मोदी के मुसलमान और मुसलमानों के मोदी

नरेन्द्र मोदी सभा (फ़ाइल)
Image caption नरेन्द्र मोदी की सभाओं में मुस्लिम चेहरे भी दिख रहे हैं.

अहमदाबाद के जुहापुरा इलाक़े के पास एक किराए के फ़्लैट में रहने वाले और सायबर कैफ़े में काम करने वाले 42 साल के फ़िरोज़ ख़ान चाहते हैं कि चमनपुरा में उनका एक पुराना बंगला बिक जाए तो वो कुछ काम धंधा जमा लें.

शहर में ज़मीन जायदाद के दाम आसमान पर हैं, फ़िरोज़ को भरोसा है कि अगर उन्होंने काम किया तो वो पूंजी का सत्यानाश नहीं करेगें.

फ़िरोज़ के पास कागज़ हैं. इलाक़े में दाम भी ठीक हैं बस एक दिक्क़त है कि मकान गुलबर्ग सोसायटी में है.

फ़िरोज़ का किस्सा

साल 2002 के दंगों में हिन्दुओं के एक झुण्ड ने गुलबर्ग सोसायटी पर हमला कर दिया. हमले में इलाक़े में रहने वाले 69 लोगों को मार डाला गया. मारे गए लोगों में फ़िरोज़ के परिवार के भी 10 लोग भी शामिल थे.

अपने शासनकाल में हुए गुजरात के दंगों के दाग़ को विकास से धोने में लगे नरेन्द्र मोदी ने राज्य के हर जिले में सद्भावना व्रत किया और हिन्दुओं मुसलमानों के साथ तस्वीरें खिंचवाई. साथ ही लोगों से राज्य में हुए विकास को देखने की अपील की.

फ़िरोज़ कहते हैं, "अगर वो गंभीर होते तो कहते कि गुलबर्ग सोसायटी वाले घर वापस जाओ, मैं दूंगा तुम्हें सुरक्षा. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. हम आज भी हिम्मत नहीं कर सकते की उस तरफ जांए."

Image caption गुलबर्गा सोसाइटी में हुए हमले में फ़िरोज़ के परिवार के 10 लोग मारे गए थे.

फ़िरोज़ बताते हैं कि पहले तीस्ता सीतलवाड ने कहा था कि वहां एक म्यूज़ियम बनाया जाएगा. लेकिन बाद में सीतलवाड ने कहा की जो उन मकानों को बेच सकता हो बेच दे.

फ़िरोज़ कहते हैं कि पुलिस सुरक्षा में भी गुलबर्ग सोसायटी जाते वक़्त रूह काँप जाती है, "लगता है जैसे सब कुछ कल ही घटा हो."

फ़िरोज़ को लगता है पांच दस फीसद से ज़्यादा मुसलमान मोदी को वोट नहीं देंगे.

"जिनका कोई धरम नहीं, कोई ईमान नहीं, जिनको केवल पैसा प्यारा है वो मोदी को वोट दें तो दें, कोई और तो नहीं देगा."

वहीं शहर के एक दुसरे मुसलमानों की बहुलता वाले खानपुर इलाके में गुजरात हाईकोर्ट के वकील इक़बाल सैयद रहते हैं.

मोदी का ज़िक्र आने पर वो बड़े शायराना अंदाज़ में कहते हैं, "उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा. जब आदमी अच्छे काम करता है तो उसके दुश्मन तो पैदा हो ही जाते हैं."

फिरोज़ से उलट

मूलतः उत्तर प्रदेश के बिजनौर के रहने वाले सैयद साल 1980 से अहमदाबाद में रह रहे हैं और उनकी टेबल की ज़ीनत शान नरेन्द्र मोदी के साथ उनकी एक तस्वीर.

सैयद कहते हैं, "मैं बिजनौर जाता हूं तो दिन के छः घंटे बिजली मौजूद नहीं होती है लेकिन यहां छह मिनट को भी बिजली नहीं जाती. सड़कें देखो, लोगों का काम धंधा देखो, यहां पिछले दस सालों से दंगे तो छोड़ दो कर्फ्यू तक नहीं लगा. सब नरेन्द्र मोदी की बदौलत."

पेशे से वकील सैयद दंगा पीड़ितों के मुक़दमे नहीं लड़ते क्योंकि वो जानते नहीं कि कौन पीड़ित है कौन अपराधी.

वो मानते हैं, "दंगे कोई करता नहीं बस हो जाता है. भीड़ जूनून में कुछ कर बैठती है और दंगे कहां नहीं होते?"

सैयद के अनुसार मोदी को 25 से 30 फ़ीसदी मुसलमान वोट मिलेंगे, "ख़ासतौर पर बोहरा, इस्मायली, शिया और वो सब जो पढ़े लिखे हैं."

अहमदबाद टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक भरत देसाई कहते हैं, "मोदी मुसलमानों के वोट लेने के लिए लम्बे समय से कोशिशें कर रहे हैं. वो तबलीगी मुसलमानों और बरेलवियों के बीच के मतभेद का भी लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं."

शायद यही कारण है कि इस बार कांग्रेस ने गुजरात में सत्ता में आने पर सच्चर समिति रिपोर्ट को लागू करने का वादा किया है और राज्य में अल्पसंख्यकों के लिए अलग मंत्रालय बनाने की क़सम भी खाई है.

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