बंगलौर, चेन्नई से पलायन के बाद बंटा हुआ है असम का समाज

 सोमवार, 20 अगस्त, 2012 को 06:55 IST तक के समाचार

बोंगाइगांव का हिंसा प्रभावित एक गांव

हिंसा से प्रभावित असम में तनाव जारी है. इस बीच भारत के दूसरे शहरों में कथित एसएमएस और सोशल मीडिया के जरिए फैली अफवाहों के बीच उत्तर पूर्व के लोगों का असम लौटना जारी है.

रविवार को दो खचाखच भरी ट्रेनों में भरे लोग बंगलौर से गुवाहाटी पहुंचे.

बीबीसी संवाददाता विवेक राज भी असम के हालात का जायज़ा लेने वहां पहुंचे हैं. बोंगाइगांव स्टेशन पर उन्होंने ट्रेन में लौट रहे यात्रियों से मुलाकात की और उनकी मन:स्थिति का पता लगाने की कोशिश की.

वो बोंगाइगांव के आसपास के कुछ राहत शिविरों में भी गए.

विवेक राज ने वहां जो कुछ देखा-सुना. उन्हीं के शब्दों में पढ़िए -

लौटे यात्री

रविवार सुबह जब हम न्यू बोंगाइगांव स्टेशन पहुंचे तो दो ट्रेनें वहां आईं. एक ट्रेन थी बंगलौर-गुवाहाटी एक्सप्रेस और उसके अलावा एक स्पेशल ट्रेन चलाई गई थी जो इन लोगों को लेकर आई थी वहां से.

करीब 12 से 14 कोच थे इस ट्रेन में और सब के सब भरे हुए थे. एक-एक बर्थ पर छह-छह लोग बैठे हुए थे. टॉयलेट के पास, सामान रखने की जगह पर ट्रेन खचाखच भरी हुई थी और इसी हालत में लोगों ने 50-55 घंटे का सफर तय किया था.

उनसे हमारी बात हुई. ट्रेन से पहुंचे ज्यादातर लोग बंगलौर में सुरक्षा गार्ड के रूप में या छोटे होटलों में वेटर की नौकरी करते थे.

उनका कहना था कि उनमें से किसी को भी सीधे तौर पर धमकी नहीं दी गई थी. किसी को भी ये नहीं कहा गया था कि आप चले जाइए वरना आपके साथ बुरा हो सकता है.

लेकिन एक ऐसा माहौल बन गया था कि उनके दोस्तों और शुभचिंतकों ने उनको एहतियातन बंगलौर छोड़ने की सलाह दी.

इसके अलावा लोगों ने बताया कि परिवार की तरफ से भी उनपर कड़ा दबाव था कि वो घर वापस लौट जाएं.

इसीलिए बिना किसी एसएमएस और सीधे खौफ के उन्होंने घर लौटना ही ठीक समझा.

तनाव बरकरार

हिंसा ग्रस्त इलाकों में सुरक्षा बल के जवान तैनात हैं

रेलवे स्टेशन के अलावा मैं कई जगहों पर गया.

वहां अभी भी तनाव बरकरार है. जगह-जगह सीआरपीएफ और पुलिस के जवान तैनात नज़र आ रहे हैं.

लेकिन एक बात है कि असम का जो समाज है पूरी तरह से विभाजित नज़र आ रहा है.

आप अगर किसी बोडो इलाके में जाएं तो वहां कोई मुसलमान नहीं मिलेगा वैसे ही किसी मुस्लिम इलाके में जाएं तो वहां कोई बोडो व्यक्ति नहीं मिलेगा.

आज सुबह मैं एक कैंप में गया था जहां करीब तीन हजार बोडो लोग रह रहे थे.

वहां हमने कई लोगों से बात की.
एक व्यक्ति ऐसे मिले पिताजी को मुसलमानों ने आकर मार डाला था, इसके अलावा एक महिला की सास को मार दिया गया था.

लोग बहुत डरे और सहमे हुए हैं.

मैंने जब पूछा कि क्या आप अपने घरों को लौटकर जाएंगे तो ज्यादातर लोगों का कहना था कि वो अपने घर लौटकर नहीं जाएंगे जो उन्होंने देखा है उसके बाद मुसलमानों से घिरे गांव में उनके जाने की हिम्मत नहीं है.

विभाजित समाज

घरबार छोड़कर लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं

उस शिविर से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर हम एक मुस्लिम बहुल इलाके में गए जहां मुसलमानों के सौ घर जला दिए गए थे. वहां सौभाग्य से किसी की मृत्यु नहीं हुई थी.

लेकिन वहां पड़ोस के बोडो लोगों का कहना था कि बोडो और मुसलमान बीस एक साल से साथ-साथ उस इलाके में रह रहे थे, साथ-साथ कारोबार कर रहे थे

लेकिन एक बार जब माहौल बिगड़ गया तो उन्होंने मुसलमानों को सलाह दी कि उन्हें सुरक्षित जगहों पर चले जाना चाहिए और फिर बाहर से आए लोगों ने मुसलमानों के घर जला दिए.

सामाजिक विभाजन इतना ज्यादा है कि हम एक मुसलमान गांव में जाना चाहते थे लेकिन हमारा ड्राइवर जो कि गैर बोडो असमिया है, उसने उस इलाके में जाने से इनकार कर दिया.

बोडो टेरिटोरियल काउंसिल के लोगों ने भी हमें सलाह दी कि असमिया ड्राइवर को लेकर हम मुस्लिम इलाके में न जाएं क्योंकि उसकी जान को खतरा हो सकता है.

इससे साफ अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दोनों समुदायों के बीच विभाजन कितना बढ़ गया है वो बिल्कुल अलग-थलग पड़ गई हैं.

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