युवाओं के 'सर्कल' में कहाँ है हिंदी

 गुरुवार, 13 सितंबर, 2012 को 10:53 IST तक के समाचार
इंद्रप्रस्थ कॉलेज की हिंदी छात्राएं

आज का युवा क्या पढ़ता है और हिन्दी के बारे में क्या सोचता है ये जानने की जिज्ञासा बहुत दिनों से मन में थी. ज़हन में ये बात भी थी कि दिल्ली जैसे महानगर के स्कूलों-कॉलेजों के अंग्रेज़ी माहौल में हिंदी के बारे में कोई गंभीरता से सोचता भी है या नहीं.

पिछले बीस सालों में जिस तेज़ी से भारत का शैक्षिक माहौल बदला है उसे लेकर भी मन में सवाल थे.

आस-पड़ोस के कॉन्वेंट में पढ़ने वाले बच्चों को हिंदी का ट्यूशन लेता देख अक्सर ये सोचने लगता था कि क्या वो दिन भी आ जाएगा कि आज़ादी की लड़ाई में पूरे देश को जोड़ने का काम करने वाली हिंदी एक दिन महानगरों के बच्चों के लिए इतनी मुश्किल हो जाएगी.

इन्हीं सब सवालों से उलझता मैं जा पहुंचा दिल्ली में लगे पुस्तक मेले में. हिंदी के प्रकाशकों के स्टॉल पर भीड़ देखकर मन को थोड़ी तसल्ली हुई.

पुस्तक मेले में युवा

एक स्टॉल पर मुलाक़ात हो गई राय बरेली में रहनेवाले कलीम अशरफ़ साहब से. पूछने पर उन्होंने बताया कि प्रेमचंद पसंदीदा लेखक हैं और महादेवी वर्मा, प्रताप नारायण मिश्र, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, महावीर प्रसाद द्विवेदी को भी उन्होंने पढ़ रखा है. थोड़ी हैरानी भी हुई कि ये सब पुराने लेखक हैं लेकिन आज भी लोग इन्हें पढ़ रहे हैं.

पुस्तक मेले में हिंदी की किताबों के लिए युवाओं में उत्साह देखने को मिला

तभी सामने एक स्कूली छात्रा नज़र आई. ये थीं सातवीं कक्षा में पढ़नेवाली श्रेया. मैंने जब पूछा कि हिंदी किताबें पढ़ती हैं तो उनका जवाब था कि कोर्स में जो कहानियां हैं वही पढ़ती हैं अलग से हिंदी नहीं पढ़तीं.

बीबीसी का माइक देखकर एक सज्जन हमारी बातें सुनने लगे. पूछने पर बताया कि राजस्थान में श्रीगंगानगर के रहनेवाले हैं और नाम है राजेंद्र छिंपा. पेशे से शिक्षक हैं और हिंदी किताबें पढ़ने का शौक़ ही उन्हें तीसरी बार पुस्तक मेले में खींच लाया है.

प्रेमचंद सबसे प्रिय लेखक

प्रेमचंद साहित्य के अलावा श्रीलाल शुक्ल की ‘रागदरबारी’ उनकी पसंदीदा पुस्तक है और इन दिनों रसूल हमज़ातोव की किताब ‘मेरा दागिस्तान’ पढ़ रहे हैं.

पुस्तक मेले में मैंने कई युवाओं से बात की. हिंदी के बारे में ज़्यादातर की स्मृति प्रेमचंद से आगे नहीं जाती थी और कुछ ने तो थोड़ी बहुत हिंदी केवल कोर्स में ही पढ़ी थी.

वहां भिन्न-भिन्न प्रकृति और पेशे के लोगों से मिलकर मुझे यही लगा कि हिंदी का स्पेस कम तो ज़रूर हुआ है लेकिन संकट जैसी स्थिति नहीं है.

हिंदी छात्र

आज के लेखकों में उदय प्रकाश कई युवाओं के प्रिय लेखक हैं

पुस्तक मेले में कई प्रदेशों के युवाओं से बात करने के बाद मुझे लगा कि अब विश्वविद्यालयीय माहौल में जाकर हिंदी के कुछ छात्रों से पूछना चाहिए कि वो आखिर क्यों हिंदी पढ़ते हैं, उनके मन में भविष्य की कैसी परिकल्पना है और वो किन लेखकों को पढ़ते हैं.

और मैं जा पहुंचा दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में. ये छात्राओं का कॉलेज है. मुझे वहां थोड़ी हैरानी हुई और सुखद आश्चर्य भी कि इंद्रप्रस्थ कॉलेज की हिंदी की अधिकांश छात्राएं अपने विषय को लेकर बहुत उत्साहित थीं.

वैसे कॉलेज का माहौल अंग्रेज़ीदां है लेकिन मुझे इन छात्राओं में हिंदी को लेकर आत्मविश्वास में कोई कमी नज़र नहीं आई.

कई लड़कियां बीबीसी के पत्रकार से बात करना चाहती थीं. मैंने वहां क़रीब 25-30 छात्रोओं से बात की. उन्हीं में से एक छात्रा थीं साक्षी कुमारी.

जब मैंने पूछा कि हिंदी क्यों पढ़ती हैं तो उन्होंने कहा, “हिंदी हमारी अपनी ज़मीन से जुड़ी हुई भाषा है. हमें अगर अपनी ज़मीन से जुड़े रहना है, अपने देश से जुड़े रहना है तो यहां की भाषा से जुड़ना सबसे ज़रूरी है.”

तमाम छात्राओं ने अपने प्रिय लेखक के रूप में प्रेमचंद, जैनेंद्र, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, श्रीलाल शुक्ल का नाम लिया लेकिन जब मैंने पूछा कि नए लेखकों में कौन ज़्यादा पसंद है तो अधिकांश छात्राओं ने ‘पीली छतरी वाली लड़की’ नामक उपन्यास के लेखक उदय प्रकाश का नाम लिया.

कम हुई है गंभीरता

डॉ. रेखा सेठी, इंद्रप्रस्थ कॉलेज

"पहले जो लोग हिंदी पढ़ने आते थे वो एक तैयारी और एक विज़न के साथ आते थे. उनके लक्ष्य निश्चित होते थे कि हिंदी पढ़कर क्या बनना है. उनमें विषय के प्रति एक गंभीरता होती थी लेकिन आज के छात्रों का अप्रोच बदल गया है"

इनमें से कई छात्राएं आगे चलकर व्याख्याता बनना चाहती हैं तो कइयों की इच्छा ग्लोबल दुनिया में हिंदी को आगे बढ़ाने की है.

हालांकि कुछ छात्राओं ने ये भी कहा कि किसी और विषय में दाखिला नहीं मिला इसीलिए विकल्पहीनता की स्थिति में हिंदी का चुनाव किया.

वहां मैं कई ऐसी छात्राओं से भी मिला जो अर्थशास्त्र और गणित जैसे विषय पढ़ती हैं लेकिन हिंदी में उनकी गहरी रुचि है.

देश के कई हिस्सों से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आई हिंदी की छात्राओं से बातकर मैंने महसूस किया कि ये लड़कियां अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी को लेकर आत्मविश्वास से भरी हैं और हिंदी के बूते ही वैश्विकरण की चुनौतियों का सामना करना चाहती हैं.

लेकिन एक सवाल अभी भी मन में कौंध रहा था कि क्या भूमंडलीकरण के बीस सालों में हिंदी पढ़नेवाले छात्रों के अप्रोच में कोई बदलाव आया है.

इसका जबाव इंद्रप्रस्थ कॉलेज में हिंदी की शिक्षिका डॉक्टर रेखा सेठी ने दिया. उन्होंने कहा, “पहले जो लोग हिंदी पढ़ने आते थे वो एक तैयारी और एक विज़न के साथ आते थे. उनके लक्ष्य निश्चित होते थे कि हिंदी पढ़कर क्या बनना है. उनमें विषय के प्रति एक गंभीरता होती थी लेकिन आज के छात्रों का अप्रोच बदल गया है. वो सतह पर रहकर सब कुछ पा लेना चाहते हैं. शायद ये बीस सालों में देश के बदले शैक्षिक माहौल में छात्रों की आकांक्षाओं में आए बदलाव का परिणाम है.”

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