भारतीय विश्वविद्यालय पहले 200 में क्यों नहीं?

आईआईटी मुंबई
Image caption आईआईटी मुंबई वर्ष 2012 की क्यूएस रैंकिंग्स में 227वें नंबर पर है. भारत का एक भी विश्वविद्यालय शीर्ष 200 में नहीं है.

विश्वविद्यालयों की रैंकिंग की सूची निकालने वाली वेबसाइट क्यूएस टॉपयुनिवर्सिटीज़ डॉट कॉम के मुताबिक़ वर्ष 2012 में दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय शामिल नहीं है.

भारत में तकनीकी शिक्षा के सर्वोत्तम संस्थानों में शुमार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलोजी(आईआईटी) भी कहीं नीचे यानि कि 200 स्थानों के बाद नज़र आते हैं. सूची में 212वें स्थान पर उच्चतम रैंकिंग वाला भारतीय संस्थान आईआईटी दिल्ली है और उसके बाद 227वें स्थान पर है आईआईटी मुंबई.

भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के गिरते स्तर का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2009 में आईआईटी मुंबई क्यूएस रैंकिंग में 163वें और 2010 में 187वें नंबर पर था.

आख़िर इनके ख़राब प्रदर्शन की वजह क्या है ?

'प्रतिभाशाली युवा शिक्षक नहीं'

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक डाक्टर कृष्ण कुमार की मानें तो इसके कई कारण हैं.

वे कहते हैं, “सबसे बड़ी चीज़ जो किसी भी विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान को अच्छा बनाती है वो है उसके अध्यापक. पिछले दो दशकों में प्रतिभाशाली युवाओं को शिक्षक बनने के पेशे की ओर आकर्षित करने में हमारी संस्थाएं नाकाम रही हैं. इसके अलावा बहुत सी संस्थाओं में पाठ्यक्रम ऐसे हो गए हैं कि उनका हमारे समकालीन जीवन से नहीं के बराबर ताल्लुक़ है.”

क्यूएस रैंकिंग दुनिया के शीर्ष 300 विश्वविद्यालयों को गुणवत्ता का मानक है. इन रैंकिंग पर पहुंचने के लिए चार क्षेत्रों में छह सूचक हैं जिनमें संस्थान में होने वाले अनुसंधान, पाठन, उसके कितने छात्रों को नौकरी मिलती है और वहां कितने अंतरराष्ट्रीय छात्र और अध्यापक हैं, ये मुख्य हैं.

आईआईटी मुंबई के निदेशक प्रोफ़ेसर देवांग कक्कड़ के मुताबिक़ इन मानकों पर भारतीय संस्थान बहुत पीछे हैं.

प्रोफ़ेसर कक्कड़ कहते हैं, “अगर आप अमरीका से तुलना करें तो रिसर्च में वो हमसे पचास गुना ज़्यादा निवेश करते हैं लेकिन हमारे यहां भी निवेश की मात्रा बढ़ रही है. इसके अलावा हमारे उद्योग को भी रिसर्च में रुचि लेकर निवेश करना होगा.”

सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग से भी पीछे

वर्ष 2012 की रैंकिंग में चोटी के तीन विश्वविद्यालय हैं अमरीका का मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलोजी(एमआईटी), ब्रिटेन का कैंब्रिज विश्वविद्यालय, और अमरीका का हार्वड विश्वविद्यालय.

सूची में पहला एशियाई विश्वविद्यालय 23वें नंबर पर हॉन्गकॉन्ग युनिवर्सिटी है और 25वें स्थान पर है सिंगापुर की नेशनल युनिवर्सटी. इसके अलावा शीर्ष 200 में सात चीनी विश्वविद्यालय शामिल हैं.

यानी साफ़ है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत, चीन, सिंगापुर, कोरिया, और हॉन्गकॉन्ग जैसे एशियाई देश से भी बहुत पीछे है. इतना ही नहीं, ब्राज़ील, रूस, भारत, दक्षिण अफ़्रीका और चीन से बने ब्रिक्स समूह में भारत एकमात्र देश है जिसका एक भी विश्वविद्यालय क्यूएस रैंकिंग के शीर्ष 200 में नहीं है.

'अलग प्राथमिकताएं'

लेकिन नेशनल नॉलेज कमीशन के पूर्व अध्यक्ष और नेशनल इनोवेशन काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन सैम पित्रोदा शीर्ष दो सौ में भारतीय विश्वविद्यालयों के नदारद होने से हैरान या परेशान नहीं हैं.

सैम कहते हैं, “हमें इस सूची में कोई चौंकाने वाली बात नहीं लगती है. हमें समझना चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालय महज़ 40-50 साल पुराने हैं जबकि सूची में शामिल कई विदेशी संस्थान 150-200 साल तक पुराने हैं. साथ ही शिक्षा आज एक बड़ा धंधा हो गया है सब जगह. इसमें लोग पैसा लगाते हैं और बनाते भी हैं. इन सब युनिवर्सिटीज़ में हर साल ट्यूशन फ़ीस पचास हज़ार डॉलर है जबकि हमारे यहां शायद पांच सौ डॉलर. तो ये तुलना बहुत सही नहीं है.”

वे कहते हैं कि भारत की प्राथमिकताएं बहुत अलग हैं.

सैम पित्रोदा के मुताबिक, “कई मायनों में अभी भारत बहुत पीछे है. हम ये नहीं कहते कि शिक्षा की बात मत कीजिए. लेकिन हमारी ज़रूरत अभी ये देखना है कि हमारे बच्चों को स्कूल में शिक्षा मिल रही है या नहीं. हमारे विश्वविद्यालय किसी सूची में हो लेकिन बच्चों को अच्छी शिक्षा न मिले तो ऐसी सूची का क्या काम?”

Image caption भारतीय विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय मानको के आधार पर कहीं पीछे हैं.

लेकिन क्यूएस रैंकिंग निकालने वाली वेबसाइट टॉपयुनिवर्सिटीज़ डॉटकॉम के संपादक डैनी बर्न ने बीबीसी को बताया कि अगर भारत को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जगह बनानी है तो उसे इसके लिए लगातार निवेश करना होगा.

सुधार और सोच बदलने की ज़रूरत

डाक्टर कृष्ण कुमार के मुताबिक़ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों की प्रक्रिया को तेज़ बनाने की ज़रूरत है.

वहीं सैम पित्रोदा कहते हैं कि भारतीय विश्वविद्यालय आज भी 19वीं सदी की सोच रखते हैं जिसे बदलने की ज़रूरत है.

वे कहते हैं, ''हमारी शिक्षा प्रणाली बहुत पुरानी है और ये रास्ता हमें आगे नहीं पहुंचाएगा. शिक्षा के क्षेत्र में निवेश के साथ हमें शिक्षा के बारे में नया विचार करना है जो तकनीक की मदद से ही हो सकता है.”

वैसे बात अगर विषय के हिसाब से विश्वविद्यालयों की रैंकिंग की हो, तो इंजीनियरिंग और टैक्नॉलोजी संस्थानों में आईआईटी मुंबई और अंग्रेज़ी साहित्य और लिंग्वस्टिक्स विषयों में दिल्ली विश्वविद्यालय का दुनिया के पहले 50 संस्थानों में शुमार होता है.

शायद इसे ही कहते हैं, ‘डूबते को तिनके का सहारा’.

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