क्यों मायावती ने रोक लिए अपने कदम?

 गुरुवार, 11 अक्तूबर, 2012 को 08:21 IST तक के समाचार

केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार इस समय उत्तर प्रदेश के दो परस्पर विरोधी दलों समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के समर्थन पर टिकी हैं.

इसलिए बुधवार को बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर सबकी निगाहें थीं.

बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस के प्रारम्भ में मायावती ने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील सरकार की “ निराशाजनक” तस्वीर पेश करते हुए जो तेवर दिखाए , उससे एक बार लगा कि जैसे अब समर्थन वापसी का ऐलान करने ही वाली हैं.

लेकिन फिर मायावती ने थोड़ा विराम दिया .मुस्कराकर ऊपर पत्रकारों की ओर देखा और कहा कि पार्टी ने, “इस मामले में उचित समय पर कोई भी फैसला लेने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर छोड़ दी है.”

बहुत से पत्रकार उनके इस खुलासे पर हँसी नही रोक सके. सबको मालूम है कि बहुजन समाज पार्टी में सारे निर्णय मायावती स्वयं ही हैं और पार्टी के किसी अन्य पदाधिकारी का उसमे दखल नही है.

मायावती ने आगे कहा, “ अब मेरी भी पूरी यह जिम्मेदारी बनती है कि अब मैं इस मामले में देश व जनहित तथा अपनी पार्टी के हित में सभी जरूरी पहलुओं पर गहन सोच विचार करने के बाद ही फिर कोई अंतिम निर्णय लूं.”

सीबीआई की गाज ?

"पत्रकारों की राय है कि आय से अधिक संपत्ति यानि भ्रष्टाचार के मामले में दोबारा सीबीआई जाँच शुरू होने के डर से मायावती ने अचानक फैसला बदला है."

मायावती के इस ऐलान के बाद प्रेस कांफ्रेंस में उपस्थित पत्रकारों की यही प्रतिक्रिया थी कि आय से अधिक संपत्ति यानि भ्रष्टाचार के मामले में दोबारा सीबी आई जाँच शुरू होने के डर से मायावती ने अचानक यह फैसला बदला है.

सीबीआई पहले ही ऐलान कर चुकी है कि उसके पास पर्याप्त सबूत हैं और चार्जशीट भी तैयार है, लेकिन पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने अप्रत्याशित रूप यह केस बंद करने की बात कहकर मायावती को राहत दे दी थी.

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने फिर कह दिया है कि सीबीआई सक्षम स्तर से अनुमति लेकर यह जाँच करने को स्वतंत्र है.

पूर्व मुख्यमंत्री के मामले में भ्रष्टाचार का मुकदमा चलाने की अनुमति देने का अधिकार राज्यपाल को है.

सरकार से पंगा नहीं

पिछली बार राष्ट्रपति चुनाव में सहयोग के बदले में तत्कालीन राज्यपाल राजेस्वर राव ने मायावती पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था. जाहिर है राज्यपाल का अनिर्णय केंद्र सरकार के इशारे पर था.

सोनिया गांधी ने मायावती को प्रतिभा पाटिल के समर्थन का इनाम दिया था.

इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब तक भ्रष्टाचार का मुकदमा बंद नही होता और सीबीआई की तलवार लटक रही है, मायावती केन्द्र सरकार से पंगा नहीं लेना चाहेंगी.

इसलिए सौदेबाजी की गुंजाइश बनाए रखने के लिए मायावती ने समर्थन के मामले पर कोई अंतिम निर्णय नही लिया.

हालाकि बहुजन समाज पार्टी के पदाधिकारी इस बात से इनकार करते हैं कि इस फैसले का संबंध सीबीआई और भ्रष्टाचार के मुकदमों से है.

नफा नुकसान

दूसरी बात यह भी है कि इस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की कट्टर विरोधी समाजवादी पार्टी की सरकार है , मायावती के लिए यह उचित नहीं होगा कि वह केंद्र सरकार से भी एक नया मोर्चा खोल लें.

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो लोक सभा के अगले चुनाव में लड़ाई कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन के बीच होनी है.

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग अठारह फीसदी है . ऐसे में मायावती चुनाव से पहले यह सन्देश नही देना चाहेंगी कि वह कांग्रेस को छोड़कर फिर से भारतीय जनता पार्टी के करीब जा रही हैं.

हालाकि बहुजन समाज पार्टी के एक पदाधिकारी का कहना है कि समर्थन वापसी का मतलब यह नहीं होगा कि मायावती भाजपा के करीब जा रही हैं. उनका कहना है कि मायावती जल्दी ही कोई उचित निर्णय लेंगी और हो सकता है कि वह दोनों खेमों से बराबर दूरी रखते हुए अगला लोक सभा चुनाव लडें.

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