वैदिक गणित पढ़ाया जाता है इस मस्जिद में

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देश भर में मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारे और गिरजाघर जैसे हजारों धार्मिक स्थल हर नगर मोहल्ले और नुक्कड़ पर मौजूद हैं.

लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि अगर यह धार्मिक स्थल शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक साहित्य केन्द्रों का भी काम करने लगें तो कितना बड़ा परिवर्तन आ सकता है?

हैदराबाद की एक मस्जिद इन दिनों ऐसे ही कामों के जरिए परिवर्तन लाने के प्रयासों का केंद्र बन गई है.

आम तौर पर जब हम मस्जिद की बात करते हैं तो पहला विचार अजान की आवाज और नमाज का आता है. इसे एक ऐसी जगह समझा जाता है जहाँ लोग इबादत या प्रार्थना के लिए जमा होते हैं और जहाँ इमाम अरबी भाषा में नमाज़ पढ़ाते हैं.

लेकिन हैदराबाद की अजीजिया मस्जिद एक ऐसी मस्जिद है जो धार्मिक स्थल तो है ही साथ ही वहां आपका बच्चा विज्ञान और वैदिक गणित पढ़ सकता है, अपने करियर के लिए मार्ग दर्शन ले सकता है, जहाँ गरीब लोग व्यापार के लिए बिना ब्याज छोटे मोटे ऋण ले सकते हैं और जहाँ आप अपना छोटा मोटा इलाज भी करवा सकते हैं.

इतना ही नहीं वहां के इमाम केवल धार्मिक मुद्दों पर ही नहीं बल्कि आधुनिक समाज की सभी समस्याओं और विषयों पर लोगों का दिशा निर्देशन करते हैं.

इस मस्जिद की प्रबंधक समिति के अध्यक्ष एजाज मोहीउद्दीन वसीम हर जुमे यानी शुक्रवार को मस्जिद में आए लोगों को संबोधित करते हैं, बच्चों को पढ़ाते भी हैं और युवाओं को करियर के संबंध में सलाह मशविरा भी देते हैं.

वैदिक गणित भी

वसीम पोस्ट ग्रेजुएट हैं. वे कहते हैं,"अजीजिया मस्जिद वो सब कुछ करना चाहती है जो इस्लाम एक मस्जिद से चाहता है. हम समझते हैं कि मस्जिद केवल नमा रोजे की जगह नहीं बल्कि सभी विकास और कल्याण के कामों का केंद्र होना चाहिए. जैसे युवा पढ़ रहे हैं तो उनके लिए शिक्षा का बेहतरीन इंतजाम होना चाहिए. उनके लिए एक अच्छी लाइब्रेरी होनी चाहिए, ऐसे खेलों का प्रबंध होना चाहिए जिसमें समय खराब नहीं होता. जैसे हमारी मस्जिद में हमने गरीबों के लिए माइक्रोफाइनेंस की व्यवस्था रखी है जहाँ लोग बिना किसी ब्याज के ऋण लेकर व्यापार कर सकते हैं."

वे एक ऐसे करिश्माई वक्ता हैं जिनके जुमा के खुतबे सुनने के लिए लोग और विशेष कर युवा काफी बड़ी संख्या में आते हैं क्योंकि वे आधुनिक सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और अन्य मुद्दों पर बात करते हैं और आधुनिक भाषा और मिसालों का उपयोग करते हैं.

जैसे हाल ही में अपने एक संबोधन में उन्होंने कहा, "अगर हम कम्प्यूटर, तकनीक की भाषा का उपयोग करें तो इंसान का ह्रदय माइक्रो प्रोसेसर की तरह है जबकि आँख और कान इनपुट का माध्यम हैं. कोई मानव या तो कुछ देख कर और सुनकर सुधर सकता है या बिगड़ सकता है. मानव के लिए इन पुट का कोई तीसरा रास्ता है ही नहीं. "

जैनुल बाशा एक इंजीनियरिंग कॉलेज में अस्सिस्टेंट प्रोफेसर हैं और वो अजीजिया मस्जिद में आने वाले पढ़े लिखे वर्ग के व्यक्ति हैं.

वो कहते हैं, "दूसरी मस्जिदों में हमें अधिकतर पारंपरिक बातें सुनने को मिलती हैं जबकि अजीजिया मस्जिद में आज के समाज की बात होती है. जब स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है तो वसीम साहब उसी मुद्दे पर बात करते हैं. जब महिला दिवस होता है या मदर्स या फ़ादर्स डे मनाया जाता है या स्मोकिंग के खिलाफ दिन होता है तो फिर वो उन्हीं विषयों पर बात करते हैं और बताते हैं कि इस्लाम का इस पर क्या विचार है."

दिलचस्प बात यह है कि दूसरे शैक्षिक कोर्सों के अलावा इस मस्जिद में बच्चों को वैदिक गणित और आधुनिक साइंस भी पढ़ाई जाती है ताकि उनकी क्षमता और योग्यता बढ़ाई जाए.

वसीम कहते हैं, "जब हमारे बच्चे मुकाबले की परीक्षाओं में बैठते हैं तो वहां समय बहुत अहम होता है और बहुत कम समय में ही सवालों को सुलझाना पड़ता है. ऐसे में वैदिक गणित एक ऐसा तरीका है कि अगर कोई इसमें उत्तम है तो वो गणित बहुत तेज़ कर सकता है. न केवल वैदिक गणित बल्कि हम इन बच्चों को बेहतरीन फिजिक्स और केमिस्ट्री भी पढ़ाना चाहते हैं. क्योंकि आज की दुनिया में विज्ञान बहुत महत्वपूर्ण है और उसके बिना हमारे युवा आगे नहीं बढ़ सकते".

वसीम का यह भी मानना है कि जो युवा इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर बाहर आते हैं उनके अंदर भी इतनी योग्यता नहीं होती कि उन्हें तुरंत ही नौकरी मिल जाए. ऐसे लोगों को सॉफ्ट स्किल्स सिखाई जाती हैं और पर्सनेलिटी डिवेलपमेंट के कोर्स चलाए जाते हैं.

इस तरह इस मस्जिद के प्रमुख के लिए युवाओं की शिक्षा एक जूनून का दर्जा रखती है.

हर तरह की सलाह

अब्दुस्सलाम एक ऐसे युवा हैं जो रोज़ाना अजीजिया मस्जिद आते हैं क्योंकि उनका मानना है कि इस मस्जिद में हर एक वर्ग के लिए कुछ न कुछ मौजूद है चाहे वो छात्र हों, काम करने वाले लोग हों या महिलाएं हों.

उनका कहना है, "यहाँ पर छात्रों को करियर के संबंध में जानकारी भी मिलती है. अगर कोई कॉमन एंट्रेंस टेस्ट देता है तो इसे बताया जाता है कि उसे इंजीनियरिंग में जाना चाहिए या फिर मेडिसिन में और उसे कौन सा कॉलेज चुनना चाहिए."

अजीजिया मस्जिद को इस बात का श्रेय भी है कि उसने कई काम सबसे पहले शुरू किया.

जैसे फर्स्ट ऐड का केंद्र जो शायद किसी और धार्मिक स्थल में न मिले. वसीम का कहना है, "यह हमने इस लिए शुरू किया कि हमारे देश में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बहुत ही कम है. जब हमने यहां आने वालों की डायबिटीज़ और रक्तचाप की जांच शुरू की तो कई लोगों की शुगर का स्तर बहुत बढ़ा हुआ था लेकिन उनको पता ही नहीं था. हम हर रविवार को यह कार्यक्रम करते हैं जिससे काफी लोगों को फायदा हो रहा है."

इस तरह एक मस्जिद न केवल कई कल्याण योजनाओं का केंद्र बन गई और हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही है बल्कि वह सभी दूसरे धार्मिक स्थलों के लिए नमूना बन गई है कि वो भी किस तरह अपने अपने इलाकों में लोगों के सामजिक और आर्थिक उत्थान के लिए काम कर सकते हैं.

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