बिजली देश को, बीमारियाँ उनको

उत्तरप्रदेश-मध्यप्रदेश सीमा को केंद्र मानें तो सोनभद्र-सिंगरौली औद्योगिक क्षेत्र के लगभग 100 किलोमीटर दायरे में शायद ही कोई गांव, कोई इलाका ऐसा हो जहां बड़ी संख्या में बच्चे और व्यस्क गलियों में रेंगते, लाठियों के सहारे चलते और रास्तों पर लुढ़कते न दिख जाएं. यहां के पानी में फ्लोराइड है, जो सीधे शरीर की हड्डियों पर मार करता है.

ये वो लोग हैं जिन्हें बिजली उत्पादन की कीमत चुकानी पड़ी है जबकि उन्हें कभी बिजली नसीब नहीं होती.

कोयला खदानों की कालिख और बिजली कारखानों की राख में डूबी चिलकटांड़ गांव की एक ऐसी ही अंधेरी बस्ती में जब हम पहुंचे तो हमें दिखीं 55 साल की सुनिता जो पिछले 15 साल में शायद ही कभी अपने घर से बाहर निकली हों.

Image caption अपने विकलांग परिवार के लिए सुनीता की सबसे बड़ी आस है कि पैरों से अपाहिज बेटे रामलखन को एक छोटी दुकान मिल जाए.

वजह ये कि सुनीता हाथ-पैर टेढ़े-मेढ़े है, वही नहीं उनके पांच लोगों के परिवार में आज चार और अपाहिज हैं.

टेढ़े-मेढ़े हाथों से माइक पकड़ने की कोशिश करते हुए सुनीता बताती हैं कि जब उनकी शादी हुई थी तो वो सुनहरे सपने लेकर यहां आई थी. लेकिन 40 की उम्र आते आते हाथ पैर बेकार हो गए हैं. सुनीता कहती हैं, “ पिछले 15 साल से मैं घिसटकर ही एक जगह से दूसरी जगह जाती हूं. बेटा हुआ तो आस बंधी कि बुढ़ापे का सहारा बनेगा लेकिन उसके हाथ-पैर तो बचपन में ही बेकार हो गए. किसी तरह उसकी शादी हुई लेकिन अब पोते के पैर भी टेढ़े होने लगे हैं.”

विशेषज्ञ कहते हैं कि इस बीमारी की वजह है पानी में मौजूद फलोराइड, जिसकी वजह से लोगों की हड्डियां कमज़ोर हो जाती है.

रेणुकू़ट के सरकारी डॉक्टर राजीव रंजन कहते हैं, ''लोग हैंडपंप या नदियों से पानी लेते हैं जिसमें कारखानों से निकला फ्लोराइड घुल चुका है. इसका असर शरीर की हड्डियों और दांतों पर पड़ता है.फ्लोराइड से एक बार हड्डी बेकार हो जाए तो इसका कोई इलाज नहीं. समस्या ये है कि पीने का साफ पानी उपलब्ध ही नहीं है.''

खास बात ये है कि इस इलाके में भारतीय के कुल बिजली उत्पादन के दसवां हिस्से की बिजली यहीं बनती है.

बिजली की कीमत

30 जुलाई 2012 को उत्तरी भारत में पावर ग्रिड फेल होने पर लगभग आधा भारत जब अंधेरे में डूब गया तो लोगों के बीच हाहाकार मचा और 21वीं सदी के इस भारत की तस्वीर दुनियाभर के अखबारों में छपी. लेकिन इस हड़कंप से कोसों दूर सोनभद्र-सिंगरौली के लोगों के मन में बस एक ही सवाल उठा कि अगर बिजली की कटौती इतनी बड़ी खबर है तो 40 साल से अंधेरे में डूबे उनके इलाके की किसी ने सुध क्यों नहीं ली.

भारत दुनिया की दूसरी सबसे तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है और विकास की इस गाड़ी को रफ्तार देने के लिए उसे हर कीमत पर बिजली की ज़रूरत है और इस कीमत को इस इलाके के लोग चुका रहे हैं.

Image caption पानी में घुलते फ्लोराइड के चलते विकलांगता इस इलाके में महामारी की तरह फैल रही है.

टनों की तादाद में रिहंद नदी में बहती राख, नदी-नालों में गिरता फैक्ट्रियों का रसायनिक कचरा और कोयले-पत्थर की गर्द पानी-हवा-मिट्टी सभी को प्रदूषित कर रही हैं.

शक्तिनगर इलाके में स्थानीय डिस्पेंसरी से लौट रही विमला देवी कहती हैं, “यहां कोयले और राख की गर्द इतनी ज़्यादा है कि सुबह गला खखार कर थूको तो सब काला निकलता है. किसी भी घर में पूछ लीजिए महीने में सबसे ज्यादा खर्च दवा और डॉक्टर का है.”

खून में घुलता पारा

इलाके में बढ़ता प्रदूषण लोगों को को बीमार कर रहा है इसके कई अध्ययन और संकेत भी मौजूद हैं एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक सोनभद्र-सिंगरौली इलाके में हवा, पानी और मिट्टी ही नहीं बल्कि यहां रहने वालों के खून के नमूनों में भी पारा यानि 'मर्करी' पाया गया है.

मर्करी इंसान के दिमाग़ी संतुलन को बिगाड़ता है और चिकित्सीय दृष्टि से देखें तो आत्महत्या का मुख्य कारण है

सिंगरौली औद्योगिक क्षेत्र से सटे विह्ंडमगंज इलाके में मानसिक रुप से बीमार लोगों की संख्या काफी ज्यादा है. हम इस गांव के दौरे पर पहुंचे तो इस आस में कि सरकार से कोई मदद आई है मानसिक रुप से विक्ष्प्त कई बच्चे और उनके माता-पिता इक्टठा होने लगे.

अमल जायसवाल कहते हैं, ''बाबू जब पैदा हुआ तब ठीक था, लेकिन जल्द ही उसकी हरकतें बदलने लगीं. हाथों-पैरों में कंपन शुरु हो गया. अब इसे मिर्गी के दौरे आते हैं और ये पूरी तरह पागल हो चुका है.''

बाबू की तरह हर बच्चे की अपनी कहानी है, लेकिन सवाल फिर भी वही कि मानसिक बीमारियों के इन मामलों की वजह आखिर क्या है.

ज़िला सोनभद्र-सिंगरौली और इसके आसपास के इलाकों में आत्महत्या के मामलों पर नज़र डालें तो पिछले पांच साल में इनमें दोगुने से भी ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है.

सिंगरौली औद्योगिक क्षेत्र से सटे इलाके व्हिंडमगंज में एक मेडिकल स्टोर के मालिक जितेंद्र उपाध्याय बताते हैं,''पिछले पांच साल में टिग्रीटॉल जैसी दवाओं की बिक्री में खासी बढ़ोत्तरी हुई. ये दवाएं मानसिक बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल की जाती है. पहले जहां एक पत्ता महीनों नहीं बिकता था वहीं अब हर समय स्टॉक रखना पड़ता है.''

सीधे तौर पर शायद आत्महत्या के आंकड़ों, टिग्रीटॉल की बिक्री और प्रदूषण में कोई सीधा संबंध नहीं है. लेकिन इस इलाके में अत्यधिक मात्रा में पाए गए पारे (यानी मर्करी) के साथ इनकी पड़ताल करें तो कई तार जुड़ते नज़र आते हैं.

Image caption पिछले दिनों इस इलाके में सफ़ेद दाग़ के कई मामले सामने आए हैं. सफेद दाग़ 'मरकरी पॉयज़निंग' का मुख्य भी लक्षण है.

गांवों के हालात, कंपनियों के बेलगाम प्रदूषण और लोगों की समस्या को लेकर बीबीसी ने जब विभिन्न कंपनियों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने बात करने से इंकार कर दिया

इस इलाके की कंपनी अनपरा-लैंको कंपनी के सामजिक जिम्मेवारी विभाग गतिविधियों से जुड़े, अभिषेक अग्रवाल बात करने को तैयार हुए तो बोले, “हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन इन गांवों में समस्याएं ही बहुत हैं. साफ़ पानी की सप्लाई हो सकती है लेकिन सबसे बड़ी रुकावट है गांवों में बिजली का न होना.”

एनटीपीसी, अनपरा-लैंको, हिंडाल्को, कनोरिया केमिकल्स और जेपी ग्रुप जैसी कंपनियों के दस बड़े थर्मल पावर प्लांट, पांच कोयला खदानें, सात से ज्यादा केमिकल, सीमेंट, चूना और घिसाई फैक्ट्रियां और

पत्थर की कटाई में जुटे अनगिनत कानूनी-गैर कानूनी क्रशर, इस इलाके को 'ऊर्जा राजधानी' बनाते हैं. लेकिन इस शोहरत की कीमत है ज़हरीला प्रदूषण, विस्थापन, विकलांगता और घातक बीमारियां, जिसे चुकाने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से यहां के लोगों पर डाल दी गई है.

क्या इन गांवों के लिए ज़रूरी बिजली उस बिजली से अलग है जो उनकी ही ज़मीन पर दिन-रात इन कारखानों में बनती है लेकिन बंटवारे में उनके हिस्से कभी नहीं आती.

(सिंगरौली पर इस विशेष रिपोर्ट की अगली कड़ी में आपको मिलवाएं वेदान्ती प्रजापति से जो न अपराधी हैं न किसी थाने में नामजद लेकिन फिर भी ‘भगोड़े’ हैं.)

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