प्राकृतिक संपदा की नीलामी के अलावा दूसरे रास्ते भी

सुप्रीम कोर्ट
Image caption अदालत के मुताबिक मुनाफा बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है आम लोगों का फायदा

एक महत्त्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्राकृतिक संपदा के आवंटन के लिए नीलामी ही एकमात्र तरीका नहीं है.

फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने सभी 122 टेलीकॉम लाइसेंसों को ये कहते हुए रद्द कर दिया था कि पहले आओ, पहले पाओ की नीति में कथित तौर पर घोटाला हुआ और प्राकृतिक संपदाओं की नीलामी की जानी चाहिए.

इस पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति के जरिए राय मांगी थी कि क्या नीलामी सभी प्राक़ृतिक संपदाओं पर लागू होती है?

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताई थी. सरकार ने कहा था कि उसका ताजा फैसला पूर्व में दिए गए फैसलों के विरुद्ध है, नीति बनाना सरकार का अधिकार है और उसमे किसी की भी दखलअंदाजी नहीं होनी चाहिए.

इस पर पाँच जजों वाली संवैधानिक पीठ ने गुरुवार को साफ किया कि 2जी फैसले में अदालत ने ये नहीं कहा था कि प्राकृतिक संपदा का आवंटन सिर्फ नीलामी के जरिए हो. अदालत ने कहा कि प्राकृतिक संपदा का आवंटन इस बात पर निर्भर करेगा कि ये संपदा क्या है और किस चीज के लिए दी जा रही है.

इस पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया ने की. इसमें डीके जैन, जेएस खेहर, दीपक मिश्रा और रंजन गोगोई शामिल थे.

अदालत ने कहा उसकी राय का असर पूर्व में दिए गए 2जी फैसले पर नहीं पड़ेगा.

अदालत के मुताबिक मुनाफा बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है आम लोगों का फायदा.

अदालत ने कहा कि अगर संपदा का आवंटन गरीबों के लिए किया जाता है कि उसे देने का तरीका सिर्फ नीलामी नहीं हो सकता.

2जी घोटाला साल 2010 में प्रकाश में आया जब भारत के महालेखाकार और नियंत्रक ने अपनी एक रिपोर्ट में साल 2008 में किए गए स्पेक्ट्रम आवंटन पर सवाल खड़े किए.

मुनाफा

पत्रकारों से बात करते हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि उन्होंने अभी तक अदालत का पूरा फैसला नहीं पढ़ा है, लेकिन ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, “अगर कोई प्राकृतिक संपदा किसी निजी कंपनी को उसके मुनाफे के लिए दी जा रही है तब उसे सिर्फ नीलामी से ही दिया जा सकता है. अगर तब कोई दूसरा तरीका इस्तेमाल किया जाता है तो वो संविधान के खिलाफ माना जाएगा.”

2जी घोटाले मामले में एक और याचिकाकर्ता जनता पार्टी के सुब्रमण्यम स्वामी ने फैसले को अपनी जीत बताया.

जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी और प्रशांत भूषण की गैरसरकारी संस्था सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने 2जी मामले में दो अलग याचिकाएं दायर कर रखी थीं.

फैसले का स्वागत करते हुए दूरसंचार मंत्री कपिल सिबल ने कहा कि आर्थिक नीतियाँ बनाने का हक सरकार के पास होना चाहिए और इसमें किसी की दखलअंदाजी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने माना कि अगर नीति का कार्यान्वयन गलत तरीके से होता है तब उस पर सवाल उठाए जा सकते हैं.

उन्होंने कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ कि उसके फैसले से नीति में स्पष्टता आई है. अब हम सब अपने दायरे में काम कर सकते हैं.”

Image caption 2जी स्पेक्ट्रम पर सरकार को कई मुश्किल जवाब देने पड़े हैं

सिबल ने कहा कि सरकार का इरादा 2जी मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को चुनौती देने का नहीं था और सरकार 122 लाइसेंस को रद्द करने के फैसले का सम्मान करती है.

उन्होंने खुशी जताई कि अदालत ने सरकार की उस सोच को माना है कि वो प्राकृ्तिक संपदा के बंटवारे के तरीके पर सरकार को आदेश नहीं दे सकती.

मामला

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कंपनियों को नीलामी की बजाए पहले आओ और पहले पाओ की नीति पर लाइसेंस दिए गए थे, जिसमें भारत के महालेखाकार और नियंत्रक के अनुसार सरकारी खजाने को एक लाख 76 हजार करोड़ रूपयों का नुकसान हुआ था.

आरोप था कि अगर लाइसेंस नीलामी के आधार पर होते तो खजाने को कम से कम एक लाख 76 हजार करोड़ रूपयों और प्राप्त हो सकते थे.

हालांकि महालेखाकार के नुकसान के आंकड़ो पर कई तरह के आरोप थे लेकिन ये एक बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया था और मामले पर देश के सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ भी दाखिल की गई थीं.

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