तिरुपति लड्डू को मिला पेटेंट

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Image caption तिरुपति मंदिर बोर्ड के बनाए लड्डू ही अब असली तिरुपति लड्डू कहलाएंगे

आंध्र प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध तिरुपति लड्डू को आखिरकार पेटेंट मिल ही गया है.

तिरुपति के बड़े बड़े लड्डू अपने आकार ही नहीं बल्कि स्वाद के लिए भी जाने जाते हैं. लड्डू को लेकर क़ानूनी लड़ाई काफी दिनों से चल रही थी लेकिन अब पेटेंट पर तिरुपति बोर्ड को जीत मिल गई है.

तिरुपति के इस लड्डू को पेटेंट तो 2009 सितंबर में ही मिल गया था जब लड्डू को भौगोलिक संकेत दे दिया गया था.

भौगोलिक संकेत या जियोग्राफिकल इंडिकेटर का अर्थ ये है कि कोई चीज़ किसी जगह विशेष से जुड़ जाती है. तिरुपति लड्डू को जीआई टैग मिलते ही यह तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड से जुड़ गया है.

इसके बाद बोर्ड ने पंजीयन संस्था को बताया कि ये लड्डू किस तरह से अलग है और क्यों इसकी अलग प्रतिष्ठा है.

तिरुपति देवस्थानम बोर्ड के संयुक्त कार्यकारी श्रीनिवास राजू कहते हैं कि ऐसा हुआ है तो बहुत अच्छा हुआ है. ये एक प्रतीक है. क़ानून के तहत ऐसा होता है तो सही रहता है. क़ानून था तो हमने फायदा उठाया. लोकप्रिय चीज़ है तो लोगों के दावे शुरु हो गए थे. अब अच्छा है कि जो हम बनाएंगे देवस्थानम बनाएगा वही लड्डू अब तिरुपति लड्डू होगा. जो जहां का ओऱिजिनल है जैसे धर्मावरम सिल्क है आंध्र का...तो वो वहीं का होना चाहिए.

अब जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री ने बोर्ड के दावे की पुष्टि कर दी है.

बोर्ड का कहना था कि लड्डू की बढ़ती मांग के कारण कई लोग ये लड्डू बना कर बेच रहे हैं जिसमें गलत चीज़ें डाली जा रही हैं और इसी कारण वो पेटेंट की मांग करते हैं.

इस जियो टैग के तहत अगर कोई तिरुपति लड्डू के नाम पर कोई और लड्डू बेचता पाया गया तो उसे सज़ा भी हो सकती है.

हालांकि बोर्ड के इस दावे को आर एस प्रवीण राज ने चुनौती दी थी जो बौद्धिक संपदा अधिकार मामलों से जुड़े कार्यकर्ता और वैज्ञानिक हैं.

राज का कहना था कि पेंटेट से सिर्फ बोर्ड के लड्डू उत्पादकों को लाभ होगा जबकि तिरुपति के लड्डू का फायदा पूरे तिरुपति के लोगों को होना चाहिए.

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