आख़िर क्यों है भारत बंद?

भारत बंद

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पहले ही चौतरफा वार झेल रही यूपीए सरकार के ताजा आर्थिक फैसलों ने विपक्ष को नया हथियार दे दिया है.

महीनों से चल रही ऊहापोह के बाद सरकार ने पिछले शुक्रवार को आर्थिक सुधारों की दिशा में अहम फैसले किए गए और खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में 49 प्रतिशत विदेश निवेश को हरी झंडी दिखा दी.

इससे एक दिन पहले सरकार ने डीजल के दामों में प्रति लीटर पांच रुपये की वृद्धि और प्रत्येक परिवार को एक साल में रियायती दामों पर सिर्फ छह सिलेंडर की सीमा तय कर दी.

यही फैसले विपक्ष और साथ ही साथ सरकार का साथ दे रहे समाजवादी पार्टी और डीएमके जैसे दलों को नागवार गुजर रहे हैं.

निवेश पर आवेश

खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी मिलने के बाद भारत में वॉलमार्ट, टेस्को और कारफोर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अपने स्टोर खोलने का रास्ता साफ हो जाएगा. ये कंपनियां काफी समय से 450 अरब डॉलर के भारतीय खुदरा बाजार में दाखिल होना चाहती हैं.

हालांकि सरकार के फैसले के अनुसार उन्हीं शहरों में इन विदेशी कंपनियों को अपने स्टोर खोलने की अनुमति होगी जहां की आबादी कम से कम दस लाख है. साथ ही इन कंपनियों को 30 प्रतिशत सामान स्थानीय और खास कर छोटे कारोबारियों से खरीदना होगा.

लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा का कहना है कि इस फैसले से भारत 'सेल्स बॉयज और सेल्स गर्ल के राष्ट्र' में तब्दील हो जाएगा. राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली का कहना है कि खतरा सिर्फ खुदरा और सेवा क्षेत्र के सामने है, बल्कि विनिर्माण क्षेत्र के सामने भी संकट पैदा हो सकता है.

अखिल भारतीय व्यापार परिसंघ ने अपना विरोध जताते हुए राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा है जिसके मुताबिक, “लगभग 70 करोड़ लोग दिन में 20 रुपये से भी कम कमाते हैं और वो इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे, क्योंकि खुदरा क्षेत्र से उन्हीं किसी न किसी तरह रोजगार मिला हुआ है.”

लेकिन दूसरी तरफ सरकार पर आर्थिक सुधारों की रफ्तार को तेज करने का दबाव है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कड़ी आलोचना के बाद प्रधानमंत्री ने ये बड़े फैसले किए हैं.

सरकार ने नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी 49 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति देने का फैसला किया है. इससे आर्थिक तंगियों की शिकार एयर इंडिया को राहत मिल सकती है.

तेल की धार

Image caption वॉलमार्ट खुदरा क्षेत्र की एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी है.

वैसे खुदरा और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में विदेशी निवेशी को मंजूरी देकर सरकार ने आम जनता के उस विरोध को और भड़का दिया जो डीजल के दामों में प्रति लीटर पांच रुपये की वृद्धि और रसोई गैस पर सब्सिडी खत्म करने से नाराज थी.

आलोचकों का कहना है कि डीजल के दाम बढ़ाए जाने से न सिर्फ माल की ढुलाई पर आने वाली लागत बढ़ने से महंगाई में इजाफा होगा, बल्कि किसानों पर भी बोझ बढ़ेगा जिनके लिए डीजल से चलने वाले पंप अपने खेतों को सींचने का अहम जरिया हैं.

विपक्ष ही नहीं, सरकार का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं ने डीजल के दामों में इतनी ज्यादा वृद्धि को अनुचित बताया.

लेकिन सरकार की तरफ से अभी तक दाम घटाने के कोई संकेत नहीं मिले हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का कहना है कि अगर सरकार ने अपने कदम पीछे हटाए तो इससे उसकी विश्वसनीयता को धक्का लगेगा.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि सरकार ने ये फैसला सोच समझ कर लिया है. अगर सरकार डीजल के दाम बढ़ाने का फैसला वापस लेती है तो इससे उसकी विश्वसनीयता शून्य हो जाएगी.”

रसोई में तूफान

Image caption खुदरा क्षेत्र की विदेशी कंपनियों को 30 प्रतिशत माल स्थानीय कारोबारियों से खरीदना होगा.

रसोई गैस पर भी सरकार के फैसले से जनता में बेचैनी है. आलोचकों का कहना है कि ज्यादातर संयुक्त परिवारों में रहने वाले भारतीय परिवारों का एक साल में छह सिलेंडरों से गुजारा बिल्कुल नहीं चल सकता है.

सरकार के फैसले से अनुसार साल में छह सिलेंडर ही रियायती दामों पर मिलेंगे जबकि इससे ज्यादा सिलेंडर के लिए लगभग दोगुनी कीमत अदा करनी होगी.

सरकार के ताजा फैसलों से खफा होकर यूपीए गठबंधन से अलग होने वाली तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने हर साल परिवारों को कम दाम वाले कम से कम 24 गैस सिलेंडर दिए जाने की भी मांग की.

देश भर में गृहणियां रसोई गैस पर सब्सिडी में कटौती का विरोध कर रही है, लेकिन सरकार का कहना है कि तेल और गैस कंपनियों को हो भारी घाटे को देखते हुए उसके सामने कोई चारा नहीं है.

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