लगातार विरोध प्रर्दशन अव्यवस्था को बढ़ावा दे रहे हैं: प्रणब

 मंगलवार, 14 अगस्त, 2012 को 22:08 IST तक के समाचार
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

प्रणब मुखर्जी ने कहा भूख और निर्धनता को दूर करना होगा

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चेतावनी दी है कि अगर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला होगा तो इससे अव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा.

भारत के 66वें स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने पहले संदेश में प्रणब मुखर्जी ने कहा, "चारों तरफ़ फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ़ ग़ुस्सा और बुराई के खिलाफ़ विरोध जायज़ है क्योंकि ये हमारे राष्ट्र की क्षमता और शक्ति को खोखला कर रहा है. कभी-कभी लोग धैर्य खो देते हैं लेकिन यह हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमले का बहाना नहीं बन सकता."

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना हज़ारे और योग गुरु रामदेव के प्रदर्शनों की ओर इशारा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, "जब अधिकारी निरंकुश हो जाते हैं तो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचता है लेकिन जब विरोध बार-बार होते हैं, तब हम अव्यवस्था को न्यौता देते हैं. लोकतंत्र एक साझा प्रक्रिया है. लोकतांत्रिक नज़रिए के लिए गरिमापूर्ण व्यवहार और विरोधी विचारों को सहन करने की ज़रूरत होती है."

"दूसरे स्वतंत्रता संग्राम की ज़रूरत"

अपने भाषण में देश के सामने चुनौतियों के बारे में बात करते हुए प्रणब मुखर्जी ने कहा, "यदि हमारी अर्थव्यवस्था ने बुनियादी क्षमता हासिल कर ली है तो अगली छलांग के लिए इसे अब लॉचिंग पैड का काम करना होगा. हमें अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम की ज़रूरत है, ताकि भारत हमेशा के लिए भूख, बीमारी और निर्धनता से मुक्त हो जाए."

"जब अधिकारी निरंकुश हो जाते हैं तो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचता है लेकिन जब विरोध बार-बार होते हैं, तब हम अव्यवस्था को न्यौता देते हैं."

प्रणब मुखर्जी, राष्ट्रपति

लेकिन साथ ही राष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि यदि देश का विकास और प्रगति, बढ़ती आकांक्षाओं, ख़ासकर युवाओं की आकांक्षाओं, के मुकाबले पिछड़ जाते हैं तो ग़ुस्सा स्वाभाविक है.

प्रणब मुखर्जी ने कहा, "युवा ज्ञान और अवसर चाहते हैं. उनके पास सामर्थ्य है, उन्हें मौका चाहिए."

असम में पिछले महीने हुई हिंसा पर दुख जताते हुए राष्ट्रपति ने कहा, "हिंसा कोई विकल्प नहीं है. हमारे अल्पसंख्यकों को सांत्वना की, सदभावना की और आक्रमकता से बचाए जाने की ज़रूरत है. हमें एक नई आर्थिक क्रांति के लिए शांति की ज़रूरत है जिसमें हिंसा के प्रतिस्पर्धात्मक कारणों को समाप्त किया जा सके."

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