अब तुम्हारे हवाले ये वन साथियो

इंसानों और जानवरों के बीच एक लंबे अरसे से चले आ रहे संघर्ष से छत्तीसगढ़ का बारनवापारा अभ्यारण्य भी अछूता नहीं है.

इन जंगलों में इंसानों की आबादी वर्ष 1932 के आसपास बसना शुरू हो गई थी जब अंग्रेज़ इन्हें अपने काम के लिए ले गए थे.

तब से लेकर आज तक यानी कई दशक बीत जाने के बाद भी इंसान और अभ्यारण्य में रहने वाले जानवरों के बीच चल रहा संघर्ष जारी है.

इस संघर्ष का असर सब पर पड़ा. जहाँ एक तरफ जानवरों के घर में अतिक्रमण हो गया और उनका प्राकृतिक परिवेश प्रभावित हुआ, वहीं जानवरों ने भी जंगल में आकर बसने वाले इंसानों को नहीं छोड़ा.

समय-समय पर ये जानवर भी इंसानों के घर और फसलें नष्ट करते आ रहे हैं.

आज इस अभ्यारण्य में लगभग 22 गाँव हैं. इन गावों में रहने वाले कुछ तो आदिवासी हैं तो कुछ पिछड़ी जाति से हैं.

राज्य के वन विभाग और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को लगने लगा कि जंगल के बीचोंबीच बसी आबादी यहाँ के रहने वाले वन्य प्राणियों के संरक्षण में रुकावट बन रही है.

दूसरी तरफ संरक्षित वन की अपनी भी कुछ कानूनी सीमाएं हैं. यही कारण है कि यहाँ के रहने वाले लोगों को भी अपनी आजीविका चलाना मुश्किल होता जा रहा है.

विस्थापन और पुनर्वास

संरक्षित वन होने की वजह से इन गावों में विकास के सीमित संसाधन ही मौजूद हैं. ना यहाँ बिजली है और ना कभी आ ही पाएगी. यहाँ दूसरे संसाधन भी नहीं पहुँच सकते हैं.

अब सबके सामने सवाल पैदा होता है कि आखिर इस अभ्यारण्य में बसे गावों के लोगों के लिए क्या किया जा सकता है.

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और राज्य के वन विभाग के पास इसका एक ही विकल्प मौजूद था और वह था विस्थापन. शुरू-शुरू में जब ये बात वन विभाग के अधिकारियों नें गाँव वालों के सामने रखी तो विरोध शुरू हो गया.

फिर मंत्रालय और वन विभाग नें मिलकर इस विस्थापन और पुनर्वास का एक मॉडल बनाने के सोची. मगर विरोध की वजह से यह प्रस्ताव वर्ष 2002 से लंबित रहा.

बारनवापारा के वन अधीक्षक अरुण तिवारी का कहना है कि बाद में अभ्यारण्य में रहने वाले ग्रामीणों नें खुद आगे आकर जंगल के बाहर बसने की इच्छा जताई. इसके बाद उनके पुनर्वास पर काम शुरू हो गया.

रामपुर बन गया 'श्रीरामपुर'

Image caption श्रीरामपुर गांव में 24 परिवार रहते हैं.

नए प्रस्ताव के अनुसार, रामपुर गाँव को महासमुंद जिले में ही जंगल से 56 किलोमीटर दूर विजयमाल के पास बसाया गया है. इस गांव में 24 परिवार रहते हैं.

मगर पुनर्वास के तहत अब इस गांव में 135 परिवार रहने को तैयार हैं. इनके लिए 5000 वर्ग मीटर में छोटे बंगलेनुमा घर के साथ-साथ कृषि के लिए प्रति परिवार पांच एकड़ ज़मीन भी दी गयी है. इस नए नगर का नाम 'श्रीरामपुर' रखा गया है.

रामपुर गाँव के 'मोकद्दम' यानी मुखिया श्रीराम बरिहा का कहना है कि उन्होंने अभ्यारण्य के अन्दर रामपुर गाँव में 50 से 60 साल तक बिताए हैं.

बरिहा कहते हैं, "इतने सालों में उन्होंने कभी अपने गाँव का विकास नहीं देखा, ना बिजली की सुविधा ना पीने के पानी की." मगर उनको लगता है कि अब उनकी और उनके परिवार वालों की ज़िन्दगी बेहतर हो जायेगी.

रामपुर के ही एक अन्य ग्रामीण नें बीबीसी से बात करते हुए कहा, "जंगल के अन्दर की ज़िन्दगी काफी कष्टदायक है. अभाव तो है ही, यहाँ सबसे ज्यादा नुकसान हमें फसलों का उठाना पड़ता था जिसे जंगल के जानवर बर्बाद कर देते थे. गाँव के लोगों के पास जंगल में 60 हेक्टेयर ज़मीन थी जिसमें पहरे बैठा-बैठा कर फसल उगानी पड़ती थी. अब हम श्रीरामपुर जा रहे हैं. हमारी ज़िन्दगी बदल जाएगी."

पुनर्वास का मॉडल

पुनर्वास के तहत अभ्यारण्य के रामपुर में 60 हेक्टेयर ज़मीन के बदले अब यहाँ के लोगों को खेती के लिए 350 हेक्टेयर ज़मीन दी गई है. साथ ही यहाँ दो हेक्टेयर का तालाब, टेलीफोन की सुविधा के अलावा सामुदायिक भवन और आंगनवाड़ी भवन का प्रावधान भी किया गया है.

अभ्यारण्य के अधीक्षक अरुण तिवारी कहते हैं कि रामपुर से श्रीरामपुर का विस्थापन और पुनर्वास अब भारत में एक मॉडल के रूप में सामने आया है.

उनका कहना है कि इसी तर्ज़ पर वो अभ्यारण्य के अन्दर के 16 और गांवों को जंगल के बाहर बसाने का काम चरणबद्ध तरीके से करने जा रहे हैं.

अभ्यारण्य के रेंज अफसर उदय सिंह ठाकुर कहते हैं कि अब नौबत यहाँ तक आ पहुंची है कि राज्य के दूसरे अभ्यारण्यों से लोग श्रीरामपुर को देखने आ रहे हैं.

वह भी चाहते हैं कि इसी तरह की व्यवस्था उनके लिए भी की जाए तो वह भी जंगलों के अन्दर से बाहर आकर बसना पसंद करेंगे.

नए परिवेश की आदत

Image caption गाँववाले कई दशकों से अभ्यारण्य में रह रहे थे.

ठाकुर बताते हैं कि जिस दिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने श्रीरामपुर को रामपुर के लोगों को समर्पित किया, उस दिन भी काफी संख्या में दूसरे अभ्यारण्य से आकर लोगों ने श्रीरामपुर को देखा.

वह कहते हैं, "यह पहला मौक़ा है जब इतनी बड़ी संख्या में किसी अभ्यारण्य से लोगों का विस्थापन हुआ है और उनका पुनर्वास किया गया. यह भारत में एक मॉडल के रूप में सामने आया है. अब इसी फार्मूले के तहत दूसरे संरक्षित जंगलों से भी इसी तरह लोगों को दूर बसाने की योजना पर काम चल रहा है."

इसी गाँव के लोकनाथ चौहान कहते हैं, ''यहाँ जंगली जानवरों ने हम पर और हमने उन पर दबाव बना रखा था. यह आपसी संघर्ष था. मगर अब हम इस जंगल को इन जानवरों के हवाले कर रहे हैं. यह उनकी जगह है. यह उनका घर है."

रामपुर वासियों का कहना है कि श्रीरामपुर के नए आशियाने और नई व्यवस्था उन्हें जंगल के जानवरों की वजह से ही मिली है.

इन गाँववालों के लिए यह एक भावुक पल है. इन्हें अभ्यारण्य में रहते हुए कई दशक बीत गए, अब इन्हें शहर की आदत डालनी होगी.

अब रामपुर वालों ने अपना सामान समेटना शुरू कर दिया है. वह नए परिवेश की आदत डाल रहे हैं क्योंकि जंगल में इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष था, शहर में तो इंसानों के बीच ही संघर्ष होता रहा है.

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