किस काम का है गुटनिरपेक्ष आंदोलन?

 गुरुवार, 30 अगस्त, 2012 को 07:58 IST तक के समाचार

ऐसे वक्त जब भारतीय प्रधानमंत्री 16वें गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नैम) में हिस्सा लेने के लिए तेहरान पहुँचे हैं, सवाल पूछे जा रहे हैं कि इस आंदोलन का कितना औचित्य रह गया है और इसकी दिशा क्या होगी?

मनमोहन सिंह के अलावा करीब सौ से ज़्यादा देशों के नेता भी ईरान में हैं.

नैम का जन्म करीब 50 साल पहले हुआ. उस वक्त दुनिया अमरीका और उसके धुर विरोधी, तत्कालीन सोवियत यूनियन, और उनके साथी देशों के बीच बंटी हुई थी.

उस वक्त नैम विकासशील देशों के लिए ऐसा माध्यम था जिससे वो इन दोनों सुपरपावर देशों को दिखा सकते थे कि वो दोनो समूहों से स्वतंत्र हैं.

शीत युद्ध के बाद अब दोनों प्रतिस्पर्द्धी समूह नहीं बचे हैं. इसी कारण कई लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अब ऐसे आंदोलन का क्या औचित्य है?

नैम ने अपने आपको ऐसे देशों के आंदोलन के तौर पर पुनर्भाषित किया है जो किसी भी बड़ी शक्ति के साथ नहीं खड़ा है.

नैटो से बाहर के ज़्यादातर देश किसी गठबंधन से नहीं जुड़े हैं, इसलिए उनके लिए नैम से जुड़ने के लिए यही कारण काफी नहीं है. नैम ने अपनी छवि ऐसे संगठन के तौर पर बनाई है जो दुनिया की एकमात्र सुपरपावर अमरीका के अधिपत्य का मुकाबला करे.

साथ ही नैम ने खुद को ऐसे देशों के संगठन के तौर पर पेश किया है जो ‘पश्चिमी साम्राज्यवाद’ के प्रभुत्व से स्वतंत्र हैं.

नैम में ज़्यादातर ऐसे विकासशील देश हैं जो पूर्व में उपनिवेश रह चुके हैं.

पुराना आंदोलन?

राजनीतिक गुट

"आर्थिक गतिविधियाँ जी-77 देशों का अधिकारक्षेत्र है जिसे विकासशील देशों का ‘ट्रेड-यूनियन’ कहा जाता है, जबकि नैम एक राजनीतिक गुट है"

शशि थरूर

पुराने से सुनाई पड़ने वाले नाम से ऐसे आरोप लगते हैं कि नैम आंदोलन पुराना पड़ चुका है.

ये छवि इस बात से मज़बूत होती है कि नैम देशों में संगठन अध्यक्ष ईरान और अगले अध्यक्ष वेनेज्युएला को अमरीका का कटु विरोधी माना जाता है. इससे नैम की पश्चिम-विरोधी छवि को बल मिलता है.

ईरान में हो रहे सम्मेलन से इस बात को भी बल मिलता है कि पश्चिमी देशों की कोशिशों के बावजूद ईरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़ा है. इससे नैम की भी ऐसी छवि उभरती है को वो पश्चिमी देशों की नीतियों का विरोध कर रहा है.

लेकिन इस झुकाव के अलावा गौर करने की बात ये भी है कि नैम के दूसरे सदस्यों में भारत, पाकिस्तान, सऊदी अरब, कीनिया, कतर और फ़िलिपींस जैसे देश हैं जो अमरीका के सहयोगी हैं.

इनमें से कुछ देश नैम की राजनीतिक बातों से ज्यादा आर्थिक दलीलों से आश्वस्त होंगे, खासकर ऐसे वक्त जबकि दुनिया भर में पूँजीवाद की नीतियों को चुनौती दी जा रही है. बाकी के देश अमरीकी आर्थिक नीतियों के समर्थक रहे हैं.

आर्थिक गतिविधियाँ जी-77 देशों का अधिकारक्षेत्र है जिसे विकासशील देशों का ‘ट्रेड-यूनियन’ कहा जाता है, जबकि नैम एक राजनीतिक गुट है.

नैम उन विकासशील देशों की भावनाओं का आइना है जो चाहते हैं कि उनकी नीतियाँ पश्चिमी देशों से अलग हों, चाहे वो ऊर्जा के क्षेत्र में हों, वातावरण के बदलाव को लेकर, तकनीक के हस्तांतरण को लेकर या फिर कुछ और.

नैम में शामिल कई विकासशील देश चाहते हैं कि दुनिया के मामलों में उनकी सामरिक नीतियाँ स्वायत्त हो और पश्चिमी देशों से स्वतंत्र हों.

मध्य-पूर्व में ‘अरब स्प्रिंग’ के कारण कई नैम देशों पर सीधे तौर पर प्रभाव पड़ा. इनमें मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया और सीरिया शामिल हैं.

असहमत देश

भारत से दुनिया के संबंध

"भारत के कई देशों से कई अलग-अलग कारणों से संबंध हैं. इसलिए भारत एक साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सदस्य होने के अलावा जी-77 और जी-20 का भी सदस्य है"

शशि थरूर

इसलिए नैम आंदोलन एक ऐसा माध्यम होना चाहिए जिससे किसी क्षेत्र में छाई अशांति के कारणों से निपटने के तरीकों पर विचार हो. लेकिन नैम देश इतने विभाजित हैं कि एक बिंदु पर सहमत होना बहुत मुश्किल है. कई देशों की सोच सीरिया के नेता असद के विरुद्ध है जो कि पश्चिमी देशों की सोच से बहुत अलग नहीं है.

बहरहाल नैम सम्मेलन में अरब देशों में चल रही गतिविधियों पर विचार होने की उम्मीद है ताकि इस क्षेत्र के भविष्य पर संयुक्त समझौते पर पहुँचा जा सके. हालाँकि ये भी देखना होगा कि ऐसे किसी समझौते पर कितना अमल हो पाता है.

भारत जैसे देश में जहाँ पिछले दो दशकों से आर्थिक प्रगति के कारण विश्व के पटल पर उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है, गुटनिरपेक्ष आंदोलन उसे उसकी उपनिवेश-विरोधी कार्रवाईयों की याद दिलाता है. लेकिन नैम भारत की अंतरराष्ट्रीय आकांक्षाओं को व्यक्त करने के लिए एकमात्र फोरम नहीं है.

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत तेजी से गुटनिरपेक्ष से आगे बढ़ रहा है. मैने अपनी किताब 'पैक्स इंडिका: इंडिया ऐंड द वर्ल्ड ऑफ द 21स्ट सेंचुरी' में इसे "मल्टी एलाइनमेंट" या विविध एकत्रिकरण कहा है.

इसका मतलब है कि भारत के कई देशों से कई अलग-अलग कारणों से संबंध हैं. इसलिए भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सदस्य होने के अलावा जी-77 और जी-20 का भी सदस्य है.

भारत इब्सा (आईबीएसए) संगठन का सदस्य है जिसके दूसरे सदस्य देश हैं ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका. इसके अलावा भारत रिक (आरआईसीएस) का भी सदस्य है जिसके दूसरे हिस्सेदार हैं रूस और चीन. दूसरे संगठन हैं ब्रिक्स (बीआरआईसीएस) और बेसिक (बीएएसआईसी).

भारत इन सभी संगठनों का सदस्य है और ये सभी संगठन उसके हितों को पूरा करते हैं.

इसी तरह भारत विश्व में अपनी जगह की ओर बढ़ रहा है और गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी इस सफर का हिस्सा है.

(शशि थरूर भारत के पूर्व विदेश राज्य मंत्री रह चुके हैं)

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