सीखिए माधुरी सी अदा, ऋतिक का स्टाइल

जब अरजान रिक्की दावा करती हैं कि वो आपको शाहरुख़ खान या माधुरी दीक्षित से भी खूबसूरत बना देंगी तो लोग उनकी बात ध्यान से सुनते हैं.

उनका अंदाज़ ड्रामाई है लेकिन उनके पास शिष्टाचार सीखने आई लड़कियों पर इसका असर ज़बरदस्त होता है.

रिक्की 37 साल से दक्षिण मुंबई के फोर्ट इलाके में अंग्रेजों के ज़माने की बनी इमातों में से एक में अपना दावर ग्रूमिंग स्कूल चलाती हैं.

भीतरी निखार

अरजान रिक्की कहती हैं, "अगर आप व्यक्तित्व को संवारने और निखारने पर ध्यान दें तो आप किसी फिल्म स्टार से कम नहीं." उनका कहना है कि उनके संस्थान में आने वाली लड़कियों के लिए सुंदरता का मतलब बाहरी तौर पर बनना और संवरना है.

अरजान जोर देकर कहती हैं, "हम पहले उनकी सोच को बदलने का काम करते हैं. ट्रेनिंग ख़त्म होने तक हम उन्हें इस योग्य बना देते हैं कि वो बाहरी दुनिया का आत्मविश्वास के साथ मुकाबला कर सकें."

अरजान का दावा है, "हमारे स्टूडेंट किसी भी महफ़िल में खुद को बेहतरीन तरीके से पेश कर सकते हैं या किसी भी पार्टी की जान बन सकते हैं."

अरजान रिक्की जैसा कहती हैं वैसा ही दिखती भी हैं. उनके साफ़ करारे कपड़े, उनकी धीमी आवाज़ में बात करने का अंदाज़ उनके आत्मविश्वास की झलक देता है.

दावर स्कूल की दूसरी महिलाएँ भी खूबसूरती से सज-धज कर आती हैं और अपने छात्रों को इसके महत्त्व के बारे में बार-बार बताती हैं.

फलता-फूलता पेशा

सँवारने और शिष्टाचार सिखाने वाले संस्थान मुंबई, दिल्ली और भारत के दूसरे बड़े शहरों में कई सालों से मौजूद हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से इनकी संख्या काफी बढ़ी है.

ये एक बड़ा धंधा बन गया है.

रैश किरानी मुंबई में लोगों को ये सिखाती हैं कि सामाज में कैसे पेश आएं और कॉर्पोरेट दुनिया में किस तरह का बर्ताव किया जाए.

इस तरह के स्कूलों के आंकड़े तो कहीं नहीं मिल सकते लेकिन अगर आप मुंबई के उपनगर अँधेरी का एक चक्कर लगाएं तो इस तरह के कई संस्थान नज़र आएँगे.

ऋतिक रोशन और फरदीन खान जैसे अभिनेताओं के अभिनय गुरु सुशील सिंह उभरते अभिनेताओं और अभिनेता बनने की इच्छा रखने वालों को अंदरूनी और बाहरी तौर तरीके सिखाते हैं.

सिंह कहते हैं "हम इन लड़के और लड़कियों को हर उस तरह की ट्रेनिंग देते हैं जिससे उनकी पूरा व्यक्तित्व निखरे और आत्मविश्वास बुलंद हो."

'बदली हूँ मैं'

दावर स्कूल की एक छात्रा निकिता अब ट्रेनिंग के आखिरी चरण में हैं. निकिता कहती हैं, "इस ट्रेनिंग से हमारी अपनी आदतों में निखार आया है. मैं अब बाहर की दुनिया या कॉर्पोरेट जगत का सामना करने को तैयार हूँ."

उनकी साथी सवियाना का इस दावर स्कूल से पुराना रिश्ता है. सवियाना के पहले उनकी माँ ने भी यहाँ से ट्रेनिंग ली है. सवियाना बताती हैं, "मेरी माँ ने मेरा दाखिला यहाँ कराया है ताकि मैं भी वो सब अच्छी आदतें और तौर तरीके सीखूं जो उन्होंने यहाँ सीखा था."

मुतोक्षी दादाभोय एक फ्रीलांस ग्रूमिंग ट्रेनर हैं और पिछले 20 सालों से इस पेशे में हैं. मुतोक्षी कहती हैं, "ग्रूमिंग ट्रेनिंग देने वाले संस्थानों की संख्या काफी बढ़ती जा रही है. आजकल पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा कई ग्रूमिंग स्कूल मुझे क्लास लेने के लिए बुलाते हैं. "

ग्रूमिंग स्कूलों की बढ़ती तादाद पर मुतोक्षी दादाभोय कहती हैं, "पिछले 10 -12 सालों में अधिक से अधिक भारतीय विदेश जाने लगे हैं. वो चाहते हैं कि उनका व्यवहार अच्छा हो. उनके खाने-पीने के तरीके यानी टेबल मैनर्स अच्छे हों, हावभाव सही हो. इसीलिए वो ग्रूमिंग स्कूल में ट्रेनिंग के लिए दाखिला लेते हैं."

विशेषज्ञों के मुताबिक ग्रूमिंग का ये रुझान समाज के दूसरे वर्गों में भी देखा जा रहा है. नरेन्द्र कुमार अंधेरी में रहते हैं. उन्हें स्कूलों में छात्रों को ग्रूम करने के लिए बुलाया जाता है. 'आज कल स्कूल भी मुझे बुलाते है क्यूंकि उन्होंने अपने यहाँ ग्रूमिंग प्रोग्राम रखे हैं.'

ये एक ऐसा रुझान है जिसके बारे मे अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले दिनों में ये और फलने-फूलने वाला है.

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