मजबूर माँ: बच्चे बेचे या गोद दिए ?

 बुधवार, 5 सितंबर, 2012 को 17:27 IST तक के समाचार

पूर्णिमा हलदार 30 साल की या उससे कुछ ज्यादा की दिखती हैं. पर उन्हें कोई अंदाजा नहीं है कि वो कब पैदा हुई थीं. उनके लिए जीवन संघर्ष भरा रहा है.

अपनी तीन बेटियों को ऐसी ही संघर्ष भरी जिंदगी से बचाने के लिए पूर्णिमा ने बेहद कठिन फैसला किया है. उन्होंने अपने बच्चों को गोद दे दिया- ये बताते हुए उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था.

"मैं अपने बच्चों को नहीं बेच सकती. मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ. मैंने अपने बच्चों को अच्छे परिवारों को सौंपा जहाँ उनकी देखभाल हो सके."

पूर्णिमा

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पूर्णिमा ने अपने बच्चों को 185 रुपए में बेच दिया है. जब मैने उनसे पूछा कि क्या से सच है तो वे ऊँची आवाज में कहती हैं, “मैं अपने बच्चों को नहीं बेच सकती. मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ. मैंने अपने बच्चों को अच्छे परिवारों को सौंपा जहाँ उनकी देखभाल हो सके.”

वे कोलकाता से 60 किलोमीटर दूर एक बसेरे में रहती हैं. 10 साल की उनकी बेटी पिया, आठ साल की सुप्रिया और चार साल की रोमा को अब दोबारा पूर्णिमा को सौंप दिया गया है. हालांकि जब मैं मिलने गया तो बेटियाँ वहाँ नहीं थी.

प्रशासन ने बच्चों को अपने पास रखा हुआ था ताकि ये तय कर सके कि उनका क्या करना है.

'बेबस है पूर्णिमा'

पूर्णिमा के साथ ही अन्नपूर्णा घोष बैठी हैं जो बसेरे की निरीक्षक हैं. इस बसेरे में 100 से ज्यदा महिलाएँ और लड़कियाँ और करीब 30 लड़के रहते हैं.

अन्नपूर्णा पूर्णिमा की बातें ध्यान से सुन रही हैं. पूर्णिमा की लाचारी देखने के बावजूद मैं ये यकीन नहीं कर पा रहा था कि ये महिला अपने बच्चों को यूँ ही किसी को सौंप सकती है.

लेकिन अन्नपूर्णा सहमत नहीं है. वे कहती हैं, “जिंदगी ने उसे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. वो बेबस है. उसके सामने वो स्थिति आ गई जो किसी भी माँ के लिए सबसे दुखदाई हो सकती है.”

कुछ लोगों ने मुझे ये भी कहा कि पूर्णिमा पागल है. जब मैने अन्नपूर्णा से जानना चाहा तो उसने सिर्फ सर हिला दिया.

दुख भरी दास्तां

"जिंदगी ने उसे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. वो बेबस है. उसके सामने वो स्थिति आ गई जो किसी भी माँ के लिए सबसे दुखदाई हो सकती है."

अन्नपूर्णा घोष, बसेरा निरीक्षक

मैने पूर्णिमा से ये जानने की कोशिश की कि उनकी जिंदगी कितनी दुश्वारियों भरी रही है. कुछ कहने से पहले पूर्णिमा ने थोड़ा वक़्त लिया. अपने जीवन के तार समेटने और याद करने की इस कोशिश के दौरान मैं पूर्णिमा के चेहरे पर दर्द का भाव साफ देख सकता था.

उसकी शादी ज्यादा उम्र वाले उत्तम हलदार से हुई. वे शराबी था जो पूर्णिमा और बच्चों को हमेशा पीटता रहा था. इससे तंग आकर पूर्णिमा ने कुछ समय पहले घर छोड़ दिया.

शुरु में वो बच्चों के साथ डायमंड हार्बर कस्बे में एक घर में रही लेकिन जब उसे वहाँ से निकाल दिया गया तो पूर्णिमा बच्चों के साथ रेलवे प्लैटफॉर्म पर रहने लगी.

वो कहती है, “मेरे पास पैसे नहीं थे. मैं और कहाँ जाती.”

वहाँ उसके पास गौरी हलदार नाम की एक महिला आईं जिसे पूर्णिमा जानती थी. गौरी ने पूर्णिमा से कहा कि उसकी कोई बेटी नहीं है और वो आठ साल की सुप्रिया को पालने के लिए तैयार है.

पूर्णिमा पहले से ही खराब स्थिति में थी और वो मान गई. अगले दिन उसने बाकी दोनों बेटियों को भी दे दिया.

जब मैने पूर्णिमा से पूछा कि क्या बेटियाँ रोई थीं तो उसने न में जवाब दिया. पूर्णिमा ने कहा, “दोनों बड़ी बेटियाँ तो बिना कुछ कहे चली गईँ लेकिन छोटी बेटी को हमने ये दर्शाया कि कोई गेम चल रही है.”

बच्चे देने के बाद पूर्णिमा कोलकाता जाकर बर्तन साफ करने का काम करने लगी लेकिन वहाँ वो बीमार हो गई और रेलवे स्टेशन लौट आई.

इसके बाद पूर्णिमा को पता चला कि उन पर अपने बच्चियों को बेचने का आरोप लगा है.

क्या पूर्णिमा सच बोल रही है?

पूर्णिमा के बच्चों का नया बेडरूम

जिस इलाके में पूर्णिमा रहती है वहाँ मानव तस्करी आम बात है. रखीबुर रहमान स्थानीय अधिकारी है. वे कहते हैं, “इस गरीब इलाके में मैने ऐसे कई किस्से देखे हैं जहाँ छोटी बच्चियों को माता पिता बेच देते हैं. ज्यादातर लड़कियाँ यौन कारोबार में लगा दी जाती हैं.”

तो क्या पूर्णिमा झूठ बोल रही है? इस पर रखीबुर रहमान बिना झिझक कहते हैं, “बिल्कुल नहीं. अगर पूर्णिमा ने बच्चियों को बेचा होता तो वो हम कभी उन्हें बचा नहीं पाते. ये बच्चियाँ गायब हो जातीं.”

"पूर्णिमा झूठ नहीं बोल रही. अगर पूर्णिमा ने बच्चियों को बेचा होता तो वो हम कभी उन्हें बचा नहीं पाते. ये बच्चियाँ गायब हो जातीं."

रखीबुर रहमान, स्थानीय अधिकारी

बाद में शाम को पूर्णिमा को एक अच्छी खबर मिली- ऐसा उनके साथ कम ही होता है. बाल कल्याण समिति ने कहा है कि पूर्णिमा और उसकी बेटियाँ छह महीने तक वहीं रहेंगी.

मैने इसके बारे में सुप्रिया को पूछा जो तीनों बहनों में से सबसे बातूनी है. वे कहती है, “मुझे अपना नया परिवार पसंद था लेकिन मैं अपनी माँ और बहनों के पास लौटकर खुश हूँ.”

लेकिन पूर्णिमा के मन में सवाल हैं. पूर्णिमा ने मुझे बताया कि उसे लगता है कि बच्चियाँ एक बेहतर जिंदगी की हकदार हैं जो वो नहीं दे सकती.

जब मैं पूर्णिमा से मिलने जा रहा था तो मुझे यकीन था कि कोई भी माता या पिता अपनी मर्जी से अपने बच्चे किसी को नहीं दे सकता. मैं यही सोच रहा था कि इसके पीछे पैसों का लेन-देन होगा.

लेकिन जब मैं पूर्णिमा से मिलकर लौट रहा था तो उससे हुई बातें मेरे दिमाग में कौंध रही थीं. सच ये है कि अगर मैं पूर्णिमा जैसी स्थिति में होता तो मैं भी शायद वही फैसला लेता जो पूर्णिमा ने लिया.

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