नीतीश बनाम शरद: मिले ना सुर मेरा तुम्हारा

नीतीश कुमार के गुजरात जाने या न जाने को लेकर जो बयान जारी हुए हैं उसने एक फिर ज़ाहिर किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव एक बार फिर अलग-अलग सुरों में बात कर रहे हैं.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब दोनों नेताओं ने अलग-अलग बयान दिए हैं.

इन बयानों के पीछे नीतीश कुमार और शरद यादव के राजनीतिक विचारों में भिन्नता है या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति है?

नीतीश कुमार के रुख़ से दिख रहा है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी पार्टी जदयू का प्रचार करने वे गुजरात नहीं जाएंगे.

जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता और गुजरात के पार्टी प्रभारी केसी त्यागी ने सोमवार को दिल्ली में कहा था कि नीतीश कुमार वहाँ अपने दल के लिए प्रचार करने जा सकते हैं.

गुजरात में प्रचार बनाम पाकिस्तान यात्रा

यह बात तब उठी जब पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने दिल्ली में ही संवाददाताओं को बताया कि जदयू का गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ इस बार भी कोई चुनावी तालमेल नहीं रहेगा.

लेकिन जदयू केन्द्रीय नेतृत्व के चुनाव प्रचार संबंधी बयान को नीतीश कुमार ने ये कहते हुए फ़िलहाल हाशिए पर सरका दिया है कि चुनाव प्रचार करने गुजरात जाने का उनका अभी कोई इरादा नहीं है.

उन्होंने इस बाबत खुलकर कहा, ''उस समय बिहार में ही मुझे बहुत काम है. नवंबर में पार्टी की अधिकार रैली है. विधानमंडल का शीतकालीन सत्र है. बीस ज़िलों की सेवा यात्रा बाक़ी है. अपनी सरकार की सालाना रिपोर्ट कार्ड भी तैयार करना है."

उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी बात कि लगभग उसी समय मैं पाकिस्तान की यात्रा पर रहूँगा. पहला निमंत्रण वहाँ के सिंध प्रांत से मिला है. इसलिए फ़िलहाल गुजरात चुनाव के लिए मेरे पास कोई कार्यक्रम नहीं है.''

हालांकि सीधे खंडन जैसा मतलब निकाले जाने से बचने के लिए उन्होंने ये भी कह दिया कि हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष ही ये सब तय करने के लिए अधिकृत हैं.

नीतीश कुमार अपनी प्रस्तावित पाकिस्तान यात्रा को प्रचारित करने में ज़्यादा रूचि दिखा रहे हैं. शायद उन्हें लगता है कि इससे गुजरात चुनाव के समय उनके पक्ष में मुस्लिम-रुझान बढ़ेगा.

अलग-अलग सुर

उनकी दूसरी सोच ये भी हो सकती है कि चुनाव के समय गुजरात जाकर सीधे नरेंद्र मोदी से टकराव मोल लेने के कुछ ख़तरे उठाने पड़ सकते हैं.

जिस तरह नरेंद्र मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार के लिए आने से उन्होंने रुकवाया था, वैसा कड़ा रुख़ उनके प्रति नरेंद्र मोदी भी अपना ले तो फिर क्या होगा?

हो सकता है कि नरेंद्र मोदी को लेकर भाजपा-जदयू के लगातार विवादास्पद होते जा रहे रिश्ते के पीछे भाजपा के एक बड़े गुट की परोक्ष भूमिका हो. लेकिन प्रत्यक्ष रूप में तो नीतीश कुमार ही इसके नायक दिखते हैं.

जब कभी शरद यादव ने कोई बयान नीतीश कुमार की व्यक्तिगत सोच से अलग हट कर दिये हैं, तो ज़ाहिर तौर पर नीतीश नाखुश नज़र आए हैं.

आगामी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा या राजग की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के सवाल पर भी नीतीश और शरद के अलग-अलग सुर लोगों ने साफ़-साफ़ सुने.

नीतीश कुमार ने खुलकर कहा था कि अच्छा होता अगर भाजपा अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम पहले घोषित कर देती. जदयू के कई नेताओं ने नीतीश के इस सुर में सुर मिलाए थे.

लेकिन अकेले शरद यादव ने इससे अलग राय व्यक्त करते हुए कह दिया था कि ऐसी हड़बडी की क्या ज़रुरत है? उन्होंने गुजरात में इस बार भी जदयू के भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले अपने ताज़ा बयान में इस बात को जोड़ा है कि लोकसभा चुनाव का परिणाम आ जाने पर ही राजग के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय किया जाएगा.

संसद में प्रतिनिधित्व संबंधी महिला आरक्षण बिल पर भी इन दोनों नेताओं के विचार एक-दूसरे से भिन्न होने की बात जगजाहिर है.

बिहार में जदयू-भाजपा से जुड़े राजनीतिक हलक़ों में अक्सर ये चर्चा उभरती रहती है कि क्यों शरद यादव का नीतीश कुमार से कुछ मुद्दों पर असहमत होना दिखता ज़रूर है लेकिन तुरंत दब जाता है.

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