकार दो महीने से पहले नई प्रतिमा बनाकर देने को तैयार नही था. मगर इसी बीच लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट अनुराग यादव ने अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल के समीप ही रखी मायावती की दूसरी मूर्ति को खोज निकलवाया और कारीगर बुलाकर उसे रातोंरात क्षतिग्रस्त प्रतिमा की जगह खड़ी करवा दिया.

चूँकि अभी इस मूर्ति की सफाई और पॉलिश वगैरह बाक़ी है, इसलिए फिलहाल उसे चारों तरफ से कपडे से ढँक दिया गया है. समझा जाता है कि जल्दी ही प्रतिमा से पर्दा हट जाएगा.

मायावती द्वारा बनायी गयी स्मारक सुरक्षा वाहिनी के जवान अब नीली वर्दी में मुस्तैदी से मूर्तियों के इर्दगिर्द पहरा दे रहें हैं. एहतियातन भारी तादाद में पुलिस बल तैनात कर मूर्तियों और स्मारकों की किलेबंदी कर दी गयी है.

मगर मुद्दा यहीं समाप्त नही हो गया. यूपी नव निर्माण सेना के अमित जानी नाम के जिस व्यक्ति ने मूर्ति तोड़ने की योजना को अंजाम दिया वह मेरठ में समाजवादी पार्टी का जाना पहचाना नेता है.

इसलिए इस घटना ने मायावती को यह मौक़ा दिया है कि वह इस मुद्दे को दलित समुदाय की अस्मिता और गरिमा से जोड़ें.

दलित अस्मिता और वादाखिलाफी

मायावती ने अपनी, अपने नेता कांशी राम और अन्य दलित महापुरुषों की प्रतिमाएं इसी आधार पर सरकारी खर्चे पर सार्वजनिक स्थानों पर लगवाई थीं कि इनसे सदियों से दबे कुचले दलित समुदाय का सामाजिक गौरव और स्वाभिमान बढ़ेगा.

मायावती ने जिस तरह पूरे देश से अपने समर्थकों को लखनऊ बुला- बुलाकर इनका दर्शन कराया उसके पीछे यह भावना भी छिपी थी कि उनका कद डाक्टर अम्बेडकर और दूसरे दलित महापुरुषों से बड़ा हो जाए. ऐसा हुआ भी.

कुछ दलित बुद्धिजीवियों को छोड़कर, दलित समुदाय में ज्यादातर लोगों ने इसे सार्वजनिक धन और स्थान का दुरूपयोग नही माना.

मूर्ति के पीछे मायावती की इस राजनीति ने विरोधी दलों को इसे मुद्दा बनाने के लिए प्रेरित किया. समाजवादी पार्टी के नेताओं ने आगे बढ-चढ कर कह दिया कि सत्ता में आने पर इन मूर्तियों पर बुलडोजर चलवाकर तोड़ दिया जायेगा.

कोई दो राय नही कि इस घोषणा से बसपा विरोधी लोग समाजवादी पार्टी के साथ गोलबंद हुए और चुनाव में उसे उसका लाभ मिला.

यूपी नव निर्माण सेना के अगुवा अमित जानी का आरोप है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव द्वारा यह कहना कि मूर्तियां नही हटायी जायेंगी उसी तरह की वादा खिलाफी है जैसे भारतीय जनता पार्टी ने अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे पर की थी.

अमित जानी और उसके साथियों ने मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन में मूर्तियों को हटाने के साथ – साथ मायावती के कथित घोटालों का जिक्र करते हुए उस पर भी कार्यवाही की मांग की है.

अमित जानी और उसके साथियों ने खुद हथौड़ा चलाकर मूर्ति तोड़ने का जो काम किया है वह कानूनन जुर्म है, इसमें कोई दो राय नही है. इस एक गलत काम से न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश की शांति व्यवस्था पर असर पड सकता था.

लेकिन इस घटना के बाद सभी राजनीतिक दलों को यह भी सोचना चाहिए कि सत्ता में आने के लिए विपक्ष में रहते हुए वे जो वादे करते हैं वे कितने उचित हैं.

राजनीतिक दल वर्षों तक अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को ऐसे एजेंडे पर तैयार करते हैं जो सामाजिक शान्ति, सौहार्द, संविधान और कानून की दृष्टि से उचित नही होता

फिर सत्ता में आने के बाद के बाद वे महसूस करते हैं कि वे कानून और अदालत से बंधे हैं. इसलिए वे अपनी पुरानी बातों से पलटने के लिए मजबूर होते हैं.

मगर वह अपने आम कार्यकर्ताओं या समर्थकों को यह बात समझाने की जरुरत नही करते कि विपक्ष में रहते हुए उन्होंने जो कहा था वह क्यों गलत था और उस पर अमल क्यों नही हो सकता ?

इसलिए समर्थक जो पहले नेता की जय जयकार करता है बाद में उसका मुर्दाबाद करने लगता है या फिर ज्यादा जोश में आकर कानून अपने हाथ में ले लेता है.

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