भारत सुरक्षा परिषद से बाहर, रवांडा अंदर

 शुक्रवार, 19 अक्तूबर, 2012 को 04:21 IST तक के समाचार
सुरक्षा परिषद

भारत जैसे कई उभरते देश सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करते रहे हैं.

रवांडा, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, लक्जमबर्ग और दक्षिण कोरिया संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के नए अस्थायी सदस्य चुन लिए हैं.

इसके साथ ही सुरक्षा परिषद में भारत, दक्षिण अफ्रीका, कोलोंबिया, जर्मनी और पुर्तगाल का दो साल का कार्यकाल पूरा हो गया है.

जबकि पांच अन्य सदस्यों अजरबैजान, गुआटेमाला, पाकिस्तान, टोगो और मोरक्को का कार्यकाल दिसंबर 2013 तक है.

नए सदस्यों में अफ्रीकी देश रवांडा के सुरक्षा परिषद के लिए चुना जाना खासा महत्वपूर्ण है.

पिछले दिनों आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार रवांडा के रक्षा मंत्री पड़ोसी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में एक विद्रोही गुट को संचालित कर रहे हैं.

सुरक्षा परिषद की संरचना

रवांडा को अफ्रीकी कोटे से निर्विरोध चुना गया. उसने दक्षिण अफ्रीका की जगह ली है. 193 सदस्यों वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में रवांडा 148, अर्जेंटीना 182, ऑस्ट्रेलिया 140, लक्जमबर्ग 131 और दक्षिण कोरिया 149 वोट पाकर सुरक्षा परिषद के सदस्य बने.

वहीं कंबोडिया, भूटान और फिनलैंड सुरक्षा परिषद में जगह बनाने में नाकाम रहे.

"नफरत फैलाने वाले भले ही कुछ भी कहें.. जीत न्याय और सत्य की ही होती है!!! कभी कभी इसके लिए जरा सी अच्छी लड़ाई की जरूरत होती है..!!!"

पाउल कागामे, रवांडा के राष्ट्रपति

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं जिनमें से पांच सदस्य अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन स्थायी हैं और उन्हें वीटो शक्ति प्राप्त है.

इनके अलावा बाकी 10 सदस्य अस्थायी हैं. अस्थायी सदस्यों के तौर पर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश दो-दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं.

गुरुवार को चुने गए पांचों सदस्य का कार्यकाल एक जनवरी 2013 से 31 दिसंबर 2014 तक होगा.

रवांडा का विरोध

गुरुवार को मतदान से पहले कांगो के एक प्रतिनिधि मंडल ने रवांडा को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाए जाने पर विरोध जताया. सुरक्षा परिषद के “विशेषज्ञ समूह” का कहना है कि रवांडा और युगांडा अपने बार-बार इनकार के बावजूद पूर्वी कांगो में सरकार के खिलाफ लड़ रहे विद्रोही गुट एम23 को समर्थन दे रहे हैं.

दूसरी तरफ रवांडा के राष्ट्रपति पाउल कागामे ने अपने देश को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने पर खुशी जताई है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “नफरत फैलाने वाले भले ही कुछ भी कहें.. जीत न्याय और सत्य की ही होती है!!! कभी-कभी इसके लिए ज़रा सी अच्छी लड़ाई की जरूरत होती है..!!!”

वहीं रवांडा की विदेश मंत्री लुइसे मुशिकिवाबो ने कहा है कि रवांडा सुरक्षा परिषद का जिम्मेदार सदस्य बन कर दिखाएगा.

रवाडा का नरसंहार

नरसंहार की दर्दनाक यादें अब तक रवांडा के लोगों को सताती हैं.

दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने रवांडा को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाए जाने का विरोध किया है. इस संस्था के फिलिपे बोलोपियोन ने कहा कि रवांडा अब अपने उन अधिकारियों को बचाने की बेहतर स्थिति में होगा जो संयुक्त राष्ट्र की रोक के बावजूद एम23 को हथियार और अन्य तरह की मदद दे रहे हैं.

कांगो की सरकार ने मांग की है कि रवांडा और युगांडा के जिन अधिकारियों के नाम संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की रिपोर्ट में है, उनके खिलाफ प्रतिबंध लगाए जाएं.

पिछली बार रवांडा 1994-95 में सुरक्षा परिषद का सदस्य था. उसी दौरान रवांडा में नरसंहार हुआ जिसमें 100 दिनों के भीतर आठ लाख लोगों को कत्ल कर दिया गया था.

उस वक्त देश में हुतु कबीले के लोगों के नेतृत्व वाली सरकार थी और मरने वालों में ज्यादातर लोग तुत्सी कबीले के थे. बहुत से उदारवादी हुतु लोगों को मारा गया था. रवांडा के मौजूदा राष्ट्रपति कागामे तुत्सी हैं.

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