मैं प्यार की भूखी थी इसलिए.....बच्ची गोद ली

 शनिवार, 13 अक्तूबर, 2012 को 10:12 IST तक के समाचार

दिल्ली के पहाड़गंज इलाके की एक गली में बने मंदिर की सीढि़यां पहले तल पर 'मातृ छाया' तक ले जाती हैं.

'मातृ छाया' उन बच्चों का पहला आसरा है जिन्हें उनके माता-पिता बेसहारा कर जाते हैं.

'मातृ छाया' एक गैर सरकारी संस्था है और ऐसे बच्चों का घर है जिनके माता-पिता मजबूरियों के चलते यहां अपने नन्हें बच्चों को छोड़ जाते हैं या फिर इस संस्था के बाहर लगे पालने में डालकर जाते हैं.

दोपहर का वक्त था और कमरे में सन्नाटा पसरा था ... अचानक एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी.

देखा तो दूसरे कमरे में सफेद रंग से पुते नौ पालनों में बच्चे बेसुध सो रहे थे और उन्हीं में से एक अनिल (बदला हुआ नाम) रो रहा था. इन पालने में 9 में से 8 लड़कियां थी और उनकी उम्र डेढ़ महीने से एक साल के बीच होगी.

"पिछले कुछ वर्षों में लड़कियों को गोद लेने के मामले ज्यादा सामने आए है. इसका कारण सोच में फर्क आना, बच्चियों की उपलब्धता और जिन माता-पिता को बच्चे नहीं होते है उनका लड़का या लड़की की बजाय एक बच्चा गोद लेना उद्देश्य होता है."

सूची सहगल,बाल रक्षा इकाई में उपनिदेशक

आज इन बच्चों की देखभाल आया कर रहीं हैं लेकिन जल्दी ही इनके सिर पर पिता का हाथ होगा, छुपने के लिए मां का आंचल होगा.

गोद

दरअसल इस संस्था में पनाह लिए हुए इन सभी बच्चों के गोद दिए जाने की प्रक्रिया जारी है, जिसके पूरा होता ही इन बच्चों को अपना घर मिल जाएगा. सबसे खास बात ये है कि अगर अनाथालय में ज्यादा लड़कियां छोड़ी जा रहीं है तो वहां से गोद लिए जाने वाले लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या ज्यादा है.

दिल्ली सरकार के महिला और बाल विकास विभाग के आकड़ो के अनुसार पिछले पांच वर्षों यानी साल 2007 से लेकर 2011 तक में लड़को के मुकाबले लड़कियों को ज्यादा गोद लिया गया है. साल 2011 की ही बात करे तो सरकार द्वारा पंजीकृत गैर सरकारी संस्थाओं से जहां 98 लड़के गोद लिए गए वहीं लड़कियों की संख्या 150 थी.

इसी विभाग में बाल रक्षा इकाई में उपनिदेशक दिल्ली की सूची सहगल का कहना है, “पिछले कुछ वर्षों में लड़कियों को गोद लेने के मामले ज्यादा सामने आए है. इसका कारण सोच में फर्क आना, बच्चियों की उपलब्धता और जिन माता-पिता को बच्चे नहीं होते है उनका लड़का या लड़की की बजाय एक बच्चा गोद लेना उद्देश्य होता है.’’

गैर सरकारी संस्था 'मातृ छाया' में काम कर रहीं समाजसेवी सुषमा कहती है, ''मुझे इस संस्था में काम करते हुए आठ साल हो चुके है और मैंने देखा है कि लड़कों के मुकाबले लड़कियों को यहां छोड़कर जाने की संख्या ज्यादा होती है. लेकिन ये भी अजीब बात है कि जो लोग गोद लेने आने है उनकी मांग बच्चियों की होती है.''

खुशी मिल गई

वो कहती है कि उन्होंने सैंकड़ों की संख्या में बच्चों को यहां से जाते देखा है और वो सब अब अपने घरों में खुश है.

सुषमा बताती हैं कि यहाँ इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि बच्चा नए घर के माहौल में ढल पाया है नहीं.

एक बच्ची को गोद लेने वाली यामिनी साहिब के लिए फैसले की वजह अलग थी. यामिनी साहिब एक सिंगल मदर यानी गैरशादीशुदा मां हैं और उन्होंने एक बच्ची को गोद लिया है.

वे कहती है, ''बच्चियों में प्यार होता है और मैं प्यार की भूखी थी, इसलिए मैं खुशी को अपने घर ले आई और मुझे जिंदगी की खुशी मिल गई.''

चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी यामिनी को दोस्तों और परिवार के सदस्यों से साथ मिला .

यामिनी के लिए फैसला लेना तो आसान था लेकिन उसे अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया काफी जद्दोजहद भरी थी.

"बच्चियों में प्यार होता है और मैं प्यार की भूखी थी.इसलिए मैं खुशी को अपने घर ले आई और मुझे जिंदगी की खुशी मिल गई."

यामनी साहिब

वे बताती है, ''पहले जिन-जिन एजेंसियों के पास गई तो उन्होंने सिंगल मदर होने पर ही मुझे मना कर दिया लेकिन पालना ने कहा कि वो पहले मेरी वित्तीय स्थिति और परिवार के बारे में अध्ययन करेगी और फिर फैसला करेगी. फैसले में देरी तो हुई लेकिन मुझे आखिरकार बच्ची मिल गई और मैंने अपनी बच्ची का नाम खुशी रखा है.''

बच्चे को पालना एक जिम्मेदारी भरा काम होता है और यामिनी इस जिम्मेदारी को लेकर खुश हैं. इतना ही नहीं वो खुशी के लिए एक बहन लाना चाहती हैं.

यामिनी कहती हैं, ''मैं थोड़ी लालची हो गई हूं. पहले खुशी मां-मां बुलाती थी अब दूसरी बच्ची मां बुलाएगी. जब उनकी शादी हो जाएगी तो अपने आप घर में दो बेटे आ जाएंगे.''

भावनात्मक लगाव

दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसियट प्रोफ़ेसर डॉ. नवीन सिंह का कहना है, ''अभिभावक भावनात्मक तौर पर बच्चियों से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं. इसकी वजह है कि बेटियां, बेटों की तुलना में उनके साथ ज्यादा समय बिताती है और उनका कहना भी ज्यादा मानती हैं. साथ ही लड़कों का घर से बाहर की चीज़ों पर ध्यान रहता है. इसके अलावा जागरुकता भी बढ़ी है जिससे लोगों का लड़कियों के प्रति नज़रिया बदला है.''

गोद लेने की प्रक्रिया को भी हाल में कुछ लचीला बनाया गया है. क़ानून के अनुसार बच्चे को गोद लेने के लिए पहले इच्छुक अभिभावकों को एक मान्यता प्राप्त गोद देने वाली संस्था में खुद को पंजीकृत करवाना होता है.

इसके बाद संस्था गोद लेने वाले अभिभावकों की आर्थिक स्थिति के अलावा अन्य पहलुओं का अध्ययन करती है. संस्था बच्चों का चुनाव करती है, अभिभावको से मंजूरी मिलने के बाद बच्चा दिया जाता है और फिर अदालत गोद लेने का आदेश दे देती है.

"लड़कों के मुकाबले लड़कियों को यहां छोड़कर जाने की संख्या ज्यादा होती है. लेकिन ये भी अजीब बात है कि जो लोग गोद लेने आने है उनकी मांग बच्चियों की होती है."

सुषमा, सामाजिक कार्यकर्ता

इसके बाद भी बच्चों का लालन–पालन ठीक से हो रहा है या नहीं, इस पर नजर रखा जाती है.

'मातृ छाया' की सुषमा कहतीं हैं, “जब माता-पिता संस्था से बच्चों को गोद लेकर जाते है तो हम एक साल में दो-दो महीने बाद प्रोग्रेस रिपोर्ट देखते है और फिर छह साल तक छह-छह महीने की रिपोर्ट लेते हैं.''

राजधानी दिल्ली में अगर लिंग अनुपात की बात की जाए यहां लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कम है.

ऐसे में दिल्ली जैसे शहर में लड़कियों को घर लाने का ये चलन वैसे तो काफी विरोधाभासी नजर आता है, लेकिन आंकड़े ये दिखाने लगे हैं कि छोटे स्तर पर ही सही लेकिन बदलाव की शुरुआत हो चुकी हैं.

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