बंदूकें त्याग कर वापस वतन की ओर

  • 14 अगस्त 2012
पूर्व चरमपंथी
Image caption इजाज़ अहमद ने पूरी जमा-पूंजी परिवार के साथ भारत आने के लिए ख़र्च कर दी.

बीस साल से भी अधिक समय पहले भारतीय शासन के ख़िलाफ़ बंदूक़ उठाने वाले कई स्थानीय चरमपंथी हथियार डालकर अब सामान्य जीवन बिताना चाहते हैं.

अब्दुल रशीद ख़ान 14 साल की उम्र में भारतीय प्रशासित कश्मीर छोड़कर भारत के ख़िलाफ़ जिहाद में शामिल हो गए थे.

उन्हें अच्छी तरह याद है कि वो साल 1989 था. हालांकि वो महीने को लेकर उतना निश्चित नहीं - "ये सितंबर या अक्तूबर का महीना हो सकता है."

वो कहते हैं, "मैं तब स्कूल में था, आठवीं कक्षा में पढ़ता था. मैं उस दिन इम्तिहान देने गया था, मैंने वो ख़त्म किया, अपना बैग एक दुकान में फेंका और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लिए निकल पड़ा. वो दिन ढाई बजे का समय था, मैं अपने स्कूल यूनिफ़ार्म में ही था, मैंने साथ में कुछ नहीं लिया."

कुपवाड़ा के मूल निवासी अब्दुल रशीद के साथ आठ और बच्चों ने अपना घर छोड़ दिया था.

वो कहते हैं, "उस वक़्त इस तरह के बातों की होड़ सी लगी थी, इसलिए मैं भी चला गया."

घर छोड़ने के दूसरे दिन ही ये गुट मुज़फ्फराबाद पहुंच गया, जहां वो जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के कैंप में गए.

वहां मुझे एक माह तक एके47 चलाने की ट्रेनिंग दी गई.

बाईस साल के वक़्फ़े के बाद अब्दुल रशीद ख़ान कुलगाम वापस आ गए हैं.

'भारत से आज़ादी'

Image caption अब्दुल रशीद 22 साल पाकिस्तान में बिताने के बाद परिवार के साथ कश्मीर लौटे हैं.

अब्दुल रशीद उन हज़ारों युवाओं में से एक थे जिन्होंने साल 1988 में पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश कर चरमपंथी कैंपों में हिस्सा लिया था. उनका मानना था कि वो भारत से आज़ादी हासिल करने की लड़ाई लड़ रहे थे.

कश्मीर हुकुमत के एक अनुमान के मुताबिक़, दो दशकों के भीतर 3500 से 4000 युवकों ने सीमा पार किया था. लेकिन भारतीय अधिकारियों के मुताबिक़ पिछले 12 माह के दौरान उनमें से कम से कम 150 वापस आ गए हैं जबकि कुछ वापसी का इंतज़ार कर रहे हैं.

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि वापसी के लिए उन्हें 1054 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिसमें से अगस्त के आख़िर तक 291 को इजाज़त हासिल हो गई है जबकि 300 आवेदनकर्ताओं को जल्द ही वापसी की इजाज़त मिल जाएगी.

जो वापस आ रहे हैं उनका कहना है कि पाकिस्तान में कश्मीर के लिए मिलने वाले समर्थन में कमी आ रही है, वहां तालिबान का प्रभाव बढ़ रहा है और भारत सरकार ने हाल में ही वापस लौटने वालों के लिए एक नई नीति की घोषणा की है.

उनके मुताबिक़ उन्हें ये समझ में आ गया है कि ये लड़ाई निरर्थक है.

'आसान नहीं वापसी'

बावन साल के इजाज़ अहमद अगस्त 1990 में पाकिस्तान गए थे, और अब मुज़फ्फ़राबाद से बीवी और पांच बच्चों समेत वापस लौटे हैं.

वो कहते हैं कि उन्हें कश्मीर विधानसभा में हुई बहस में सरकार की वापसी नीति का पता चला. उनके मुताबिक़ पक्ष और विपक्ष दोनों इसका समर्थन कर रहे हैं.

लेकिन उनका कहना है वापसी इतनी आसान नहीं थी.

जम्मू-कश्मीर के एक अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "इस नीति के ठीक तरह से काम करने के लिए पाकिस्तान की मदद की ज़रूरत है लेकिन वो हमेशा कहता रहा है कि युवा भारत छोड़कर इसलिए पाकिस्तान गए थे क्योंकि उनपर ज़ुल्म हो रहा था."

नेपाल के रास्ते

परेशानियों से बचने के लिए कुछ लोग नेपाल का रास्ता चुन रहे हैं.

एक पूर्व चरमपंथी का कहना था कि लोग पहले पासपोर्ट की बिना पर नेपाल पहुंचते हैं, फिर पासपोर्ट फाड़कर भारत में प्रवेश कर जाते हैं. फौज से कुछ दिक्क़ते आती हैं लेकिन जब वो स्थानीय पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग से जानकारी हासिल करते हैं तो लोगों को सुबे में घुसने की आज्ञा मिल जाती है.

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Image caption भारत सरकार इसे कश्मीर में अलगावगाद के कमज़ोर होते बुनियाद के तौर पेश कर सकती है.

श्रीनगर में इन लोगों से लंबी पूछताछ की जाती है जिसके बाद लोगों को उनके परिवार के हवाले कर दिया जाता है.

भारत सरकार के लिए ये बहुत बेहतर स्थिति है.

पहली उसके खिलाफ़ लड़ने वालों की तादाद कम होती जा रही है. दूसरी वो दुनियां को कह सकता है कि कश्मीर में हालात सामान्य हैं. तीसरे भारत पृथकतावादी नेताओं की सच्चाई भी लोगों के सामने लाने का दावा कर सकता है.

लेकिन दूसरी तरह की समस्याओं ने कुछ लोगों को चिंता में डाल दिया है.

जो पूर्व चरमपंथी वापस आ रहे हैं वो तो मूलत: भारत के हैं लेकिन उनकी पत्नियां पाकिस्तानी नागिरक हैं.

वापस लौटने वालों को काम काज ढू़ढने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

इन लोगों को वापसी पर काफ़ी ख़र्च करना पड़ा था, और चूंकि उन्होंने देश में भी ग़ैर क़ानूनी तौर पर प्रवेश किया था इसलिए उन्हें लगातार ज़मानत लेनी पड़ती है जिसके लिए पैसों की दरकार है.

ये लोग राज्य सरकार के साथ इस मामले को उठाने की बात कह रहे हैं.

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