ममता के बाद क्या हैं यूपीए के पांच विकल्प?

 बुधवार, 19 सितंबर, 2012 को 12:32 IST तक के समाचार

ममता बनर्जी के अल्टीमेटम के बाद यूपीए सरकार के लिए स्थितियां गंभीर हो गई है लेकिन अभी भी जोड़ तोड़, बैठक, मीटिंगों का सिलसिला जारी है. ऐसे में क्या विकल्प हैं यूपीए के सामने. आइए डालते हैं एक नज़र इन विकल्पों पर लेकिन उससे पहले संख्या गणित.

कुल 545 सदस्यों की मौजूदा लोकसभा में काँग्रेस के 205 सांसद हैं. अगर तृणमूल काँग्रेस के 19 सदस्य हाथ खींच लेते हैं तो यूपीए के पास द्रविड़ मुनेत्र कषगम के 18, राष्ट्रीय लोकदल के पाँच, राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी के नौ, नेशनल कानफ्रेंस से तीन और दूसरी पार्टियों के कुछ सांसद रह जाएँगे.

सरकार को बाहर से समर्थन देने वालों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल हैं और जनता दल सेक्युलर है. कुल मिलाकर बाहर से 50 सांसदों का समर्थन उसे प्राप्त है. यानि उसके पास 300 से ज्यादा सांसदों की ताकत है जबकि सरकार में रहने के लिए 272 सांसदों का समर्थन जरूरी है.

इस संख्या के आधार पर पर अब काँग्रेस पार्टी और सरकार के सामने विकल्प क्या हैं?

विकल्प नंबर एक- आंशिक रोलबैक

इसकी संभावना बहुत कम है कि सरकार सभी आर्थिक घोषणाओं पर अमल को टालने की घोषणा करे. पर अगर यूपीए सरकार ममता बनर्जी के दबाव में आकर ताजा घोषणाओं को आंशिक तौर पर पलट दे तो ममता बनर्जी के उनके साथ बने रहने की संभावना बन सकती है.

हालाँकि सरकार ने ये बहुत साफ शब्दों में कह दिया है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की हद 51 प्रतिशत तक बढ़ाने के फैसले को पलटा नहीं जाएगा. उसके ऊपर और ज्यादा आर्थिक उदारीकरण करने का जबरदस्त दबाव है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने फिर दोहराया है कि भारत को आर्थिक उदारीकरण के क्षेत्र में और उपाय करने चाहिए.

लेकिन मौजूदा संकट को टालने के लिए सरकार कई तर्कों का सहारा लेकर ममता बनर्जी की दूसरी माँगों पर विचार कर सकती है. अगर प्रति परिवार रसोई गैस के छह से ज्यादा सिलेंडर दिए जाने पर लगी रोक हटा दी जाए और डीजल की कीमतों को कुछ कम कर दिया जाए तो उम्मीद बन सकती है. तब ममता बनर्जी इसे अपनी जीत के तौर पर पेश करते हुए सरकार में बनी रह सकती हैं.

विकल्प नंबर दो- अल्पमत में चले सरकार

ममता बनर्जी

ममता बनर्जी ने कहा है कि वो सरकार की गरीब विरोधी नीतियों के कारण समर्थन वापिस ले रही है.

केंद्र में पहले भी अल्पमत सरकारें रह चुकी हैं. ममता बनर्जी के 19 सांसदों के समर्थन वापिस लेने के बाद भी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की बाहरी मदद से मनमोहन सिंह केंद्र में अल्पमत सरकार चला सकते हैं.

इस बार समाजवादी पार्टी के पास 22 और बहुजन समाज पार्टी के 21 सांसद हैं. समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने यूपीए के पहले दौर में भी वामपंथियों के समर्थन वापिस लेने के बादल मनमोहन सिंह सरकार को टिके रहने में मदद की थी. बहुजन समाज पार्टी के नेता कह चुके हैं कि सरकार के गिरने से उन्हें कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने वाला.

विकल्प नंबर तीन- नए सहयोगी

अगर काँग्रेस मुलायम सिंह यादव को सरकार में आने के लिए मना लेती है तो मनमोहन सिंह की स्थिति पूरी तरह से मजबूत हो जाएगी. तृणमूल काँग्रेस के पास इस समय काफी महत्वपूर्ण माना जाने वाले रेल मंत्रालय है. समाजवादी पार्टी को अगर इस तरह के महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी गई तो पार्टी सरकार में शामिल हो सकती है.

हालाँकि अभी मुलायम सिंह यादव ने इस बारे में कोई फैसला नहीं किया है और वो अपनी रणनीति को स्पष्ट नहीं कर रहे हैं. काँग्रेस को अपनी जरूरत का एहसास दिलाते रहने के लिए मुलायम सिंह आलोचनात्मक सुर में बोलते रहे हैं. ममता बनर्जी की घोषणा के बाद भी उन्होंने काँग्रेस को खबरदार करने के लिए कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है.

इस परिदृश्य में दिक्कत ये है कि अगर समाजवादी पार्टी सरकार में शामिल होती है तो फिर उसकी पक्की दुश्मन मायावती की बहुजन समाज पार्टी किसी भी कीमत में शामिल नहीं होगी.

विकल्प नंबर चार- मध्यावधि चुनाव

सोनिया गाँधी और ममता बनर्जी

काँग्रेस अब भी ममता बनर्जी को मनाने की कोशिश करना चाहती है.

मध्यावधि चुनाव दो स्थितियों में संभव हैं. काँग्रेस और यूपीए एक साथ कई सारी लोकलुभावन घोषणाएँ करे और मध्यवर्ग को माफिक आने वाला बजट पेश करने के बाद खुद ही 2013 में मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दे.

दूसरे, विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ साथ ममता बनर्जी की तृणमूल काँग्रेस और समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सरकार को मध्यावधि चुनाव करवाने के लिए मजबूर कर दें.

ऐसी स्थिति में सभी पार्टियों को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास जाकर संसद का विशेष सत्र बुलवाने की गुजारिश करनी होगी. तब राष्ट्रपति की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाएगी और उन्हें तय करना होगा कि अल्पमत सरकार को संसद में बहुमत सिद्ध करने को कहा जाए या नहीं.

विकल्प नंबर पांच- मुश्किलें और भी

लेकिन ये सब संभावित स्थितियाँ हैं. अभी सरकार को सबसे बड़ी चुनौती का सामना कल यानी 20 सितंबर को करना होगा जब पूरे देश में वॉलमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों का विरोध किया जाएगा.

विपक्ष और सरकार विरोधी पार्टियों की ओर से की जा रही इस हड़ताल में सरकार की सहयोगी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) भी हिस्सा ले रही है. मनमोहन सिंह के लिए ये काफी चिंता की बात है.

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