जब मरुस्थल हुआ पानी-पानी..

 शुक्रवार, 31 अगस्त, 2012 को 08:55 IST तक के समाचार

भारत के मरुस्थल क्लिक करें राजस्थान के लिए पानी की एक-एक बूंद अनमोल है.

पहले लोग पानी मटकों में रखते थे जिन्हें घड़े कहते हैं. लेकिन इस बार लम्हों और घड़ियो में ही इतना क्लिक करें पानी बरस गया कि बस्तियां पानी में घिर गईं, सड़कें पानी पानी हो गईं,गलियां घुटनों पानी से भर गईं और इस अनायास क्लिक करें बारिश ने कोई 36 लोगों की जान ले ली.

मगर इनमें ज्यादातर ऐसी बस्तियां थीं जो बरसाती नालों का गला घोंट कर उभरीं या बहाव में बर्बाद हो गईं. जयपुर में प्रसाशन ने स्वीकार किया है कि शहर की जल निकासी व्यवस्था बारिश के इस पानी का दबाव झेल ही नहीं पाई. सरकार ने अब जयपुर में जल निकासी प्रणाली को ठीक करने के लिए कोई एक सौ करोड़ रूपये की योजना का ऐलान किया है.

गरीबों पर ढ़हा कहर

जयुपर के बहरी इलाके में एक बस्ती है मदरामपुरा. सरकारी खातों में ये कच्ची बस्ती है. ये बस्ती कहीं एक तालाब के मुहाने और कही उसकी पीठ पर आबाद है. फिर एक बरसाती नाला भी जब ज्यादा बरसात हो, उधर से ही रास्ता बनाता था.

"''हंसी ख़ुशी कोई क्यों ऐसी जगह घर बनाएगा. किराए पर रहने की औक़ात नहीं और अच्छी जगह घर बना नहीं सकते. 'अपने हाड़-मांस को झोंक कर पैसा जोड़ा और ये टूटा फूटा मकान बनाया था. सब छीन्न-भिन्न हो गया.'' "

सैयदा, पीड़ित

इस बार यही हुआ. भारी वर्षा ने कई मकान ताश के पतों की मानिंद ढहा दिए. मदद के लिए सेना बुलानी पड़ी. इस बस्ती में या तो मजदूर हैं या फिर मजबूर. इनमें से एक सैयदा भी है. वो बेलदार हैं और शौहर पास की मंडी में मजदूर. बरसात ने इनका आशियाना जमी पर ला दिया. गनीमत रही एक कमरा थोड़ा बच गया.

बारिश के बीच कबाड़नुमा संदूक में अपना सामान सहेजती सैयदा कहती हैं तीन साल से इस बस्ती में हैं, कभी इतना पानी नहीं बरसा. सैयदा से पूछा तालाब और नाले के गिर्द मकान बनाते कभी डर नहीं लगा.

कहने लगीं, ''हंसी ख़ुशी कोई क्लिक करें क्यों ऐसी जगह घर बनाएगा. किराए पर रहने की औक़ात नहीं और अच्छी जगह घर बना नहीं सकते. अपने हाड़-मांस को झोंक कर पैसा जोड़ा और ये टूटा फूटा मकान बनाया था. सब छीन्न-भिन्न हो गया.''

आसमान से पानी बरसा और इधर तालाब हिलोरे लेने लगा. मदीना का आशियाना इसी तालाब के पिछवाड़े था. अंधियारी रात और पति घर पर नहीं थे. मदीना ने दो बच्चो को तो बचा लिया. मगर आशियाना बिखर गया. वो कहती है कौन जानता था कि इतनी बरसात होगी.

मदीना कहती हैं, ''कोई भी इंसान मजबूरी में ही ऐसी जगह मकान बनाएगा. हाँ ये पता था कि तालब है पर इतने पानी का अंदाज नहीं था''.

दिलीप भी मजदूर हैं.पानी ने उसका घरोंदा भी ज़मींदोज़ कर दिया है. दिलीप की आँखों में रौशनी बहुत कम है. वो इस नुकसान की गहनता महसूस तो कर सकता है. मगर देख नहीं सकता. ऐसी ही बस्ती में सीताराम परचून की दुकान लगाते थे. वो एक पैर से विकलांग हैं और जयपुर फुट के सहारे चलते है.

वो कहते हैं, ''उस रात मेरा पूरा सामान बह गया. इसे बचाने की मैंने कई बार कोशिश की और आखिरकार मेरा आशियाना ही गिर गया.''

प्रसाशन के मुताबिक जयपुर में ऐसी बारिश कोई तीस साल बाद आई. शायद कोई भी इसके लिए तैयार नहीं था.

बरसात के क्लिक करें पारम्परिक बहाव क्षेत्रों और नाले नक्शों मे तो सलामत हैं. मगर ज़मीन पर वहां कहीं फ़ार्म हाउस हैं, कहीं मलिन बस्तियां. सरकार तो ये सब भूल गई,मगर पानी को अपना पुराना जाना पहचाना मार्ग याद आ गया. वो बहकर उस पर बह निकला. बस्तिया जल मगन हो गई.

किसी के लिए ये पिकनिक का मंजर था. तो किसी को अपने सपनो के घरोंदो के तिनके-तिनके होते देखने का गम दे गया.

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