बिहार: 'मुखिया ने बवंडर को बवंडर से काटा'

जब मैंने भोजपुर के इलाक़े में ऊंची जातियों की कुछ अन्य बस्तियों में लोगों से बातें कीं तो प्रायः हर जगह ब्रह्मेश्वर मुखिया का गुणगान सुनने को मिला.

बड़डीहा गाँव के पास रोड किनारे गप-शप करते कुछ ग्रामीणों के बीच पहुँचकर मैंने जब ये चर्चा छेड़ी तो एक युवक ने तपाक से कहा ''जहर को जहर से ही काटना पड़ा.'

एक बुज़ुर्ग, केदार नाथ राय हालात का विश्लेषण करते हुए बोले, ''जिस तरह से वायु मंडल में बवंडर उठता है, उसी तरह यहाँ समाज में भी बवंडर उठा था. उसको ना तो पुलिस, ना कोर्ट- कचहरी और ना ही सरकार शांत कर पाई थी. इस बवंडर को दूसरे बवंडर से काटा और शांत कर दिया हमारे ब्रह्मेश्वर मुखिया जी ने. सरकार जो दस- बीस साल में नहीं कर पायी, उसे मुखिया जी ने चार साल में कर दिखाया.''

पढ़िए शृंखला की पहली कड़ी

शृंखला की दूसरी कड़ी- 'गड्ढे में छिपकर देखा जनसंहार'

'अभी भी हैं तैयार'

वहीं खड़े एक दूसरे व्यक्ति ने ताल ठोंकने जैसी मुद्रा में भोजपुरी में चुनौती उछाली, "रणवीर के लोग तो शांत बा, ऊ लोग अभी कुछ नइखे चाहत. बाक़ी 'माले' पार्टी वाला सब उकसा रहल बा. जौन तेईस लोगन के फांसी पर चढ़ाबे के तैयारी हो रहल बा, तो ऊ लोग मजबूर होके ओकरा के काटी की ना काटी? दस्ता तैयार बा एकदम. जे होई से होई".

(रणवीर सेना के लोग शांत हैं, वे लोग अभी कुछ नहीं चाहते. बाकी भाकपा माले वाले उकसा रहे हैं. जिन तेईस लोगों को फाँसी पर चढ़ाने की तैयारी हो रही है, इससे मजबूर होकर ही तो लोगों का नरसंहार करना पड़ेगा. दस्ता तो पूरी तरह तैयार बैठा है. जो होगा सो देखा जाएगा.)

पूरी तरह समझ में आ रहा था कि बारा और सेनारी के नरसंहारों में 69 भूमिहारों की मौत का बदला किस जुनून के तहत लिया गया होगा.

जाहिर है कि यही बदला बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे, शंकरबीघा और मियांपुर के नरसंहारों में 137 दलित-पिछड़ों को मौत के घाट उतार कर लिया गया.

जातीय गोलबंदी

Image caption बेलावर, यहीं हुआ था रणवीर सेना का गठन

मुखिया की हत्या के बाद मध्य बिहार के भूमिहार बहुल क्षेत्रों में एक बार फिर से जातीय ध्रुवीकरण की सुगबुगाहट होने लगी है.

भोजपुर जिले के जिस भूमिहार बहुल गाँव, 'बेलाउर' में रणवीर सेना का गठन हुआ था, वहाँ मुझे दो तरह के संकेत स्पष्ट रुप से मिले.

एक यह कि वहाँ का भूमिहार समाज लाल झंडे वालों से टकराव के बजाय अब समझौता के रास्ते अपने को एकजुट करना चाहता है.

दूसरी बात कि सरेंडर जैसा कोई संदेश ना जाए, इस कारण 'जो होगा सो होगा' वाला तेवर भी दिखाते रहना इन्हें ज़रूरी लगता है.

हाथ में तलवार लिए, घोड़े पर सवार अपने पूर्वज रणवीर बाबा की ऊंची प्रतिमा को बेलाउरवासी अपनी प्रेरणा स्रोत बता रहे थे. हालांकि जब मैं वहाँ पहुंचा, तो जाति-संघर्ष के मसले पर गरम रुख़ वालों की तुलना में नरम रुख़ वालों को अधिक मुखर पाया.

बदली है रणनीति

बेलाउर के अरविन्द चौधरी कहने लगे कि लड़ने की राजनीति अब नहीं चलने दी जायेगी, ''मुखिया जी की हत्या से ये साफ़ है कि मौजूदा सरकार हमारे ही लोगों को खरीदकर हमें आपस में लड़ाना चाहती है. किसानों और मज़दूरों के बीच लड़ाई का अब कोई मुद्दा ही नहीं रहा है. ये जातीय संघर्ष अब हम नहीं करेंगे और किसान मज़दूर एक-दूसरे से नहीं लड़ेंगे.''

वहीं पास में पेड़ के नीचे चबूतरे पर शांत भाव से बैठे विश्वनाथ चौधरी का भी समझौतावादी रुख़ दिखा, '' नुकसान तो बहुत हुआ और लग रहा था कि उस लड़ाई से हमारा गाँव पचास साल पीछे चला गया. बहुत बेकार चीज़ है ये जाति-संघर्ष, कोई लाभ नहीं होता इसका.''

इन दोनों से कुछ अलग हटकर रत्नेश सिंह ने बेलाउर की पिछली भूमिका को याद करते हुए कहा,'' हमारे समाज पर जब भी संकट आएगा तो रणवीर बाबा का यह गाँव बचाव में पहले की तरह जनसंहार की हद तक जाकर भी हथियार उठाने के अपने फ़र्ज़ से नहीं से चूकेगा. करारा जवाब देने में यह समाज पीछे नहीं हटेगा.''

Image caption है तो यह बस स्टैंड, लेकिन इसका इस्तेमाल अड्डेबाजी के लिए होता है

बेलाउर गाँव के इस तेवर को माले का गढ़ माने जाने वाले सहार अंचल के रमेश सिंह ने गीदड़ भभकी बताया. उन्होंने कहा,'' ये सब कागजी बाघ हैं. ये जो धमका रहे हैं कि फिर वैसा ही करेंगे, तो सोलह साल पहले गाँव-गाँव में ग़रीबों से लड़कर देख चुके हैं. गरीबों की संगठित ताक़त और आक्रामक तेवर के चलते इनको हर तरह का नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा. गरीब लोग आज भी तैयार हैं."

दोनों पक्षों का ये रुख़, इनकी पुरानी रणनीति के अनुकूल भले ही दिख रहे हों, लेकिन परिस्थितियों ने इन्हें पहले जैसे टकराव से दूर कर रखा है.

(इस श्रृखला के चौथे भाग में ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड से जुड़े कुछ पहलू )

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